“तराना-ए-कौमीयत” (राष्ट्रीय एकता दिवस पर)

6045751871_7802fb8d55_b

मुख़्तलिफ है, सब अंदाज़ यहाँ
तहज़ीब पर हमको, नाज़ यहाँ
मिल जुलकर, रहते सब लोग
द्धेष ना कोई, ना कोई रोग
क्षेत्र, भाषा, और धर्म अनेक
फिर भी खुद को, कहते एक
विविधता में है, शक्ति हमारी
हैरान जिससे, ये दुनिया सारी
सिलसिला ये, क़ायम रहे सदा
फिर भाई ना रहे, भाई से ज़ुदा
पुरखों ने सींचा इसे, लहू से अपने
देखे थे जिन्होंने, सुनहरे वो सपने
याद करे, लौहपुरुष को आज हम भी
ले शपथ, सद्भावना कि आज हम भी
हो परिस्थिति चाहे, कहीं भी, कैसी भी
बिखरने ना देंगे, हिंद कि शान कभी

विविधता में एकता कि, पहचान कभी

© रॉकशायर
(इरफ़ान अली खान)

तराना – गीत
कौमीयत – राष्ट्रीयता
मुख़्तलिफ – विभिन्न
तहज़ीब – सभ्यता
नाज़ – गर्व

“वो शुरूआती दौर”

tumblr_static_writing
कल रात यूँही
देर तक जागते हुए
अपनी कुछ, पुरानी नज़्में पढ़ी मैंने
लिखी थी, जो उस दौर में
जब अल्फ़ाज़ थे कम
और, जज़्बात ज्यादा

कहीं कहीं पर
ख़ामियाँ है बहुत
जो मालूम हुई है अब
यूँ आहिस्ता आहिस्ता
उस दौर में भी थी, ये शायद
मगर छुपी थी, गर्दिशों में कहीं

ज्यादातर लफ्ज़, दर्द में सने हुए है
तब मुझे, वक़्त के दरिया में
यूँ, तैरना भी तो नहीं आता था
एहसास के सागर में, घण्टो तक
बस यूँही, पाँव डुबोये रखता था
डर था, कहीं कोई जूनूनी लहर
खींच कर, ना ले जाये कभी अपनी ओर

नज़्म, ग़ज़ल, रुबाई, अशआर
क़ाफ़िया, मतला, नुक़्ता, शेर
किरदार सब, अजनबी थे मेरे लिए
ना कोई उसूल था, ना कोई आदाब
ना कोई वुज़ूद था, ना कोई अंदाज़
कुछ भी नहीं था, मेरे पास
हाँ, इक दर्द रहता था बस
सीने में कहीं, गहरा सा
जो, दिखता नहीं था
बस, रात में अक्सर
यूँ निकल आया करता था बाहर
दबे पाँव, किसी चोर कि तरह
अश्क़ों की सियाह चादर से
अपना नम चेहरा ढके हुए

रिश्तों के लहू में
डूबा हुआ इक खंज़र
जो अटका रह गया था
भीतर कहीं
नोक से उसकी
टपकते हुए, कतरो को
एक जगह, जमा कर के
फिर जो, लिखना शुरू किया मैंने
तो बस, लिखता ही चला गया
फिर रुका नहीं कभी, किसी मोड़ पे

वो शुरूआती दौर, अब गुज़र चुका है
मगर, कुछ खुरदुरे से निशां
अब भी बाकी है, रूह की पेशानी पर
कहीं कहीं, लाल लाल से चकते बन गए है
जिनका सुर्ख़ रंग, कभी कभी
यूँ उतर आता है, आँखों में
जैसे पलकों की, कट गई हो रग कोई
और हौले हौले, वहाँ से रिस रहा हो खूं

कल रात यूँही
देर तक जागते हुए
अपनी कुछ, पुरानी यादें टटोली मैंने
सहेजी थी, जो उस दौर में
जब अल्फ़ाज़ थे कम
और, जज़्बात ज्यादा

© RockShayar
(Irfan Ali Khan)

“तुम्हारी तस्वीर”

