“सैलाब आ गया”

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उजङ गई वो बस्तियां
डूब गई सब कश्तियां
पशु पक्षी और इंसान
बह रहे हैं निर्जीव समान
ज़मी पर ग़ालिब है कुदरत
लगता है फिर सैलाब आ गया
लगता है फिर सैलाब आ गया ।

हर तरफ पानी ही पानी
कायनात लग रही है फ़ानी
नदी दरिया और समंदर
बन गए सब मौत के खंज़र
इंसां के लिए ज़ाहिर है इबरत
लगता है फिर सैलाब आ गया
लगता है फिर सैलाब आ गया ।

वबा फैली है चारो ओर
थम रहा साँसों का शोर
पेङ जंगल और पहाङ
बाक़ी बचा केवल उजाङ
आसमां से नाज़िल है आफ़त
लगता है फिर सैलाब आ गया
लगता है फिर सैलाब आ गया ।

जिधर देखो लाशों के ढ़ेर
सिर नहीं, कहीं नहीं है पैर
झुग्गी झोपङी और मक़ान
ग़रक़ हो गए खेत दुकान
इंसां से ख़फ़ा है कुदरत
लगता है फिर सैलाब आ गया
लगता है फिर सैलाब आ गया ।।

#राॅकशायर इरफ़ान अली ख़ान
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