“गुनगुनाहट तेरी रूह को वज़ूद देती है”

थपथपाहट तेरी मुझ को जुनून देती है
मुस्कुराहट तेरी दिल को सुकून देती है

मोहब्बत की है तुमसे, ओ जाने जानाँ
गुनगुनाहट तेरी रूह को वज़ूद देती है ।।

“गुज़रे कल को याद कर, तू आज क्यूँ रोता है”

गुज़रे कल को याद कर, तू आज क्यूँ रोता है ?
अपने कल की फ़िक़्र में, अपना आज क्यूँ खोता है ?

वजह हर दफ़ा कोई, ज़रूरी तो नही
फिर बेवजह खुद से तू, नाराज़ क्यूँ होता है ?

जानता है नींदों में तेरी, ना रहा अब वो सुकूं
फिर बेख़बर हर शब तू, बेनमाज़ क्यूँ सोता है ?

सीने में सुलगते अरमान, इश्क़ के बेतुके फ़रमान
जलाये जो हर पल तुझे, वो जज़्बात क्यूँ ढोता है ?

चंद काग़जी लकीरें, लगे कि सरसब्ज़ जज़ीरे
दिल की ज़मीं पर, दिलफ़रेब अल्फ़ाज़ क्यूँ बोता है ?

जानता है ये ‘इरफ़ान तू, धूल से है बना इंसान तू
फिर मौत की फ़िक़्र में, ज़िंदगी का अहसास क्यूँ खोता है ?

“वो है दैनिक भास्कर”

#ObjectOrientedPoems(OOPs)

bhaskar poem

ख़बरें सुर्ख़ियां चर्चा, देश दुनिया की ख़ास कर
प्रिंट मीडिया का सरताज़, वो है दैनिक भास्कर

हफ़्ते की शुरुआत, नो निगेटिव न्यूज के साथ
रोज़मर्रा की हलचल, पॉजिटिव व्यूज के साथ

ज़िंदगी में मधुर रस घोले है, हर रविवार रसरंग यहाँ
चटपटे वो सब राज़ खोले है, हर शनिवार नवरंग यहाँ

गागर में सागर लिए है, सिटी भास्कर की दुनिया
शहर के हालात सब, और परदे के पीछे की दुनिया

मधुरिमा हो जैसे कोई, ज्ञान का सागर शब्दकोश
लाइफ को ईज़ी बना दे, बताये सब गुण और दोष

क्लासिफाइड सेक्शन मिलाये, आपको अपनी मंज़िल से
फंडा ऑनली देट यह कि, ज़िंदगी तुम जियो दिल से

मन की अभिव्यक्ति करता है, संपादकीय पृष्ठ यहाँ
उम्मीदों पर खरा उतरे है, पत्रकारिता उत्कृष्ट जहाँ

हो चाहे बिज़नेस की बातें, या हो खेलों की दुनिया
लेटेस्ट अपडेट्स से भरी, यह एक अनोखी दुनिया

आयाम नये स्थापित किये, हर बाधा को पार कर
करोड़ों पाठकों का विश्वास, वो है दैनिक भास्कर ।।

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सवेरे सवेरे आज एक ख़्वाब आया है

सवेरे सवेरे आज एक ख़्वाब आया है
तुम्हारा घर देखा मैंने उसमें
पहाड़ों से सटा हुआ
वादियों में बसा हुआ
दरवाजे के पास
गुलाब की क्यारी
और उसी के पास खड़ी हुई तुम
मुझे यूँ देखकर खुश हो रही थी
दावत पर बुलाया था तुमने
शायद घर में कोई फंक्शन था
फ़ोन पर इतना ही कहां था तुमने
कि तुम्हें तो आना ही है
जब तुम्हें मुझे अपना घर दिखा रही थी
मैं तुम्हारी आँखों में अपना घर बना रहा था
घर के लोगों से मिलवाते वक़्त
तुम कुछ शरमा रही थी
और मैं तुम्हें घूरता ही जा रहा था
जाते वक़्त तुमने पीछे से आवाज़ दी
और नींद खुल गयी उसी वक़्त
वो ख्वाब महज़ एक ख़्वाब ही रह गया
सुना है के सुबह के ख़्वाब सच हो जाया करते है
मैं इसी उम्मीद में दुबारा
सोने की कोशिश में लगा हूँ
ताकि वो ख़्वाब फिर से आये
जहाँ हम दोनों इक दूजे को
ख़ुदा हाफिज भी न कह पाये थे
सवेरे सवेरे आज एक ख़्वाब आया है ।।