1381948_720404371341489_1133809044580465715_n

तन्हाई में अक्सर यूँही
देर तक बैठे हुए
मैं आजकल
देखता रहता हूँ
तुम्हारी तस्वीर को
हर बार, पहले से ज्यादा अच्छी लगती है
अलग अलग रंगों में लिपटी हुई
अनगिनत ख़्यालों में सिमटी हुई
सावन की तरह बरसती हुई
सांसों की तरह लरजती हुई
हर घङी, हर लम्हा
टकटकी बान्धे
बस यूँ, तकता रहता हूँ
पलक झपकने को
राज़ी ही नही होती
जाने कौनसा जादू है
इन सुरमई निगाहों में
जब भी झांकता हूँ
क़ैदी बना लेती है ये
शायद तुम्हारी तस्वीर
नज़्म का ही अक्स है कोई

© RockShayar

“इश्क़-ख़ुमारी”

vlcsnap-2013-07-08-23h42m37s224

कुछ इस कदर है छाई, इश्क़-ख़ुमारी
सांसों से आये बस, खुशबू तुम्हारी

अल्फ़ाज़, खुद-ब-खुद महकने लगे
दिल में उतर गई, वो शायरी तुम्हारी

हैरां है आज, खुद लफ़्ज़ तराश भी
देखकर मयकदा सी, आँखें तुम्हारी

चाँद तारें सब, करते रश्क तुमसे
गिरती है रूख़ पे, जब ये ज़ुल्फ़ें तुम्हारी

पल भर में गायब, हो जाती उदासी
याद आती है जब, वो बातें तुम्हारी

हो जाये बंजर, फिर से सब्ज़ाज़ार
उठती है जहाँ आहिस्ता, पलकें तुम्हारी

छुपा लो खुद को, कहीं भी ऐ नाज़नीन
महफूज़ है ग़ज़ल में, अब तस्वीर तुम्हारी

© RockShayar

“कुछ कहना है मुझे, पापा आपसे”

This is for you PAPA…you are my real hero…you are my existence. ..you are my inspiration. ..you are my strength. .This poem consists my unexpressed emotions…
I want to say something to you…
I love you PAPA…

20140612_013209


कुछ कहना है मुझे, पापा आपसे
ना कोई जिद है
ना कोई शिकायत
ना कोई हठ है
ना कोई फ़रमाईश
बस, एक बात है
मेरे दिल की बात
दबी है जो, कई सालों से
सीने में कहीं
कहना तो चाहा, मैंने कई बार
लबों पे आके ठहरी मगर, ये हर बार
हिम्मत ही नही हो पाई कभी
लेकिन, अब मैं बिन कहे नही रह सकता
सो आज कह देता हूँ, पापा आपसे
माना, मैं सबसे छोटा हूँ
माना, सिक्का खोटा हूँ
माना, थोङा नादान हूँ
माना, खुद से अनजान हूँ
माना, अन्धेरें से डरता हूँ
माना, तन्हाई से लङता हूँ
माना, भीङ से कतराता हूँ
माना, मोङ पे घबराता हूँ
माना, ज़ख्मों से परेशां हूँ
माना, ज़िन्दगी से हैरां हूँ
तमाम कमियों के बावजूद
कुछ खूबियां भी है मुझमें
जो सिर्फ, मुझमें ही है
और किसी, दूसरे में नही
वो सब क्यूँ, नज़र अन्दाज़ कर गए आप
मुझ पर कभी, भरोसा तो करके देखिये
एक दिन, मैं भी ख्वाबों की उङान भरूंगा
मुझ पर कभी, यक़ीन तो करके देखिये
एक दिन, मैं भी आपका नाम रोशन करूंगा
वादा है ये मेरा
फ़ख्र होगा आपको
एक दिन, मुझ पर भी कभी
ना कोई शिकवा है
ना कोई शिकायत
ना कोई आरोप है
ना कोई आज़माईश
बस, एक बात है
मेरे दिल की बात
वो जो कहनी है मुझे, पापा आपसे
मैं आपसे बेपनाह मुहब्बत करता हूँ…

© RockShayar

“एक ज़िन्दा नज़्म है वो”

10423965_718923214822938_1373407691201646779_n

सांसों से लिपटी हुई
लफ़्ज़ों में सिमटी हुई
आसमां से आई हुई
रोशनी में नहाई हुई
चाँद से निथरी हुई
रूह में उतरी हुई
एक ज़िन्दा नज़्म है वो

वो इठलाती भी है
वो बलखाती भी है
वो लहराती भी है
वो घबराती भी है
तारीफ जब करू
वो शरमाती भी है
एहसास की स्याही से
दिल पर लिखी हुई
एक ज़िन्दा नज़्म है वो

© रॉकशायर

“ज़िन्दगी में हो बस, रोशनी नुमायां”

1911714_739626939451388_5822372096309730863_n

Happy Diwali to all of you….

