“खुद को पाने की ज़िद कर बैठा”

खुद को पाने की ज़िद कर बैठा,
मैं किस्मत आज़माने की ज़िद कर बैठा ।

तोङकर वो सारे बंधन अब,
आसमान पर छाने की ज़िद कर बैठा ।

औरों के घर बचाते बचाते आख़िर,
खुद अपना घर जलाने की ज़िद कर बैठा ।

खुली आँखों से देखा जो हर ख़्वाब तो, 
ख़्वाब सच कर जाने की ज़िद कर बैठा ।

खुद को दर्द पर दर्द दिए इस क़दर,
के सितम को ही सताने की ज़िद कर बैठा ।

ग़ैरों की चाहत में यूँ खुद से दूर होकर,
दूरियों को पास लाने की ज़िद कर बैठा ।

खुदग़र्ज़ इतना हुआ के ‘इरफ़ान’ वो,
खुद ही को मिटाने की ज़िद कर बैठा ।।

#RockShayar

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