“वो सुन ना पाए दिल की तङप कभी”

उसने देखा ही नहीं मेरी तरफ कभी
मैं के लिखता रहा इश्क़े हरफ़ सभी

ज़िंदगी गुज़र गई यूँही इंतज़ार में
और वो सुन ना पाए दिल की तङप कभी ।।

Usne dekha hi nahi meri taraf kabhi
Main ke likhte raha ishqe haraf sabhi

Zindagi guzar gayi yoonhi intzar mein
Aur wo sun naa paye dil ki tadap kabhi…

“जाने कौन थी वो हसीना”

गुलाबी नगरी से
सुबह जल्दी रवाना होकर
शहरे दिल्ली आ पहुँचा
मैं उस रोज दोपहर तक
महफ़िले अदब में शिरकत करने की ख़ातिर
रोङवेज बस स्टैंड पर उतरकर
कश्मीरी गेट मेट्रो स्टेशन पहुँचा
और वहां से टिकट लेकर
ख़ान मार्किट मेट्रो स्टेशन पर उतरा
स्टेशन से बाहर निकलने के लिए
ज्योंही मैं एस्केलेटर पर सवार हुआ
तब दफ्अतन कुछ ऐसा हुआ कि
हुस्ने इत्तिफ़ाक़ से उस नाज़नीं से
नूरे नज़र रूहे रहबर माहज़बीं से
टकरा ही गई मुसव्विर नज़रें मेरी
गुमनाम सी हमनाम एक हसीं से
सुर्ख़ से लिबास में लिपटी हुई
हुस्न के आगोश में सिमटी हुई
जुल्फों के घनेरे बादल
निगाहों के है जो काज़ल
जाने कौन थी वो हसीना
देखते ही जिसको
दिल्लीवाली गर्लफ्रेंड की
फीलिंग आ रही थी
और इत्तिफ़ाक़ तो देखिए
वो मुझको जानती थी
शक्ल से पहचानती थी
शायद नज़रें पढ़ने का हुनर
उसे भी बख़ूबी आता था
आख़िर सलाम दुआ हुई
गुफ़्तगू के बहाने कुछ वक़्त मिला
तो पता चला कि
हम दोनों की मंज़िल भी एक ही है
और बातों ही बातों में ज़िक़्र हुआ
फेसबुक पर हुई उस मुलाक़ात का
फिर तो वक़्त का पता ही नहीं चला
वो लम्हा जैसे वहीं ठहर सा गया
समझ रहा था जिसे मैं
अनजान एक हसीना
दरअसल वो भी मेरी तरह
लफ़्ज़तराश ही निकली
शायद इसीलिए उस रोज
जो भी मैंने महसूस किया
वो आज यूँ नज़्म बनकर
काग़ज़ पर उतर आया है ।।

“किताबेरूख़ देखकर तेरा मैं हर्फ़ बन गया”

किताबेरूख़ देखकर तेरा मैं हर्फ़ बन गया
दुआओं से हासिल हुआ, रूही शर्फ़ बन गया

नूरे नज़र जाने जिगर, तेरा ही तो है ये असर
पहले था ग़ाफ़िल, अब तो कुछ ज़र्फ़ बन गया

हिज़्र की आग में, बरसो तक जलता ही रहा
पाकर वो सर्द तासीर तेरी, मैं बर्फ़ बन गया

क़तरा क़तरा खुद में, महसूस किया है मैंने तुझको
साँसों ही साँसों में, अहसास का अर्फ़ बन गया

दर बदर फिरता रहा, ख़्यालों में ‘इरफ़ान’ सदा
सोहबत मिली जो तेरी तो, मुक़म्मल हर्फ़ बन गया ।।

