“काग़ज़ क़लम दवात कुछ भी नहीं हैं”

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काग़ज़ क़लम दवात कुछ भी नहीं हैं,
बाक़ी मुझमें जज़्बात कुछ भी नहीं हैं ।

दिल का मौसम, जाने कब होगा सुहाना 
बिन बादल बरसात कुछ भी नहीं हैं ।

वक्त की आँखों में ठहर गया है वक्त कहीं,
अलविदा या मुलाक़ात कुछ भी नहीं हैं ।

ग़ैरों के हवाले किया है जब से खुद को,
खुद से खुद की वो बात कुछ भी नहीं हैं ।

साँसों की शतरंज पर बिछी है ज़िंदगी,
बिसात शह और मात कुछ भी नहीं हैं ।

बर्बाद हो चुका पूरी तरह से इरफ़ान,
मुझमें मेरी अब ज़ात कुछ भी नहीं हैं ।।

#RockShayar

“जिस काम के लिए बना है तू, वहीं काम कर तू”

जिस काम के लिए बना है तू, वहीं काम कर तू
याद रखे दुनिया जिसे, ऐसा कोई काम कर तू ।

जो अच्छा लगे तुझे, वहीं करना चाहिए तुझे 
जो सच्चा लगे तुझे, वहीं करना चाहिए तुझे ।

लोग क्या कहेंगे ! ये तो बरसों पुराना राग है
याद रख बस इतना कि, तू खुद एक आग है ।

गर पा लिया तूने खुद को, तो फिर क्या कमी है
आसमां हो वो मुकद्दर तेरा, समंदर तेरी ज़मीं है ।

खुद को ना तू भूल कभी, ग़ैरों की मुहब्बत में 
खुद को ले कुबूल कभी, खुद ही की उल्फ़त में ।

पैदाइश हुई है तेरी, किसी ख़ास मक़सद के लिए
जिस्म के भीतर पल रही, रूह की रसद के लिए ।

ख़ामोश होकर ना जुल्म सह, अपनी आवाज़ उठा
खुद को तू भूले भटके, कभी तो अपने बारे में बता 

आईने के सामने खङे होकर, अपनी नक्ल कर तू
जैसा तू सच में है, वैसी कभी अपनी शक्ल कर तू 

साथी नहीं है कोई तेरा, ना कोई हमसफ़र यहां
दिल की पहाङी पर, ख़्वाबों का एक जहां बसा ।

याद रख बस इतना, ज़िन्दगी अपने नाम कर तू
मिले जिससे खुशी तुझे, ऐसा कोई काम कर तू ।।

“रिश्तों में एक दूसरे पर ऐतबार ज़रूरी है”

रिश्तों में एक दूसरे पर ऐतबार ज़रूरी है,
कभी प्यार तो कभी तक़रार ज़रूरी है । 

यूँही तो नहीं बन जाते फ़साने इश्क़ के, 
कभी इंकार तो कभी इक़रार ज़रूरी है ।

ख़्वाहिशों के घर में मनचले इस सफ़र में,
कभी ठहराव तो कभी रफ़्तार ज़रूरी है ।

गर महसूस कर पाओ तो इतना समझ लो,
ख़ामोशियों में भी यहाँ झंकार ज़रूरी है ।

ये ज़िन्दगी है ! वीरान कोई जंगल नहीं,
दोस्त दुनिया दुश्मन घर बार ज़रूरी है ।।

#RockShayar

“परिंदो से उनका खुला जहान मत छीनिए”

परिंदो से उनका खुला जहान मत छीनिए,
ज़मीन तो छीन ली आसमान मत छीनिए ।

दिल बहुत रोता है जब कोई बेघर होता है,
कभी किसी से उसका मक़ान मत छीनिए ।

जाने ये कैसी हवा चल पङी है नफ़रत की,
मज़हब का नाम लेकर इंसान मत छीनिए ।

लूटमार जो करनी है शौक से कर लीजिए,
पाया है दिल ने जिसे वो ईमान मत छीनिए ।

तरक्की के इस दौर में यूँ खुद से होकर दूर,
अहसास से वो उसकी ज़बान मत छीनिए ।

सब कुछ छीन लो है फ़क़त इतनी गुज़ारिश,
मुझमें है जो शख़्स वो ‘इरफ़ान’ मत छीनिए ।।

#RockShayar

“मेरा हाफ़िज़ है ख़ुदा”