रंज-ओ-ग़म का, ना कोई सरमाया
दिलों में रहे सदा, उम्मीद का साया
हर नज़र यहाँ, खुद-ब-खुद चमक उठे
खुशियों का जब, यूँ आंचल लहराया
मन के कोनों से, उतार फेंकों अन्धेरें
ज़िन्दगी में हो अब, रोशनी नुमायां…

भीतर छुपी बुराईयों से, तू युद्ध कर
मैली सी परछाईयों को, तू शुद्ध कर
आँखों में रहे सदा, चरागों सा साया
हर सहर यहाँ, खुद-ब-खुद महक उठे
खुशियों का जब, यूँ सावन घिर आया
रूह के चोगे से, उतार फेंकों अन्धेरें
ज़िन्दगी में हो बस, रोशनी नुमायां
ज़िन्दगी में हो बस, रोशनी नुमायां…

© रॉकशायर

“तारीफ”


10450222_718246628223930_2811744313753698321_o


रूख़ पे मासूमियत का पहरा
पलकों का रंग भी है सुनहरा
लबों पे ठहरी हुस्न की घटायें
आँखों से बयां होती है अदायें
तारीफ कहूँ इसे, या कुछ और
जो भी हो, ये बेहद खुशनुमा है
अन्दाज़ में कुछ अलग है बात
एहसास हो जैसे चाँदनी रात
सांसों में घुली रूह की वफ़ायें
निगाहों से पूरी होती है दुआयें
तारीफ कहूँ इसे, या कुछ और
जो भी हो, ये बेहद खुशनुमा है

© रॉकशायर

“किनारों तक मैं पहुँच गया”

10659067_739086096172139_7222691163407029370_o

चाँद को छूने की जिद में, सितारों तक मैं पहुँच गया
जख़्मी सब आहें भुलाकर, बहारों तक मैं पहुँच गया

लहरों को चीरता हुआ, सागर से उलझता हुआ
तूफां को क़श्ती बना, किनारों तक मैं पहुँच गया

छुपे थे जो मंज़र अब तक, दिल की वादी में कहीं
तसव्वुर की रौशनी तले, उन नज़ारों तक मैं पहुँच गया

यूँ तो जीता हूँ ज़िन्दगी, अपनी शर्तों पर यहाँ
गुनाह हुए जब भी ज्यादा, मज़ारों तक मैं पहुँच गया

© रॉकशायर

“आज फिर से सो पाया हूँ”

vlcsnap-2014-08-23-22h49m59s97

एक अरसे के बाद
आज, फिर से सो पाया हूँ
सुकूं भरी, वो गहरी नींद
वही, अपना घरोंदा
वही, पुराना बिस्तर
वही, बचपन का कमरा
थकन को, तकिया बनाकर
लेट गया यूँ, माँ की गोद में
वक़्त बदल चुका है
मगर, नही बदला वो एहसास
शहर की भाग दौड़ में कहीं
गुम हो गया था, जो सुकूं
बाद मुद्दत के, आज यूँ
मिल गया, अपने आँगन में

© RockShayar

“जाने वो कौनसी फिल्म है”

1911280_737723456308403_2553094575954524165_o

जाने वो कौनसी फिल्म है
ज़िन्दगी की
जो अब तक
धुल नही पाई है
बस, इक नेगेटिव
क़ैद है, कई बरसो से
ख़यालों के कैमरे में
धूल सी जम गई है, उस पर
कुछ तस्वीरों की शक्ल
बदल चुकी है, पूरी तरह
वक्त की धूप में रखने से
मगर, वो इक पिक्चर
आज भी, वैसी ही है
जैसी, उस दौर में थी
जब, मैं सीख रहा था
तसव्वुर के फ्रेम में यूँ
एहसास का शाॅट लेना
और, रील थी कागज़ की