किताबेरूख़ – प्रेमिका का किताबी चेहरा
हर्फ़ – अक्षर, शब्द
रूही – आत्मिक
शर्फ़ – श्रेष्ठता
नूरे नज़र – आँखों की रोशनी
जाने जिगर – प्राणों से प्यारा
ग़ाफ़िल – लापरवाह
ज़र्फ़ – योग्यता
हिज़्र – जुदाई
तासीर – प्रकृति
क़तरा क़तरा – बूँद बूँद
अर्फ़ – खुशबू
सोहबत – संगत
मुक़म्मल – सम्पूर्ण

 

“हिंदी”

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Hindi day poem

हिंद का रहने वाला हूँ, हिंदी से मुझे प्रीत है
निर्मलता की परिभाषा, मधुर एक संगीत है

शब्दों में प्रवाहित इसके, जीवन का रहस्य है
विचारों की अभिव्यक्ति, सरसता का दृश्य है

मातृभाषा की उन्नति में ही, राष्ट्र की उन्नति है
फिर क्यों आज दयनीय यह, हिंदी की स्थिति है

सुनो ऐ हिंद के कर्णधारों, निद्रा से अब उठ जाओ
हिंदी के मस्तक पर, फिर से स्वर्ण मुकुट सजाओ

गौरव से इसके तुम, साहित्य को पल्लवित करो
राष्ट्रभाषा है यह तो, सदैव इसका अभिनंदन करो

उर्दू में गर बयां करू तो, हिंदी से मुझे इश्क़ है
तहज़ीब की ज़बान यह, अदब जिसका मुश्क़ है

हिंद का रहने वाला हूँ, हिंदी से मुझे प्रीत है
सरलता की परिभाषा, मधुर एक संगीत है ।।

“Save Childhood”

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Save childhood poem

मासूम बचपन को, करे है जो हर रोज ग़र्क़
भारी भरकम बस्ता, और उस पर होमवर्क

पैरंट्स की आकांक्षाओं तले, दबा है बचपन
भविष्य की चिंताएं लिए, सहमा है बाल मन

खेलने का जब ये दिल करे, कहते है खेलों मत
अधूरा है अभी होमवर्क बहुत, इसे टालो मत

स्कूल, किताबें, क्लास, टेस्ट, प्रॉजेक्ट और ट्यूशन
नॉलेज तो बहुत ले ली, नहीं बन पा रहे वो ह्यूमन

सुबह सुबह कंधों पर, उम्मीदों का यह बोझ लादे
टैम्पो में ठसाठस भरे हुए, लगते है ये नन्हें प्यादे

हर हाल में फर्स्ट आना है, चाहे फील्ड कोई भी हो
प्राइज तो अपने घर ही लाना है, चाहे शील्ड कोई भी हो

सफलता की घुट्टी पिला दो, जो भी हो एक छुट्टी दिला दो
रट लिए हैं आज पाठ बहुत, स्कूल की जल्दी छुट्टी करा दो

जाने कैसी कोढ़ मची है, जैसे कोई होङ मची है
मासूमियत हुई लापता, अंधी कोई दौङ मची है

बचपन हो रहा विलुप्त, नहीं है इसमें कोई तर्क़
वो काग़ज़ की कश्ती, जाने कहाँ हो गई है ग़र्क़ ।।

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“ना दुआ का अमल आता है, ना इबादत का शऊर”

ना दुआ का अमल आता है, ना इबादत का शऊर
गुनाह करने की मुसल्सल, अपनी आदत से हूँ मज़बूर

वो जो दिलों के हाल जानता है
मुझको मुझसे ज्यादा पहचानता है
अता किया है उसी ने ये हुनर
के दिल भी अब तो दिल की मानता है

ना इश्क़ का शग़ल पता है, ना मोहब्बत का दस्तूर
वफ़ा करने की मुसल्सल, अपनी आदत से हूँ मज़बूर

वो जो ख़ामोश किस्से कहता है
मुझमें मुझसे ज्यादा कहीं रहता है
ज़ुदा किया है उसी ने इस क़दर
के जिस्म भी अब तो रूह सा बहता है

