“जनता”

Yeh public hain….sab chupchap sahti hain…

जाने क्यों बहती हुई गंगा में बहती हैं जनता,
सब कुछ देखकर भी यूँ चुपचाप रहती हैं जनता ।

पहले तो उसे सुनती हैं फिर वोट देकर चुनती हैं,
और बाद में उसी की तानाशाही सहती हैं जनता ।

बातें करवा लो चाहे दुनिया भर की बङी बङी,
मगर जब ज़ुल्म होता हैं तो गूंगी खङी रहती हैं जनता ।

चट कर रहे जो हर पल देश को दीमक की तरह,
उन्ही नेताओं को अपना रहनुमा कहती हैं जनता ।

कहने को तो सब जनता का हैं जनता के लिए,
बस इसी फ़रेब तले सब कुछ सहती हैं जनता ।।

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