“हरी भरी सी ये घास”

हरी भरी सी ये घास
मन को बहुत भाती है
सुबह सुबह, जब इस पर
नंगे पाँव चलता हूँ
आँखें चमक उठती है
साँसें महकने लगती है
ओंस में भीगी हुई, ये घास
रूह को बेहद सुकूं देती है
देखकर जिसे
यूँ लगता है मानो
मिट्टी के सिर पर
गुँथे हो, हरे रंग के कई बाल
अलग अलग, अंदाज में

मैं अक्सर, जब भी
इस पर लेटे लेटे
यूँ, आसमां को देखता हूँ
वो, बातें करता है मुझसे
बहुत मन करता है उसका
हरी भरी घास पर लेटने का
मगर, वो आसमां जो ठहरा
ज़मीं का सौंधा एहसास
उसके नसीब में कहाँ
उदास हो जाता है, ये सोचकर

घास के बदन पर
दौङती रहती है, चीटियां
दिनभर, यहाँ से वहाँ
जैसे, कोई रेस लगी हो मैराथन
घास की जङो में है, इनके मकां
शायद, वही से कुव्वत मिलती है इतनी

कहीं कहीं पर
सूखे हुए कुछ तिनके, बिखरे पङे है
और, उनके साथ
कुछ ज़र्द पत्ते भी
गिरे थे जो कभी
शाखों से टूटकर यहाँ
इस मंज़र को देखकर
सब्ज़ घास, मायूस हो जाती है
अक्सर, कुछ इस तरह
जैसे कोई ख़्वाब टूटा हो
सवेरे का
और, मन रूख़ा रूख़ा सा रहे

लेकिन, फिर भी
कभी यूँ, ज़ाहिर नही होने देती
अपने बहार से सीने में
दबे हुए, ख़ुश्क़ दर्द को
जीवन में, हर दिन, हर घङी
बस खुशहाली ही फैलाती है
हरी भरी सी ये घास
ज़िन्दगी को, हर पल, हर लम्हा
यूँही ज़िन्दा रखना सिखलाती है ॥

© RockShayar

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