ना मौत की शक़ल पता है, ना ज़िंदगी का वज़ूद
जीने मरने की मुसल्सल, अपनी आदत से हूँ मज़बूर

वो जो हर जगह नुमायाँ है
तुझमें मुझमें सब में समाया है
पैदा किया है उसी ने ये बशर
के हर ज़र्रा यहाँ पर उसी की माया है

ना दुआ का अमल आता है, ना इबादत का शऊर
गुनाह करने की मुसल्सल, अपनी आदत से हूँ मज़बूर ।।

Tribute to 9/11

बहुत कुछ बदला था उस रोज
जब आसमान छूती हुई इमारतें
यूँ एक एक करके
ज़मीन पर गिर रही थी
कि जैसे कोई बूढ़ा पेङ
घुटनों के बल धङाम से गिर रहा हो
और साथ में टूट रहे है
उन नादान परिंदों के घर
जो कई बरसो से वहाँ रह रहे थे

ज़िंदगी हर रोज की तरह चल रही थी
बिना किसी ख़ौफ़ के, डर के
लोग अपने अपने कामकाज़ में मशगूल थे
अनजान इस बात से कि
शैतान अपना तीर छोङ चुका है
हवा के रूख़ को मोङ चुका है
चंद मिनटों का खेल रचा उसने
और फिर देखते ही देखते
हर तरफ दहशत फैल गई
चारो ओर लाशों के ढ़ेर
ढ़हती हुई ऊपरी मंजिलें
और उन पर से गिरते हुए इंसान
यूँ लग रहे थे
मानों चींटियों का झुंड कोई
दीवार से फिसल फिसल कर
बार बार गिर रहा है, उठ रहा है

सब कुछ तहस नहस हो रहा था
आसमां ज़मीं को देखकर रो रहा था
इंसानियत का क़त्ल हुआ था उस रोज
जब हैवानियत के सौदागरों ने
यूँ एक एक करके
दफ़्न किया ज़िंदगी को

हाँ बहुत कुछ जला था उस रोज
कहीं कोई जिस्म
कहीं कोई मुल्क़
कहीं कोई दिल
कहीं कोई रूह
हिसाब नहीं है कोई जिसका
ना कोई जवाब है
बस एक ज़ख़्म है
हर साल जो
नौवें महीने की ग्यारहवीं तारीख़ को
ज़िंदा हो उठता है ।।

“चाहत”

खुद को पाने की चाहत में
खुद ही से दूर होता गया
चंद ख़्वाबों की हसरत में
हक़ीक़त से दूर होता गया

जाने कितने अरमान जलाये
जलाकर हर दफ़ा फिर से बुझाये
जो ना बुझ सके वो सीने में दफ़नाये

मुकम्मल होने की चाहत में
मुख़्तसर से दूर होता गया
चंद वफ़ाओ की हसरत में
दिल ये मज़बूर होता गया

जाने कितने अल्फ़ाज़ सजाये
सजाकर हर दफ़ा फिर से मिटाये
जो ना मिट सके वो साँसों में बसाये

मंज़िल पाने की चाहत में
रास्तों से दूर होता गया
चंद ख़यालों की हसरत में
हक़ीक़त से दूर होता गया

जाने कितने अहसास जगाये
जगाकर हर दफ़ा फिर से सुलाये
जो ना सो पाये वो आँखों में छुपाये

माहताब पाने की चाहत में
सितारों से दूर होता गया
चंद ख़्वाबों की हसरत में
हक़ीक़त से दूर होता गया

खुद को पाने की चाहत में
खुद ही से दूर होता गया
मैं खुद ही से दूर होता गया ।।

 
 

“संवेदना रहित नही हूँ”

संवेदना रहित नही हूँ, मैं वेदना सहित हूँ
स्वयं को पाना अगर अपराध है तो, हाँ मैं पतित हूँ
छल कपट से दूर होकर, स्वर्ण मुकुट से मुँह मोङकर
स्वयं की सुनना अगर अपराध है तो, हाँ मैं पतित हूँ

रीति रिवाजों की भेंट चढ़कर, मृत्यु को गले लगाया
पल पल की उस मृत्यु ने, हृदय को पाषाण बनाया
राग द्वेष तन मन गलाकर, भावावेश सब कुछ जलाकर
भाव रहित होना अगर अपराध है तो, हाँ मैं पतित हूँ

