“कदम कदम पर यहाँ”

कदम कदम पर यहाँ, छल फ़रेब और धोखे हैं
ज़िंदगी के झूठे बेर, सचमुच कितने अनोखे हैं

कोई बातों से फाँस लेता है
कोई आँखों से
कोई हँसी से झाँस लेता है
कोई निगाहों से

कदम कदम पर यहाँ, झूठ नकाब और वादे हैं
सच के फर्ज़ी दस्तख़त, एकदम सीधे सादे हैं

कोई कहता है मैं सच्चा हूँ
कोई कहता है मैं अच्छा हूँ
अपनी अपनी चलाये सब
जैसे के मैं तो कोई बच्चा हूँ

हर गली हर मोङ पर मिलते, ठग दरोगा गुंडे हैं
किराये के टट्टू यह सब, तगङे और मुस्टंडे हैं

कदम कदम पर यहाँ, छल फ़रेब और धोखे हैं
ज़िंदगी के झूठे बेर, सचमुच कितने अनोखे हैं ।।

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