“कट जाएँ मेरी सोच के पर, तुमको इससे क्या”

कट जाएँ मेरी सोच के पर, तुमको इससे क्या
उजङ जाएँ उम्मीदों के घर, तुमको इससे क्या ।

इज्ज़त देने की बातें, बकवास दोगली सौगातें
गिर जाएँ चाहे पैरों में सर, तुमको इससे क्या ।

इश्क़ है ये कहते हो, फिर भी तुम चुप रहते हो
कट जाएँ गर तन्हा सफ़र, तुमको इससे क्या ।

न देखों टकटकी बांधे, पलकों के परदों से तुम
लग जाएगी हम को नज़र, तुमको इससे क्या ।

हिज़्र में जल रही हैं रातें, मिलने क्यूं नहीं आते
हो जाएँ इस शब भी सहर, तुमको इससे क्या ।

कहते हो यूं तो खुद को पङोसी तुम इरफ़ान,
जल जाएँ गर ये मेरा घर, तुमको इससे क्या ।।

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