“जिद कर, तू खुद को पाने की”

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हो पथ चाहे काँटों भरा
रथ तू उस पर ही बढा
प्रतिरोध करे चाहे पवन
या पंख जला दे सूर्य अगन
स्वीकार ना कर बन्धन कोई
ना रहे दर्द का कम्पन कोई
सितारें सब तोङ लाने की
फ़लक पे ज़मीं बनाने की
अलहदा कुछ कर जाने की
जिद कर, तू खुद को पाने की

हो लक्ष्य चाहे दूर खङा
आँख तू उस पर ही गङा
विचलित करे चाहे ये मन
या धूल उङा दे रौद्र गगन
आरम्भ ना कर रूदन कोई
ना हो चोट का क्रन्दन कोई
हार को फिर जीत लाने की
मन के अंधियारे मिटाने की
निराशा में आशा जगाने की
जिद कर, तू खुद को पाने की

हो सागर चाहे खूब बङा
नाव तू उस पर ही बढा
प्रतिरोध करे चाहे लहर
या दिशा भुला दे तीव्र भँवर
स्वीकार ना कर पतन कोई
ना हो वुज़ूद का दमन कोई
तूफ़ान से खुद टकराने की
अश्क़ों से आग जलाने की
बंजर में गुल खिलाने की
जिद कर, तू खुद को पाने की

हो समय चाहे क्रूर बङा
धैर्य तू हर पल ही बढा
उपहास करे चाहे ये जग
या हस्ती मिटा दे काल खग
स्वीकार ना कर बन्धन कोई
ना रहे दर्द का कम्पन कोई
तकदीर को आज़माने की
सपने सच कर दिखाने की
रूह पे अल्फ़ाज़ सज़ाने की
जिद कर, तू खुद को पाने की

© RockShayar
Irfan Ali Khan

पथ – रास्ता
जिद – हठ
प्रतिरोध – विरोध
सूर्य अगन- सूरज की आग
कम्पन – सिरहन
फ़लक – आसमान
अलहदा – अलग
विचलित – ध्यान भटकाना
रौद्र गगन – भयंकर आकाश
रूदन – रोना धोना
क्रन्दन – विलाप
भँवर – चक्कर
पतन – बरबादी
वुज़ूद – अस्तित्व
दमन – शोषण
अश्क़ – आंसू
बंजर – बाँझ
गुल – फूल
क्रूर – निर्दयी
उपहास – मजाक
जग – दुनिया
काल खग – मृत्यु पक्षी
रूह – आत्मा
अल्फ़ाज़ – शब्द

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