“सीने में जाने कब से एक आग जल रही है”

सीने में जाने कब से एक आग जल रही है
लपटों में जिसकी ये मेरी ज़िंदगी पल रही है ।

अंगारों से आजकल, डरती नहीं ये रूह भी
जलकर हाँ हर दफ़ा फिर से जो जल रही है ।

शिकवा करे तो क्यूँ, अपनी बर्बादी का यहाँ
बदलते वक्त के साथ हर तस्वीर बदल रही है ।

दीदार किया है दिल ने, जब से दर्दे दिल का
निगाहों को वो तब से हाँ रोशनी ख़ल रही है ।

अब और क्या इल्ज़ाम लगाओगे ‘इरफ़ान’ तुम
मुझको ये खुदगर्ज़ मेरी ख़्वाहिशें छल रही है ।।

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