सहस्र अग्नि जलाती रही, संगीत को भुलाती रही
अतीत के भयावह उस, विचित्र गीत को गाती रही
मोह माया सब छोङकर, देह अनुबंध अब तोङकर
आत्मा से जुङना अगर अपराध है तो, हाँ मैं पतित हूँ

पग पग पर छला गया, पग पग पर ठगा गया
सपना जो टूटा मेरा, नींद से मुझको जगा गया
कसमे वायदे सब छोङकर, नियम क़ायदे सब तोङकर
राह नई चुनना अगर अपराध है तो, हाँ मैं पतित हूँ

संवेदना रहित नही हूँ, मैं वेदना सहित हूँ
दिल में उतरकर देखो, मैं वेदना सहित हूँ
बिखरी सब यादें जोङकर, रिश्तें नाते सब तोङकर
स्वयं को पाना अगर अपराध है तो, हाँ मैं पतित हूँ
हाँ मैं पतित हूँ ।।

“बस इतनी गुज़ारिश है तुमसे”

बस इतनी गुज़ारिश है तुमसे
तसव्वुर पर बंदिशें ना लगाना
रूह को बेहद सुकूं मिलता है
जब तुम्हारे बारे में सोचता हूँ
मगर ये जख़्मी दिल डरता है
इसीलिए लफ़्ज़ों में बयां करता हूँ
थोङा ऐतबार करो मुझ पर
दोस्त हूँ मैं कोई ग़ैर नही
मोहब्बत हुई है गुनाह तो नहीं
मेरे लिए वो अहसास हो तुम
महसूस करता हूँ हर लम्हा जिसे
दूर होकर भी मेरे पास हो तुम
कभी तो वो दिन भी आयेगा
जब मैं तुम्हें याद आऊँगा बहुत
और तुम यूँ ख़ामोश बैठी हुई
अल्फ़ाज़ में ज़िंदा पाओगी मुझे ।।

 
 

“TEACHER”

‪#‎ObjectOrientedPoems‬(OOPs)

Teacher poem
अज्ञानता को मिटाने का, है जिनके पास स्मार्ट फीचर
नाम है यूँ तो अनेक उनके, गुरु उस्ताद शिक्षक टीचर

समाज की बैकबोन है वो, नॉलेज का ग्रीन जोन है वो
जिज्ञासा हो चाहे कैसी भी, ऑलवेज एवर ओन है वो

क्लास में अपनी हरदम हमेशा, ज़िंदगी का पाठ पढ़ाये
पढ़े जो कोई मन लगाकर, ज़िंदगी भर वो भूल ना पाये

हाथों में छड़ी, आँखों पर ऐनक, और रौबदार आवाज़
यही वो शख़्सियत है, बनाये जो एक बेसुरे को साज़

सदियों से पावन और ऊँचा, गुरु शिष्य का रिश्ता अनूठा
इसी रिश्तें के सदके में, एकलव्य ने अर्पित किया अंगूठा

जीवन में निरंतर आगे बढ़ना, छात्रों से सदैव यही कहना
हर मोड़ पर हाँ तुम, गलत को गलत, सही को सही कहना

इंसानियत को बचाने का, है जिनके पास आर्ट फीचर
नाम है यूँ तो अनेक उनके, गुरु उस्ताद शिक्षक टीचर ।।

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“मेरी माँ ने रो रोकर दुआएं मांगी है”

यूँही नही बरसा है रहमतों का बादल मुझ पर
मेरी माँ ने तहज्जुद में रो रोकर दुआएं मांगी है ।।

रहमत – खुदा की कृपा
तहज्जुद – आधी रात के बाद पढ़ी जाने वाली नमाज़

“तन्हा दिल घबराता है”

दिन भर तो यूँ हँसते मुस्कुराते गुज़र जाता है
रात होते ही मगर, यह तन्हा दिल घबराता है

जीने की वजह कोई, अब तू ही बता दे खुदाया
या रिहा कर उस दर्द से, जो मुझको जलाता है ।।