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सफ़र-ए-हयात में तन्हा नहीं हूँ मेरा हाफ़िज़ है ख़ुदा
सुन ले ऐ दुश्मन मेरी तक़दीर का कातिब है ख़ुदा

पर्वरदिगारे आलम की मोहताज हैं ये दुनिया सारी
हर शै हो चाहे ज़िंदा मुर्दा सबका हाकिम है ख़ुदा

तारीफ सब उसके लिए, बनाया है जिसने दो जहां
सबसे बङा और मेहरबान यक़ीनन वाहिद है ख़ुदा

जहाँ तक जाये नज़र, रात दिन शाम-ओ-सहर
ज़मीन-ओ-आसमां हर जगह यूँ ग़ालिब है ख़ुदा

ज़िंदगी का फ़लसफ़ा, कुन फाया कुन में है छुपा
इंसान हो या जिन्नात हर मख़्लूक़ का साहिब है ख़ुदा

ग़ज़ल में इतनी कुव्वत कहाँ कर पाए जो बयान-ए-इलाही
बेशक इस तमाम कायनात का ख़ालिक़-ओ-मालिक है ख़ुदा ।।

#RockShayar

सफ़र-ए-हयात – ज़िंदगी की यात्रा
तन्हा – अकेला
हाफ़िज़ – रक्षक
ख़ुदा – अल्लाह, रब
तक़दीर का कातिब – भाग्य का लेखक
पर्वरदिगारे आलम – दुनिया को पालने वाला
मोहताज – आश्रित
शै – वस्तु
हाकिम/साहिब – मालिक
वाहिद – एक अल्लाह
शाम-ओ-सहर -सुबह शाम
ग़ालिब – शक्तिशाली
फ़लसफ़ा – दर्शन
कुन फाया कुन – अल्लाह की ज़बान से निकले शब्द जिनसे सृष्टि की उत्पत्ति हुई, हो जा
जिन्नात – जिन्न (बहुवचन)
मख़्लूक़ – प्राणी, जीव
कुव्वत – ताकत
बयान-ए-इलाही – अल्लाह का गुणगान
कायनात – सृष्टि
ख़ालिक़-ओ-मालिक
सर्वाधिकारी, सम्पूर्ण स्वामित्व

 

“खुद से कुछ सवाल”

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जो खोया ही नहीं है कहीं उसे ढूँढ रहे हो !
क्यों जानकर तुम अपनी आँखें मूंद रहे हो ?

अपनी कहानी के वो किरदार सब तुम्ही हो,
दोस्त दुश्मन दुनिया घर बार सब तुम्ही हो ।

आईने में झांकते हो कभी खुद को ताकते हो,
दिल की ज़मीन पर दिमाग का हल हांकते हो ।

औरों की बातें तो सब चुटकियों में मान लेते हो,
और खुद पर चादर वो दिखावे की तान लेते हो ।

जो तुम थे ही नहीं कभी वो बनना चाहते हो,
क्यों खुद पे यूँ इतना ज़ुल्म करना चाहते हो ?

जानकर भी यूँ अनजान बनने का ढ़ोंग करते हो,
अपने ही साथ हर पल नया एक खेल रचते हो ।

खुद से खुद को छुपाकर जाने कहाँ भाग रहे हो ?
अपने ही साये पर तुम तो गोलियां दाग रहे हो ।

सवालों के इस सफ़र में तुम खुद एक सवाल हो,
सब कुछ पाकर भी यहाँ खुद में कहीं बेहाल हो ।

जो है ही नहीं खुद में कहीं उसे ढूँढ रहे हो !
क्यों जानकर तुम अपनी आँखें मूंद रहे हो ?

