“ख़ानाबदोश फ़ितरत”


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बहती हवा के संग संग
चल पड़ा हूँ
अनजानी राहों पर
ना कोई हमसफ़र हैं
ना कोई ठिकाना
साथ हैं बस
मेरी ख़ानाबदोश फ़ितरत
कभी यहाँ कभी वहाँ
हर पल यूँही चलते जाना
रूकना इसकी आदत नहीं
जैसे दिल में ख़्वाहिश
आसमां में सूरज
ज़मीं पर ज़िन्दगी
कभी थमती नहीं
चलती रहती हैं सदा
वैसे ही इक आग हैं, मुझमें कहीं
जो बस जलती रहती हैं
आहिस्ता आहिस्ता, भीतर भीतर
मुख़्तलिफ़ रंगो में डूबे नज़ारे
कदम कदम पर
बाहें खोलें हुए यूँ मिलते हैं
बैचैन रूह को गले लगाकर
साँसों की जुम्बिश पर
थिरकते रहते हैं, हसीं लम्हें
उड़ते हुए, मचलते हुए
लहराती फ़िज़ा के साथ साथ
निकल पड़ा हूँ
अजनबी रास्तों पर
ना कोई रहबर हैं
ना कोई फ़साना
साथ हैं बस
मेरी ख़ानाबदोश फ़ितरत
कभी यहाँ कभी वहाँ
हर घडी यूँही चलते जाना
रुकना इसकी आदत नहीं

— (c) RockShayar —

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