“महसूस किया है मैंने तुझ को कल ख़्वाब में”

महसूस किया है मैंने तुझ को कल ख़्वाब में,
नज़रों ने खुद ख़त लिखे नज़रों के जवाब में ।

ढूँढता आया मैं जिसे बरसो यहाँ से वहाँ,
ज़िंदगी वो मिली यूँ आज रूह के हिज़ाब में ।

वक्त तो लगा बहुत वक्त के मिलने में मगर,
वक्त गुज़रता ही गया खुद वक्त के हिसाब में ।

कह गए वो शायर सब इश्क़ ही इबादत है,
सुकूं मिला जो अब कहीं इबादत के सवाब में ।

मीर की ग़ज़ल कहूं या कहूं नज़्म गुलज़ार की
लिखी है जो सुरमई इन पलकों की किताब में ।।

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