“कंजूस(Miser)”

#ObjectOrientedPoems(OOPs)

बिना सालन के रोटी खाता है वो,
जाने किसके लिए इतना पैसा बचाता है वो ।

अपनी ज़रूरतों पर परदा डालकर,
हर रोज ज़रूरत से ज्यादा ही कमाता है वो ।

पैसा बचाना ही पैसा कमाना कहे जो,
रात हो या दिन राग बचत का गुनगुनाता है वो ।

ख़र्च करता है ज़िंदगी, ख़र्चो के चर्चो पर,
ख़र्चा हो जब औरों का तब ही मुस्कुराता है वो ।

हजम करके किफ़ायत का अचार, इस क़दर लेता है डकार,
बिना कुछ खाये ही सब कुछ पचाता है वो ।

जूस का भी जूस निकाले, ख़्यालों में अंडे उबाले,
तब जाकर कहीं यारों कंजूस कहलाता है वो ।।

Copyright © 2015, RockShayar
Irfan Ali Khan
All rights reserved.
 

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