“मदद तुम्हारी वोह करेगा” (On Nepal Disaster)

मदद करो गर दुखियों की
मदद तुम्हारी वोह करेगा

आँसू पोंछो गर बेबसो के
आँसू तुम्हारे वोह पोंछेगा

बिना उसके धूल हो तुम
फिर भी यूँ मशगूल हो तुम

इंसां हो तुम ये याद रखो
दुआ में अपने हाथ रखो

जब भी तू ग़ाफ़िल हुआ
क़हर तभी नाज़िल हुआ

कर ले तौबा अब भी तू
है इक मौका अब भी यूँ

मदद करो गर ज़ईफो की
मदद तुम्हारी वोह करेगा

आँसू पोंछो गर बेकसो के
आँसू तुम्हारे वोह पोंछेगा ।।

“गीली हवा का झोंका”

सूखे सूखे बदन पर, गीली हवा का झोंका
छूकर आया है तुझे, गीली हवा का झोंका

तन से चिपटता हुआ, मन में सिमटता हुआ
आवारा लगे है फिर, गीली हवा का झोंका

बारिश की ख़्वाहिश में, अधजगी नींद लिए
रूह को करता है तर, गीली हवा का झोंका

बादलों की सारंगी पर, बूंदो के है तार खिंचे
गाये राग मल्हार वोह, गीली हवा का झोंका

बंजर ज़मीन को, कर दे सरसब्ज़ ‘इरफ़ान’
लगे सावन का ख़ुमार, गीली हवा का झोंका ।।

“ख़्याल में भी तेरा ख़्याल इक ख़्याल लगता है”

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ख़्याल में भी तेरा ख़्याल इक ख़्याल लगता है
सदियो से फ़क़त अधूरा कोई सवाल लगता है

ख़्वाब में भी ख़्वाब नज़र आता है जो ‘इरफ़ान’
नक्श तेरा वो ज़िंदगी का ज़िंदा कमाल लगता है ।।

“खुद को पाना ही इस दिल की हसरत हो गई”

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नफ़रत को भी नफ़रत से इतनी नफ़रत हो गई
कि आग में खुद को जलाना भी मसर्रत हो गई

ख़ताओ के साये में पली है ये मुहब्बत जब से
ज़िंदगी वोह तब से हाँ बेइरादा फ़ितरत हो गई

वक्त लगता है बहुत इक पल में नहीं होता ये सब
दर्द सहते सहते यूँ बेदर्द सी ये कुदरत हो गई

पढ़ो कभी तुम भी वक्त से कुछ वक्त निकालकर
कहूँ मैं क्याँ दास्तां ही मेरी इक इबरत हो गई

खुद को खोया है जब से एक हादसे में ‘इरफ़ान’
खुद को पाना ही इस दिल की हसरत हो गई ।।

मसर्रत -खुशी
ख़ता – गलती
दास्तां – कहानी
इबरत – दुर्घटना जिससे कोई सीख मिले

“दिल में तेरे हो नाम अली”

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दिल में तेरे हो नाम अली
निकल चल तू अपनी गली
राहें वोह सब पहन ले तू
आहें वोह अब रहन दे तू
खिलने लगे मन की कली
निकल चल तू अपनी गली
दिल में तेरे हो नाम अली

फिकर विकर सब छोङ दे तू
ज़िन्दगी को नया मोङ दे तू
रास्ते तू अपने खुद बना ले
इरादे तू अपने खुद सजा ले
मचलने लगे मन की कली
निकल चल तू अपनी गली
दिल में तेरे हो नाम अली

मुश्किलें आये तो आने दे
दर्द को भी बेदर्द हो जाने दे
बाद उसके सवेरा मिलेगा
थके तन को बसेरा मिलेगा
खिलने लगे मन की कली
निकल चल तू अपनी गली
दिल में तेरे हो नाम अली ।।

‪#‎RockShayar‬

“कहाँ गुम है तू ओ मेरे रहबर”

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पयाम ना कोई ना कोई खबर
कहाँ गुम है तू ओ मेरे रहबर

आकर देख मैं कैसे जी रहा हूँ
छूकर देख दर्द कैसे पी रहा हूँ

सदियाँ गुज़र गई ना आया तू
मरहम ना कुछ सपने लाया तू

देख कैसे सूज गई है ये आँखें
पलकों पर लिए हुए ताक़ रातें

जल रहा हूँ कई बरसो से यहाँ
पिघल रहा कई अरसो से यहाँ

मक़ाम ना कोई ना कोई घर
कहाँ गुम है तू ओ मेरे रहबर ।।

“सज़ाये मेरी कम कर दो मौला”

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बस इतना क़रम कर दो मौला
सज़ाये मेरी कम कर दो मौला

नासूर पल रहा है सीने में कहीं
कुछ तो ये रहम कर दो मौला

जलाता है दिल हर शब मुझको
यूँ दिल को भरम कर दो मौला

जिस दर्द ने बेदर्दी से दर्द दिए
उस दर्द को नम कर दो मौला

मर चुकी है रूह मेरी ‘इरफ़ान’
शिद्दत वोह नरम कर दो मौला ।।

“साबित करनी पड़ी सदा, हर कदम पे शनाख़्त अपनी”

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साबित करनी पड़ी सदा, हर कदम पे शनाख़्त अपनी
ज़ाहिर करनी पड़ी यहाँ, बनायी थी जो साख़्त अपनी ।।

साबित – सिद्ध
शनाख़्त – पहचान
ज़ाहिर – प्रत्यक्ष
साख़्त – निर्माण

“तसव्वुर पर बंदिशें ना लगाना कभी” (कुछ यादें सिर्फ याद नही रहती…)

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कहा था किसी रोज मैंने ही तुमसे कभी
कि तसव्वुर पर बंदिशें ना लगाना कभी

मगर हद तो इस क़दर गुज़री कि फिर
मैंने ही जलाये खुद वोह ख़याल सभी

जितना दर्द उठा वोह रह रह के सीने में
उतना दर्द बढ़ा वोह सह सह के जीने में

तुझसे जुङी हर याद को मिटाया है मैंने
फिर भी खुद में तुझको ही पाया है मैंने

दरमियान रहे हो फासले चाहे कितने भी
मुहब्बत मगर वोह कम ना हुई क्यूँ कभी

कहा था किसी रोज मैंने ही तुमसे कभी
कि तसव्वुर पर बंदिशें ना लगाना कभी

मगर हद तो इस क़दर गुज़री कि फिर
मैंने ही जलाये खुद वोह एहसास सभी ।।

‪#‎RockShayar‬

“किस तरह लिखू कि क्याँ है माँ”

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किस तरह लिखू कि क्याँ है माँ
मेरे लिए तो बस दो जहां है माँ

इंसान में इतनी कुव्वत ही कहाँ
फरिश्तों की कामिल दुआ है माँ

गुनाहों की बख़्शिश, माफ हर लग़्ज़िश
अल्लाह की मुझ पर अता है माँ

दिल की दीवारों पर लिखा है जो
ज़िन्दगी का मुकम्मल पता है माँ

ज़र्रा भी ना लिख पाऊ ‘इरफ़ान’
बुलन्द इस क़दर मर्तबा है माँ ।।

© राॅकशायर इरफ़ान अली खान