“गुज़रे कल को याद कर, तू आज क्यूँ रोता है”

गुज़रे कल को याद कर, तू आज क्यूँ रोता है ?
अपने कल की फ़िक़्र में, अपना आज क्यूँ खोता है ?

वजह हर दफ़ा कोई, ज़रूरी तो नही
फिर बेवजह खुद से तू, नाराज़ क्यूँ होता है ?

जानता है नींदों में तेरी, ना रहा अब वो सुकूं
फिर बेख़बर हर शब तू, बेनमाज़ क्यूँ सोता है ?

सीने में सुलगते अरमान, इश्क़ के बेतुके फ़रमान
जलाये जो हर पल तुझे, वो जज़्बात क्यूँ ढोता है ?

चंद काग़जी लकीरें, लगे कि सरसब्ज़ जज़ीरे
दिल की ज़मीं पर, दिलफ़रेब अल्फ़ाज़ क्यूँ बोता है ?

जानता है ये ‘इरफ़ान तू, धूल से है बना इंसान तू
फिर मौत की फ़िक़्र में, ज़िंदगी का अहसास क्यूँ खोता है ?

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