“इजाज़त को भी इजाज़त नहीं है”

इजाज़त को भी इजाज़त नहीं है, इस दिल में दाख़िल होने की,
मग़रूर मोहब्बत की मशहूर उस, महफ़िल में शामिल होने की ।

इबादत में रहो जब तलक, सज़्दारेज़ हो जाए फ़लक,
शर्त है बस इतनी सी यहाँ, रहमत के नाज़िल होने की ।

खूं से वो अंगारे बुझाए, बुझा बुझा कर फिर जलाए,
आसां नहीं तस्वीर यहाँ, हिम्मत के हासिल होने की ।

क़ाबिज़ हुआ है जब से मेरे, क़ल्ब पर क़ल्बसाज़ कोई,
मिलती नहीं फिर कोई निशानी, ईमान फ़ाज़िल होने की ।

मक़तूल फिर रहा वो शख़्स, तब से यहाँ से वहाँ,
गवाही दी जिस रोज उसने, अपने ही क़ातिल होने की ।

‘इरफ़ान’ लिखता ही रहा, दर्द के पन्नों पर हरफ़,
और लोग तारीफ़ करते रहे, गज़ल के क़ाबिल होने की ।।

‪#‎राॅकशायर‬ ‘इरफ़ान’ अली ख़ान

:-अल्फ़ाज़ के मानी:-

इजाज़त – अनुमति
दाख़िल – प्रवेश
मग़रूर – घमंडी
मशहूर – प्रसिद्ध
महफ़िल – सभा
इबादत – पूजा
सज़्दारेज़ – झुका हुआ
फ़लक – आसमान
रहमत – कृपा
नाज़िल – उतरना
क़ाबिज़ – कब्जा करना
क़ल्ब – दिल
क़ल्बसाज़ – खोटे सिक्के बनाने वाला
ईमान – सत्य
फ़ाज़िल – विद्वान
मक़तूल – मृत
हरफ़ – शब्द
क़ाबिल – योग्य

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