रात की सिसकियां सुनी हैं कभी ?

Inspired by Gulzar Sahab’s “Rooh dekhi hai kabhi….Rooh ko mahsoos kiya hai ?

रात की सिसकियां सुनी हैं कभी ?
अंधेरे के दर्द को महसूस किया है ?

बादलों की बैचैनियां ग़रजती रहती हैं
रातभर शबनमी बूँदें बरसती रहती हैं

ख़्वाबों के तकिये सब गीले हो जाते हैं
नींद के साये खुद नींद को तरसाते हैं

रात की हिचकियां सुनी हैं कभी ?
चाँद के दर्द को महसूस किया है ?

साहिल पर लहरें मचलती रहती हैं
रेत के घरौंदे सब निगलती रहती हैं

अधजगे ख़त अपने घर लौटते रहते हैं
ज़िंदगी के किस्से मन कचोटते रहते हैं

रात की खामोशियां सुनी हैं कभी ?
अंधेरे के दर्द को महसूस किया है ?

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