“आज मैं, क़ब्रिस्तान गया”

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हाथों में, सरसब्ज़ फूल लिए
दिल में, ज़िक्र-ओ-फ़िक्र लिए
आज मैं, क़ब्रिस्तान गया
कायम है जो, तालाब के किनारे पर
बुजुर्गों की क़ब्र है, वहाँ पर ।

पहले, आहिस्ता सलाम करके
दामन में, पाकीज़ा गुलाब भरके
चढाये वो सब, इक इक करके
दुरूद-ओ-फातिहा पढते हुए
ज़िंदगी की वो हक़ीक़त
महसूस की, आज मैंने
कि, मिट्टी से बना ये ज़िस्म
मिट्टी में मिल जायेगा
इक दिन आख़िर ।

दुआ में उठे, जब दोनों हाथ
क़ल्ब में थी, मग़फिरत रवां
ज़हन्नुम से पनाह, ज़न्नत की निदा
गुनाहों से बख्श़िश, ईमान की सदा
सीने में दर्द, अक़ीदत की ग़ुज़ारिश
आँखों में अश्क़, रहमत की ख़ाहिश ।

अब्बाजी की क़ब्र पर
यूँ घुटने टेककर
काफ़ी देर तक मैं, रोता रहा
गुफ्त़गू करनी थी, कुछ उनसे ।

जब मैं पैदा हुआ
उससे दो साल पहले ही
उनका इंतेकाल हो गया
शिकवा रहा, ये सदा ही दादाजी
ना मैं, आपकी उंगली पकङ सका
ना मैं, आपके साथ खेल सका
ना मैं, आपसे कहानियाँ सुन सका
मलाल है जिसका, आज तक मुझे
बहुत याद आती है, आपकी मुझे
मैं बिल्कुल, आपकी तरह दिखता हूँ
अम्मी ये अक्सर, कहती रहती है
अल्लाह आपकी रूह को, सुकूं अता करे
आपकी क़ब्र में, ज़न्नत की हवाए चलाए ।

ज़ुबां पर, कलमा-ए-तौहीद सजाकर
दिल में, यूँ तौबा अस्तग़फार बसाकर
आज मैं, क़ब्रिस्तान गया ।।

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