“साहिर-ए-हर्फ़” (My little poetic feel for The Legendary Gulzar Sahab)

My little poetic feel for The Legendary Gulzar Sahab……Wish you a very happy birthday sir….
 
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अर्श से पिघलकर
नूर का इक कतरा
छलका था ज़मीं पर कहीं
उसी मिट्टी से बना हैं ये शख़्स
अल्फ़ाज़ यूँ सब महकते इसके
जैसे साँसों में बह रहा हो ख़ुमार
कलम को जब वो छुए
बेज़ान पुर्ज़े ज़िन्दा होने लगे
एहसास को पीकर
शबनम का इक बादल
बरसा था कायनात में कहीं
उसी बारिश में उगा हैं ये शख़्स
लफ़्ज़ यूँ संग थिरकते इसके
जैसे साहिर बदल रहा हो ख़्याल
कागज़ पर जब हर्फ़ रखे
ख़ामोश लम्हें बात करने लगे
रूहानियत का वो रहबर
खुशबू जिसकी “गुलज़ार”

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