© RockShayar

“इल्मे नुजूम”

Ilm

इल्मे नुजूम का यहाँ पर, है बस इतना फसाना
सय्यारों की हरकत से, आने वाला कल बताना

इल्मे नुजूम – ज्योतिष शास्त्र
सय्यारा – नक्षत्र, तारा

© RockShayar

“निशां”

1911226_737233633024052_8762873074267515926_o

कल की रात
ज़मीं पर कहीं
उतरा था चाँद
चुपके चुपके
दबे पाँव यूँ
ना कोई आहट हुई
ना कोई सरसराहट
बस, जाते जाते
चन्द गीले कदमों के निशां
बना गया
सहर के आंचल पर

© RockShayar

“खिल उठे बचपन फिर से: एक कोशिश”

10343496_716050581776868_8607927052999328100_n

My little poetic feel for the Team Pallavan: Blooming Lives

“A Small Donation For a Big Smile”.

गरीबी की मार ने, बस्ता छुड़ा दिया
पेट की आग ने, बचपन जला दिया
वक़्त की मार, खिलौनों पर ऐसी पड़ी
कि, हाथ में कारखानों का औज़ार थमा दिया

वैश्विक दौर में शिक्षा, बन गई बस व्यापार
अशिक्षा से ना रहा, समाज का कोई सरोकार
विलासिता की होड़ ने, अलगाव ही बढ़ाया
मनुष्य को सदैव यहाँ, मनुष्य से लड़वाया

इल्म ही से बनता है, मुकम्मल इंसान यहाँ
कर पाये जो खुद, सही गलत की पहचान यहाँ
तहज़ीब के दरख़्त का, है ये मीठा फल
तालीम ही है सदा, हर समस्या का हल

तो आओं करे, एक कोशिश दिल से
दे सके, कुछ योगदान जो ख़ुशी से
ताकि, ना रहे कोई महरूम शिक्षा से
और, खिल उठे बचपन फिर से

© RockShayar

सरोकार – वास्ता
इल्म – ज्ञान
मुकम्मल – सम्पूर्ण
तहज़ीब – सभ्यता
दरख़्त – पेड़
तालीम – शिक्षा
महरूम – वंचित

“जीत को तू अपना मुकद्दर बना ले”

secret-to-achieve-goalddd

सफ़र की मुश्किलों को हमसफ़र बना ले
मंजिल की ख़्वाहिशों को रहगुज़र बना ले
शिकस्त को मिले खुद शिकस्त तुझसे
कद को अपने तू इस कदर बढ़ा ले
इरादों से पूरा कर हर सपना यहाँ
जीत को तू अपना मुकद्दर बना ले…

गिरता हुआ, उठता हुआ, सम्भलता हुआ
ज़ख्मों की ना कोई परवाह करता हुआ
दिल की ज़मीं पे ख्वाबों का घर बना ले
हौसलो को मिले खुद हौसले तुझसे
वुज़ूद को अपने तू इस कदर बढ़ा ले
कोशिशों से सच कर हर सपना यहाँ
जीत को तू अपना मुकद्दर बना ले…

टूटता हुआ, बनता हुआ, बिगड़ता हुआ
नाकामियों से हर पल कुछ सीखता हुआ
मुठ्ठी में अपनी ये सारा जहान बसा ले
शिकस्त को मिले खुद शिकस्त तुझसे
हद को अपनी तू इस कदर बढ़ा ले
आशाओं से पूरा कर हर सपना यहाँ
जीत को तू अपना मुकद्दर बना ले…

