“जो महसूस करता हूँ, उसे कहना चाहता हूँ”

जो महसूस करता हूँ, उसे कहना चाहता हूँ
मैं जैसा हूँ, जो भी हूँ, वैसा रहना चाहता हूँ ।

ना है कोई मंज़िल मेरी, ना कोई ठिकाना है
मुझको तो बस संग अपने, यूँही चलते जाना है
जो जैसा है, उसमें वैसे ही बहना चाहता हूँ
मैं जैसा हूँ, जो भी हूँ, वैसा रहना चाहता हूँ ।

खुद को कब से ढूँढ रहा हूँ, खुली दो आँखें मूंद रहा हूँ
दिल की ज़बान पढ़ता हुआ, अपनी राहें ढूँढ रहा हूँ
वक्त के जुल्म सब, अब खुद ही सहना चाहता हूँ
मैं जैसा हूँ, जो भी हूँ, वैसा रहना चाहता हूँ ।

दगा देना मुझको आता नहीं, बनावटीपन दिल को भाता नहीं
उतर जाए जो नज़रों से इक दफ़ा, फिर उसको आजमाता नहीं
तकरीर नहीं करता कोई बङी, बात बस इतनी कहना चाहता हूँ
मैं जैसा हूँ, जो भी हूँ, वैसा रहना चाहता हूँ ।

जो महसूस करता हूँ, उसे कहना चाहता हूँ
मैं जैसा हूँ, जो भी हूँ, वैसा रहना चाहता हूँ ।।

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