“मन के शीशे”

यूँ तो कहने को तुम कहीं नहीं हो
फिर भी क्यूँ लगता है तुम यही हो
हर वक्त हर घङी, मेरे आस पास
जब भी मन के शीशे टटोलता हूँ
तुम्हें अपने पास खङा देखता हूँ
मैं आईने में तुम्हें देखता रहता हूँ
और तुम मेरी आँखों के आईने में
यूँ खुद को निहारती रहती हो
बिना पलकें झपकाये एकटक
ताकि वो खुशी के आंसू
जो तुम्हारी आँखों में ठहरे हैं
छलक कर कहीं आ ना जाए बाहर
इसी कोशिश के चलते
कई दफ़ा तुमने अपनी आँखें सुजाई थी ।

अब जबकि तुम जा चुकी हो दूर कहीं
मगर ये मन मानने को राज़ी ही नहीं है
आज भी हर रोज जब आईना देखता हूँ
तो तुम पास खङी मुस्कुराती रहती हो
ये जताने के लिए 
के सब कुछ ठीक है, वैसा ही है
मगर अपने दिल के सुर्ख़ शीशे का क्या करू
जिसमें तेरे अक्स का नक्श क़ैद है
और कोई अक्स ये दिखाता ही नहीं
यही सोचकर आज मैंने
अपने मन का हर शीशा ढ़क दिया हैं
वक्त की चादर से 
ताकि कोई अक्स बने ही ना ।

यूँ तो कहने को तुम कहीं नहीं हो
फिर भी क्यूँ लगता है तुम यही हो
बस यही कहीं हो मुझमें कहीं ।।

#RockShayar