@राॅकशायर.वर्डप्रेस.काॅम

” म्हारो राजस्थान (My Rajasthan)”

#ObjectOrientedPoems(OOPs)

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रंग रंगीलो राजस्थान, रंगीले सब रूप और भेस
मेहमान को हम कहते जहाँ, पधारो नी म्हारे देस

पन्ना-मीरा की धरती यह, बलिदान से मांग भरती है
रणबाँकुरों की जननी यह, वीर रस स्वांग रचती है

मिसरी सी मीठी बोली, प्रेम की पावन परिभाषा
हर चार कोस के बाद जहाँ, बदल जाती हैं भाषा

रेतीले धोरों के दरमियां, ज़िन्दगी मुस्कुराती है
मिट्टी की खुशबू लिए, लोकगीत गुनगुनाती हैं

फौलादी किलों की तरह, मज़बूत हैं इरादे यहाँ
मासूम दिलों की तरह, लोग हैं सीधे सादे यहाँ

सहनशीलता और कर्मठता, मिट्टी में इसकी घुली
त्याग ओज़ वचनबद्धता, विरासत में इसको मिली

इतिहास के पन्नों पर, दर्ज़ हैं जितनी कहानियां
वीरों की वो अमर गाथाएं, शौर्य की निशानियां

राजपूताना की यह आन बान, रखे सदा सबका मान
रण हो चाहे कृषि विज्ञान, बढ़ाई हमेशा हिंद की शान

विकास विद हैरिटेज की, नई डगर पर चल निकला है
बीमारू स्टेट की इमेज से, अब जाकर यह निकला है

सतरंगी जय राजस्थान, अतरंगी अंचल परिवेश
मेहमान को सब कहते जहाँ, पधारो नी म्हारे देस ।।

© rockshayar.wordpress.com
राॅकशायर इरफ़ान अली ख़ान

गुलाबी नगरी जयपुर

#विषयआधारितकविताएं(विआक)

“सफ़र कभी मुकम्मल नहीं होता है”

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सफ़र कभी मुकम्मल नहीं होता है
जहाँ से शुरू हुआ, वहीं ख़त्म होता है
ख़याल कभी दरअसल ख़याल नहीं होता है
जहाँ से पैदा हुआ, वहीं दफ़्न होता है
सफ़र कभी मुकम्मल नहीं होता है
जहाँ से शुरू हुआ, वहीं ख़त्म होता है ।

सफ़र के हमसफ़र हैं जो ये रास्ते
चल रहे यूँही ना जाने किसके वास्ते
राह में जो भी मिला साथ रख लिया
मंज़िल है एक मगर बदलते गए रास्ते ।

ख़्वाब कभी दरअसल ख़्वाब नहीं होता है
जहाँ से ताबीर हुआ, वहीं ख़त्म होता है
सफ़र कभी मुकम्मल नहीं होता है
जहाँ से शुरू हुआ, वहीं ख़त्म होता है ।

वक्त हर पल हर घङी गुज़रता जाता है
वक्त के साथ और भी निखरता जाता है
वक्त की बिसात पर शतरंज है मुकद्दर
बनता बिगङता और सँवरता जाता है ।

सवाल कभी दरअसल सवाल नहीं होता है
जहाँ से पैदा हुआ, वहीं दफ़्न होता है
सफ़र कभी मुकम्मल नहीं होता है
जहाँ से शुरू हुआ, वहीं ख़त्म होता है ।।

Copyright © 2015
RockShayar Irfan Ali Khan
All rights reserved.
रॉकशायर.वर्डप्रेस.कॉम

“ज़िंदगी में थोङा (#) हैश टैग ज़रूरी है”

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ज़िंदगी में थोङा हैश टैग ज़रूरी है
खुशियों से भरा कैश बैग ज़रूरी है
ख़्वाहिशों का बस्ता, कच्चा कोई रस्ता
कभी सीधा कभी जिगजैग ज़रूरी है
ज़िंदगी में थोङा हैश टैग ज़रूरी है ।

