“कागज़ पर जब भी कलम रखता हूँ”

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कागज़ पर जब भी कलम रखता हूँ
अल्फाज़ खुद बखुद उतरने लगते हैं

ख्यालों के परिन्दें ज़हन में उङते हुए
लफ्ज़ो को पहनकर चहकने लगते हैं

ढेरों जज़्बात यहाँ दिल में छुपे रहते 
तन्हाई में जो रूख से बहने लगते हैं

आज फिर जलना होगा रातभर तुझे
शाम ढलते ही मुझसे कहने लगते हैं 

जागते हुए जब भी ख्वाब देखता हूँ
गज़ल के अक्स में वो सजने लगते हैं

ख्वाहिशों के पुलिन्दे रूह में तैरते हुए
सरगोशी को छूकर महकने लगते हैं

खामोशी को जब भी महसूस करता हूँ
एहसास खुद बखुद धङकने लगते हैं

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