“खुद से कुछ सवाल”

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जो खोया ही नहीं है कहीं उसे ढूँढ रहे हो !
क्यों जानकर तुम अपनी आँखें मूंद रहे हो ?

अपनी कहानी के वो किरदार सब तुम्ही हो,
दोस्त दुश्मन दुनिया घर बार सब तुम्ही हो ।

आईने में झांकते हो कभी खुद को ताकते हो,
दिल की ज़मीन पर दिमाग का हल हांकते हो ।

औरों की बातें तो सब चुटकियों में मान लेते हो,
और खुद पर चादर वो दिखावे की तान लेते हो ।

जो तुम थे ही नहीं कभी वो बनना चाहते हो,
क्यों खुद पे यूँ इतना ज़ुल्म करना चाहते हो ?

जानकर भी यूँ अनजान बनने का ढ़ोंग करते हो,
अपने ही साथ हर पल नया एक खेल रचते हो ।

खुद से खुद को छुपाकर जाने कहाँ भाग रहे हो ?
अपने ही साये पर तुम तो गोलियां दाग रहे हो ।

सवालों के इस सफ़र में तुम खुद एक सवाल हो,
सब कुछ पाकर भी यहाँ खुद में कहीं बेहाल हो ।

जो है ही नहीं खुद में कहीं उसे ढूँढ रहे हो !
क्यों जानकर तुम अपनी आँखें मूंद रहे हो ?

@राॅकशायर.वर्डप्रेस.काॅम

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