“दरख्त़”

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कुछ सूखे से, कुछ घने दरख्त़
बात करते हैं, हँसते हैं, रोते हैं
साये में इनके, जब भी बैंठता हूँ
अनछुवा, एक दर्द महसूस होता हैं
छुपाये रखते हैं, जिसे ये अक्सर
अपनी ठ्ण्डी छाँव के, आगोश में
शाखे झुकी हुई, अनगिनत पत्तो से
फिर भी, सदा तनकर सीधे खङे रहते 
जेसे पिता रहता हैं, हरपल बच्चों के लिए
जाने कितने पंछीयों का घर हैं, ये दरख्त़
ढेरों सब्ज़ पत्तो में, कुछ मुरझाये हुए
असर हैं यह, उस जहरीले धुंए का
उगल रही जिसे, इन्सां कि बढती ख्वाहिशें
दम घुट रहा हैं इनका, आहिस्ता आहिस्ता
चारो तरफ बस, कंक्रीट का जाल नजर आता हैं
बेज़ुबां हैं मगर बेज़ान नही हैं, ये दरख्त़
कोई भी नही सुनता हैं यहाँ, इनकी पुकार
शायद इसीलिए, कायनात रूठी हैं हमसे
बारिश कि जगह, अब लावा बरसता हैं
मौसम का मिजाज़, पहले सा नही हैं
आओ कुछ देर यूँ बैंठे, बगीचे में
इन तन्हा दरख्त़ो के नीचे, थोङा वक्त निकालकर
और पूँछे मुस्कुराकर, इनकी खैरियत
तब शायद, फिर से खिल उठे वो जज्बात
जो दफ्न हैं, इन दरख्त़ो की जङो में कही

दरख्त़ = Tree

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