“सर्दियाँ दा लेज़ीपन” (Laziness of Winters)

This is my first Poetic effort in in Punjabi language. I don’t know Punjabi, but i like it so much. That’s why I’m trying mixed poetry flavor of Hindi-Urdu-Punjabi. Sorry, If there are any error in this poem. I just write my imagination in form of poetry.
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किन्ना सोणा लगदा, सर्दियाँ दा लेज़ीपन
गुलाबी मौसम होर, नाल क्रेज़ी मेरा मन
स्वेरे स्वेरे उठना ऐंवे, एवेरेस्ट दी चढ़ाई
नहान दी जब सोच्या, अक्खां भर आई
छात ते बरसदी है, गुनगुनी सुहानी धूप
जाड़ों विच्च अक्सर, छाँह लगदी है रूड
अदरक वाली चाय, विद कुरकुरे समोसे
प्लेट हो चाहे फुल, लगदे फिर भी थोड़े से
दिन लगदे छोटे ते, रातां वे लम्बी लम्बी
रज़ाई विच्च होवें ते, बातां वे लम्बी लम्बी
जैकेट, मफ़लर, जर्सी, कोट, होर दस्ताने
इक इक करके, लगदे सबा नु याद आने
सहर दे रूख़ पे छाया, धुंध दा पहरा घना   
बर्फ़ नु सांसें जमे, हर तरफ कोहरा घना
किन्ना सोणा लगदा, ऍ सर्दियों दा लेज़ीपन
ठण्ड दा मौसम होर, नाल स्नोवी मेरा मन

     © RockShayar Irfan Ali Khan   
       (ਰੋਕ੍ਕ੍ਸ਼ਾਯਰ ਇਰਫਾਨ ਅਲੀ ਖਾਨ)

ऍ सर्दियाँ दा लेज़ीपन – ये सर्दियों का आलस्य
किन्ना सोणा लगदा – कितना प्यारा लगता
होर – और
नाल – साथ में
स्वेरे स्वेरे – सुबह सुबह
ऐंवे  – यूँही
नहान दी जब सोच्या – नहाने की जब भी सोचू
अक्खां – आँखें
छात ते बरसदी – छत पर बरसती
जाड़ों विच्च – सर्दियों में
छाँह लगदी है रूड – छाँव लगती है रूखी  
दिन लगदे छोटे ते – दिन लगते छोटे से
रज़ाई विच्च होवें ते – रज़ाई में होवें फिर
सबा नु  – सब ही
सहर दे रूख़ पे- सुबह के चेहरें पे
स्नोवी – हिमाच्छादित

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