© RockShayar

“अभी लिखना है सारा जहान”

vintage-paper-old-antique-backgrounds-wallpapers

अभी लिखना है सारा जहान, फ़लक पर तुझे
ज़िन्दगी की धूप में, मिली है दोपहर तुझे

दिल में उठते रहते है, अक्सर कई सवाल
जवाब तू खुद है, नही मगर ये खबर तुझे

हो काँटों भरा सफ़र, चाहे मंज़िल बहुत दूर
मायूस ना होना, आज़मा रहा मुकद्दर तुझे

सदियों से भटक रहा, तू जिसकी तलाश में
मन में झांक कभी, मिल जायेगा वो घर तुझे

जूनून की आग में, खुद को इस कदर तपा
की दर्द जब भी हो, ना हो कोई असर तुझे

रुहानियत का फ़लसफा, जान ले यूँ इरफ़ान
दीदार तेरा होगा फकत, मौला के दर पर तुझे

© RockShayar

“दिलों के ये आईने”

 Heart-On-Mirror-Hd-Wall

रिश्तों के सभी वो मायने बदल गये
जब से दिलों के ये आईने बदल गये

कर रहे थे हम जिन पर यक़ीन सदा
वक्त जब आया तो वायदे बदल गये

गिरफ़्त में गर आ भी जाये शाह कोई
रुतबा देखते ही सारे क़ायदे बदल गये

चोट खाकर भी जो ना सम्भले कोई तो
घाटे में ही फिर उसके फायदे बदल गये

एक नाम तक ना बदल सके वो अपना
और हम हैं की अपने ही मायने बदल गये

© RockShayar

“एक रूहानी ग़ज़ल था वो शख़्स”

A poetic tribute to ghazal maestro Jagjit Singh Ji…..

Jagjit-Singh_05 Jagjit-Singh_10ff

एक रूहानी ग़ज़ल था वो शख़्स
एहसास की मिट्टी से बना हुआ
सुरमई सी चादर में लिपटा हुआ
लरजती हुई, खनकती हुई
झूमती हुई आवाज़ का जादूगर
छेङता था जब तान कोई
यूँ लगता था मानो
हौले हौले आसमां से
रौशनी का इक दरिया
छलक रहा हो दूर कहीं
रात के सियाह आँचल पर
सुर में भरकर ठण्डी फुहारें
छिङका करता था अक्सर
महफ़िल में बैठे ख़ुश्क़ चेहरों पर
ग़ज़ल के हर इक अल्फ़ाज़ को
ज़िन्दा किया करता था
सांसों की थिरकती जुम्बिश से
मन के तार छूकर, जग जीतने वाला
संगीत की दुनिया का वो सितारा
एक रूहानी ग़ज़ल ही था वो शख़्स

© RockShayar

“वो पुराना कुआं और इक कमरा”

10256720_711398508908742_5496673118184892523_o

खेत के उस छोर पर
आज भी कायम है, वो पुराना कुआं
और उसी से सटा हुआ इक कमरा
बनाया था, जिसे खुद अब्बाजी ने
अब वो दोनो ही बूढे हो चले है
टूट चुकी है मुण्डेर पूरी तरह
पानी कब का सूख गया
लबालब रहता था जो कभी
यूँ आज, कबूतरों का घर बनकर रह गया
वो जो एक मोटर चलती थी
पानी खींचने के लिए दिनभर
शोर जिसका, लगता था सुरीला
अब तो सिर्फ, गुटरगूं सुनाई देती है वहाँ
टूटा फूटा सा वो इक कमरा
जगह जगह से जो ढह चुका है
चूने की दीवारों पर, कहीं कहीं
वक्त की धुन्धली तहरीर नज़र आ जाती है
बचपन के सब्ज़ जमाने से लेकर
अब तक के ख़ुश्क़ दौर का, बयां है उसमें
मैं जब भी शहर से, अपने गाँव जाता हूँ
साँझ ढले वहाँ, थोङी देर जरूर जाता हूँ
वो पुराना कुआं और इक कमरा
ज़िन्दा कर देते है, गुज़रे दौर की तस्वीरें
एक एक करके, यूँ ज़हन में मेरे
जैसे कोई ब्लेक एण्ड व्हाइट फिल्म चल रही हो

© RockShayar

“कुव्वत-ए-ईमान”

