लिखू तो आख़िर क्या लिखू ?

लिखू तो आख़िर क्या लिखू ?
सब कुछ तो लिखा जा चुका हैं
प्रेम विरह करूणा तङपन
सब कुछ तो लिखा जा चुका हैं ।

जो कुछ मैं सोच रहा हूँ
जो कुछ मैं देख रहा हूँ
ज़रूरी तो नहीं वो सच हो
ज़रूरी तो नहीं वो कुछ हो ।

लिखू तो आख़िर क्या लिखू ?
सब कुछ तो लिखा जा चुका हैं
राग द्वेष प्रकृति उपवन
सब कुछ तो लिखा जा चुका हैं ।

हज़ारों ख़याल आते हैं दिल में
हज़ारों सवाल उठते हैं दिल में
किसे थामू और किसे बुझाऊ ?
हज़ारों मशाल जलते हैं दिल में ।

कभी दर्द अपना सा लगता है
कभी इश्क़ अपना सा लगता है
बदलते रहते हैं मन के मिज़ाज
लिखना कोई सपना सा लगता है ।

लिखू तो आख़िर क्या लिखू ?
सब कुछ तो लिखा जा चुका हैं
नदी पहाङ खेत आँगन
सब कुछ तो लिखा जा चुका हैं ।

काग़ज़ पर चंद लकीरें
ज़िंदगी को है जो उकेरे
मुझ को रिंझाती है यूँ
जैसे बीन बजाते सँपेरे ।

कभी कोई वजह मिल जाती है
कभी कोई अदा मिल जाती है
मन के अंधेरों से कोसों दूर
रात को जैसे सुबह मिल जाती है ।

लिखू तो आख़िर क्या लिखू ?
सब कुछ तो लिखा जा चुका हैं
जन्म मृत्यु भाग्य जीवन
सब कुछ तो लिखा जा चुका हैं ।

लिखू तो आख़िर क्या लिखू ?
सब कुछ तो लिखा जा चुका हैं ।।

@rockshayar.wordpress.com

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