“मिर्ज़ा असदुल्लाह खाँ ‘ग़ालिब’ (Tribute to Father of Poetry Mirza Asadullah Khan ‘Ghalib’)

जैसे ज़िस्म अधूरा है, रूह के बिना
जैसे दिन अधूरा है, रात के बिना ।

जैसे हुस्न अधूरा है, यार के बिना
जैसे वस्ल अधूरा है, दीदार के बिना ।

जैसे ख़्वाब अधूरा है, ख़्याल के बिना
जैसे जवाब अधूरा है, सवाल के बिना ।

जैसे आसमां अधूरा है, सितारों के बिना
जैसे बागबां अधूरा है, बहारों के बिना ।

वैसे ही अदब अधूरा है, ग़ालिब के बिना…

इक शख़्स नही, मुकम्मल अंदाज़ था वो
फ़क़त रक्स नही, मुसल्सल साज़ था वो

उर्दू फ़ारसी में ग़ुरूब, ख़ामोशी सुनता हुआ
शायरी के मौज़ूअ में, सरगोशी चुनता हुआ

अशआर कहे जो भी, ज़ाविदां वो शेर बन गए
इक़रार लिखे जो भी, दर्द वो सब ग़ैर बन गए ।

फ़क़त नौशा यूँही नही, बेहतरीन दर्ज़ा था वो
लक़ब असद यूँही नही, ज़हीन मिर्ज़ा था वो ।

रातों में ताबीर हुआ, रूह की तहरीर हुआ
कागज़ के पन्नों पर, हर्फ़ की तसवीर हुआ ।

अल्फ़ाज़ कहे जो भी, बा-अदब वो अफ़जल हुए
अहसास लिखे जो भी,उम्दा नज़्म-ओ-ग़ज़ल हुए

जैसे अक्स अधूरा है, आईने के बिना
जैसे लफ़्ज़ अधूरा है, मायने के बिना ।

जैसे जाम अधूरा है, लब के बिना
जैसे नाम अधूरा है, रब के बिना ।

जैसे मर्द अधूरा है, औरत के बिना
जैसे फ़र्द अधूरा है, कुव्वत के बिना ।

जैसे क़ल्ब अधूरा है, धङकन के बिना
जैसे इश्क़ अधूरा है, तङपन के बिना ।

वैसे ही सुख़न अधूरा है, ग़ालिब के बिना…

ऐसे अज़ीम-ओ-शान शायर को मेरा सलाम
ऐसे अज़ीम-ओ-शान शायर पर मेरा कलाम ।।

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