“पीठ पर शदीद गुनाहों का बोझ ढ़ो रहा हूँ”

पीठ पर शदीद गुनाहों का बोझ ढ़ो रहा हूँ,
ना जाने कितनी सदियों से यूँही रो रहा हूँ ।

चाहत का पेङ था जिस ज़मीं पर कभी,
उस ज़मीं पर आज नफ़रत के बीज बो रहा हूँ ।

हक़ीक़त को खुद से नज़रअंदाज़ करते हुए,
यूँ आईने के पीछे कब से दीवाना हो रहा हूँ ।

ख़्वाब में भी ख़्वाब अब तलक आते नहीं,
जागती आँखों के दरमियान कहीं सो रहा हूँ ।

दर्द का अहसास वो भूल ना जाये दिल कहीं !
तेज़ाब से उन ज़ख़्मों के निशान सब धो रहा हूँ ।

पाया था जितना भी मैंने खुद को ‘इरफ़ान’,
धीरे धीरे रफ़्ता रफ़्ता शख़्स वो अब खो रहा हूँ ।।

शदीद – अत्यंत, बहुत ज्यादा
गुनाह – पाप
हक़ीक़त – वास्तविकता
नज़रअंदाज़ – अनदेखी
रफ़्ता रफ़्ता – धीमे धीमे
शख़्स – व्यक्ति

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s