10658973_710278839020709_9020852805541226473_o

हो वो ईमान गर इब्राहीम सा आज भी
आग हो जाये फिर गुलिस्तां आज भी

राह-ए-हक़ में जो कुर्ब़ान कर दे ज़ान
इलाही हो जाये फिर मेहरबां आज भी

हो दिल में यक़ीं गर ख़ुदाई मदद का
तू बन सकता है शहंशाह आज भी

ज़िक्र-ओ-दुआ के जरिये मांग कभी
रब अता करता है बेइंतहा आज भी

आमाल हो जब नेकीयों का आईना
फरिश़्ते कहते है मरहबा आज भी

हो ज़िन्दगी सरकार-ए-मदीना जैसी
कायम जिनके लिए दो जहां आज भी

© RockShayar

“अन्दाज़-ए-हयात”

1966716_728453387235410_9061952153372846066_n

ज़िन्दा हो अगर तो जीने का अन्दाज़ हो
ख्वाबों के आसमां में उम्मीदें परवाज़ हो

दिल के सब राज़ निगाहों से जो पढ ले
जहां में ऐसा कोई अपना भी हमराज़ हो

ईमां का अक़ीदा रूह में इस कदर बसा
ज़िन्दगी पर तेरी फिर मौत को भी नाज़ हो

कारवाँ-ए-ग़ज़ल को वहाँ तक पहुँचा दे
महफ़िल-ए-अदब वो जहाँ सरफराज़ हो

ज़िक्र-ओ-इबादत में हो क़ैफ़ियत इतनी
की हर शब यहाँ फिर शब-ए-मेराज हो

खुदाया कोई ग़ज़ल ऐसी भी अता कर
इश्क़ में तेरे ही बस, डूबे जिसके अल्फ़ाज़ हो

“स्वच्छता : एक प्रयास”

1969111_708351069213486_1265226083804589681_n

ज़र्रे ज़र्रे में वो बसा है
कायनात को खुद जिसने रचा है
हर ऋतु यहाँ उसका इक रूप है
छाँव लगे कभी, कभी जो धूप है
स्वच्छता में है सदा ईश्वर का वास
आओं करे इसके लिए मिलकर एक प्रयास

ना हो मैला और धरती का ये तन
निर्मल ये गीत गुनगुनाये सब जन
हर कृति यहाँ प्रकृति का स्वरूप है
श्वेत लगे कभी, कभी श्याम रूप है
स्वच्छता में है सदा हरि का वास
आओं करे इसके लिए मिलकर एक प्रयास

ना हो चारो ओर गन्दगी का डेरा
साफ सुथरा हो हर शाम सवेरा
हर जगह यहाँ पवित्रता का कूप है
पृथक लगे कभी, कभी समरूप है
स्वच्छता में है सदा ज्ञान का वास
आओं करे इसके लिए मिलकर एक प्रयास

ना हो अब और कुदरत का शोषण
पाला है जिसने करे उसका पोषण
हर रचना यहाँ प्रभु का इक रूप है
विराट लगे कभी, कभी सूक्ष्मरूप है
स्वच्छता में है सदा ऊर्जा का वास
आओं करे इसके लिए मिलकर एक प्रयास

कण कण में वो समाया है
सृष्टि को खुद जिसने रचाया है
हर रंग यहाँ उसका दिव्य रूप है
निर्गुण लगे कभी, कभी बहुरूप है
स्वच्छता में है सदा ईश्वर का वास
आओं करे इसके लिए मिलकर एक प्रयास

“इरादों में खनक”

10603910_708127095902550_50445671414976725_o

इरादों में खनक कुछ ऐसी हो तेरी,
ज़र्रा कहे और सारा आसमां सुने
किरदार तेरा इस कदर हो मुकम्मल,
फिर अंदाज़ वो सारा ज़माना चुने

नाकामियों का डर तुझमें छुपा बैठा है,
जुनूं के वार से इसे तू फ़ना कर दे
मायूसी के साये जो फैले है तुझमें,
कोशिशों की लौ से इन्हे तू धुँआ कर दे

तेरे हौसलो की दमक जो हिला दे जग को,
फ़रिश्ते भी खुद तेरा कारवां देखे
बेख़ौफ़ निकल चल तू उन कटीली राहों पर,
मंजिलें भी फिर तेरा रास्ता देखें

गुलिस्तां में महक कुछ ऐसी हो तेरी,
रूह भी अपना नया ताना बुने
इरादों में खनक कुछ ऐसी हो तेरी,
ज़र्रा कहे और सारा आसमां सुने

© RockShayar