“ये कैसा वैचारिक उन्माद है”

“ये कैसा वैचारिक उन्माद है”
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ये कैसा वैचारिक उन्माद है ?
ये कैसा औपचारिक संवाद है ?
शिथिल हो गई है हर एक भाषा
ये कैसा वैधानिक अपवाद है ?

मलिन हो रहे है सब धवल यहाँ
कुलीन कहलाये अब गरल यहाँ
कल्पना दृष्टि की अभिकल्पना का
ये कैसा नैसर्गिक अनुवाद है ?
जटिल हो गई है हर एक आशा
ये कैसा वैचारिक उन्माद है ?

नवाचार के नाम पर, दुराचार है फैला
सदाचार भी अब तो, है कितना मैला
भौतिकवादी युग के भावों का
ये कैसा अभौतिक अनुनाद है ?
कुटिल हो गई है हर एक गाथा
ये कैसा वैधानिक परिवाद है ?
शिथिल हो गई है अब आत्म भाषा
ये कैसा वैचारिक उन्माद है ?
ये कैसा वैचारिक उन्माद है ।।

#TheRockShayar

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