सपनो के नगर में वो अपना बैंक हो
उम्मीदों से भरा इस मन का टैंक हो
दिल की फ़ौज में, लाइफ के पोज में
बङे अफसर सा बङा अपना रैंक हो ।

साँसों के ट्रांजेक्शन में कैश बैक ज़रूरी है
ज़िंदगी में थोङा हैश टैग ज़रूरी है ।

जज़्बातों की आङ में रोज ठगी होती है
जज़्बातों पर मोहर दिल की लगी होती है
यादों के शरार में, खुद अपने इंतज़ार में
नींद में होकर भी ये आँखें जगी होती हैं ।

चाहत के चूल्हे पर दिल की देग़ ज़रूरी है
ज़िंदगी में थोङा हैश टैग ज़रूरी है ।

जीने को हैं केवल चार दिन
कहने को भले बेशुमार दिन
हर पल यहाँ कुछ ऐसे जी
हर पल लगे जैसे हज़ार दिन ।

ज़िंदगी में थोङा हैश टैग ज़रूरी है
खुशियों से भरा कैश बैग ज़रूरी है
ख़्वाबों का नाश्ता, तन्हा कोई रास्ता
कभी सीधा कभी जिगजैग ज़रूरी है
ज़िंदगी में थोङा हैश टैग ज़रूरी है
खुशियों से भरा कैश बैग ज़रूरी है ।।

Copyright © 2015
RockShayar Irfan Ali Khan
All rights reserved.
rockshayar.wordpress.com

 

“Dil ki Sada”

नींद को भी नींद तब तलक आती नहीं,

जब तलक वो माँ लोरियां सुनाती नहीं ।

घर से इतना दूर हूँ, या के मज़बूर हूँ ?

मैं रूठा हूँ कब से, और वो मनाती नहीं ।।

“Baat Man Ki”

सुनों समझो तुम सबकी यहाँ,

करो मगर अपने मन की यहाँ ।

लक्ष्य की ओर बढ़ते चलो बस,

लोग कहे चाहे तुम्हें सनकी यहाँ ।।

“एक पार्क मेरा दोस्त बन गया”

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एक पार्क है काॅलोनी के उस छोर पर
जहाँ अक्सर शाम को जाया करता हूँ ।

पता नहीं क्यों जाता हूँ ?
ना मुझे टहलना होता है !
ना कोई खेल खेलना होता हैं !
मैं फिर भी उस पार्क में जाता हूँ
जहाँ बच्चों के लिए झूले
और बुजुर्गों के लिए बेंचे लगी हुई हैं ।

पता नहीं मैं कौन हूँ ? बच्चा या बुजुर्ग !

कभी झूले से बेंच को तकता रहता हूँ
तो कभी बेंच पर बैठे हुए
उन झूलों के दरमियान
खुद को झूलता हुआ पाता हूँ ।

वैसे तो बहुत सी बेंचे लगी हैं वहां पर
मगर मुझे वो लकङी वाली बेंच
सबसे अच्छी लगती है
जहाँ से ठीक सामने
बच्चे झूले झूलते हुए दिखाई देते हैं ।

तन्हाई में अक्सर इसी बेंच पर बैठकर
अपनी कई पुरानी नज़्मों को
ताज़ा करता रहता हूँ ।
ऊँची ऊँची आवाज़ में बोलकर उन्हें
मोबाइल में रिकॉर्ड करता रहता हूँ ।

सुना है !
आवाज़ अल्फ़ाज़ में जान डाल देती है ।

रिकार्डिंग के वक्त
आस पास की कई आवाज़ें भी
बिन बुलाए मेहमान की तरह
बैकग्राउंड में शामिल हो जाती हैं…
“जैसे गिलहरी की आवाज़
बहती हवा का शोर
और खेलते कूदते बच्चों की
गूँजती हुई किलकारियाँ”

