“इंसान”

क्या ख़ूब तरक्की कर रहा हैं इंसान
हर सू हर जगह, बस मर रहा हैं इंसान ।

उजङी बस्तियां, बिखरी लाशें, जलते मक़ान 
हैवानियत को भी शर्मसार, कर रहा हैं इंसान ।

ज़मीन को फाङकर, आसमान को चीरकर
फ़ज़ाओ में ये कैसा ज़हर, भर रहा हैं इंसान ।

जिस्म के बाज़ार की तो बात ही छोङिए,
रुह तक अब अपनी, फ़रोश कर रहा हैं इंसान ।

मिट्टी से बना हैं जो, गुनाहों में सना हैं जो 
इंसानियत के, वो कोरे दावे कर रहा हैं इंसान ।

हक़ीक़त बस इतनी, जान ले ‘इरफ़ान’ तू
इंसान के हाथों ही यहाँ, मर रहा हैं इंसान ।।

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