इस वहम के चलते शायद
मैं उन्हें हटाता नहीं हूँ
कि यह गूँजती हुई “अनवांटेड आवाज़ें”
उस दर्द को छुपा सके
जो नज़्म के भीतर क़ैद है कहीं”

हालांकि ऑडियो सॉफ्टवेयर से
एक्स्ट्रा नॉइज़ भी रिमूव करता हूँ ।
मगर वो जो ख़ामोशियों का नॉइज़
अहसास के सुलगते हुए पन्नों पर
वक्त की अमिट स्याही से उतरा हुआ हैं,
कोई सॉफ्टवेयर
भला उसे कैसे रिमूव कर सकता है !

उसी पार्क के कोने में एक पेङ है ।
बिल्कुल सूखा
ना कोई पत्ता है जिस्म पर
ना किसी शाख़ का साया ।
पता नहीं ज़िंदा भी है या मर गया !
टहलने वाले लोग उसे ठूंठ कहते हैं ।

उसी के नीचे बैठकर मैंने
कई तन्हा शामें गुज़ारी हैं
ताकि उसे भी अच्छा लगे ।
अकेलापन कितना डरावना होता है !
अच्छी तरह मालूम है मुझे ।

इसी बगीचे में एक बुजुर्ग
रोज अपने पोते के साथ टहलने आते है ।
वो मासूम बच्चा अपनी तोतली ज़बान में
कई बङे बङे सवाल पूछता रहता है
अपने दादा जी से ।
उन दोनों को देखकर
मुझे अपने दादा जी याद आ जाते है
जिनकी गोद में ना खेल पाया कभी मैं
मेरी पैदाइश से पहले ही वो चल बसे थे ।

पार्क के ही एक कोने में
माली ने अपना घर बना रखा है ।
कहने को घर है बस
घास फूस और बेलों से लदी हुई एक झोपङी ।
माली और पार्क यक़ीनन
घंटों तक बातचीत करते होंगे रोजाना ।
दोनों एक दूसरे के परिवार का
ख़्याल जो रखते हैं ।

पता नहीं इस पार्क में ऐसा क्या है ?
दिन भर की थकन से चूर होकर
जब भी इसके आगोश में समाता हूँ
ये बङे प्यार से आराम देता है मुझे ।

हम दोनों एक दूसरे को
बखूबी समझते हैं !

शायद इसीलिए आज
एक पार्क मेरा दोस्त बन गया ।।

“ज़िंदगी की धूप”

दर्द का पहरा हटाकर, ग़मों का कोहरा मिटाकर
दिल के आँगन में कहीं, ज़िंदगी की धूप निकली है

अंधियारे सब जल गए, उजियारे अब मिल गए
मनचले इस मन के वो, गलियारे सब खिल गए

चाहत की उस ज़मीं पर, नूर की पहली बारिश हुई
दिल में कई अंकुर फूटे, हूर सी उजली ख़ाहिश हुई

अनजान था जिन रंगों से, वो रंग मुझमें अब खिले हैं
अनजान था जिन लम्हों से, वो लम्हें मुझको अब मिले हैं

पलकों पर जितनी नमी थी, सीने में उतनी कमी थी
अब जाकर मालूम हुआ ये, जीने में कितनी कमी थी

मन के वो बंद किवाङ, एक एक कर खुलने लगे हैं
यादों के वो मैले पहाङ, एक एक कर धुलने लगे हैं

साँसों की गर्म आहट, मुझको सुनाई देती हैं अब
रातों की नर्म राहत, मुझको दिखाई देती हैं अब

वक्त की शाख़ों पर, अहसास कई खिलने लगे हैं
रूह की आँखों पर, अल्फ़ाज़ कई फलने लगे हैं

हर तरफ खुशियाँ है फैली, बन गई मन की सहेली
मुस्कुराना सीखा है जब से, हल हुई मन की पहेली

आहों के बादल हटाकर, रंज़ का काजल मिटाकर
दिल के आँगन में कहीं, ज़िंदगी की धूप खिली है ।।