“पिता”

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जिन्दगी की धूप में तन जलाकर
बच्चों पर खुशी के बादल फैलाकर
पूरी करता हैं जो उनकी हर हसरत
ऐसी अज़ीम शख्स़ियत पिता हैं
अपनी ख्वाहिशें सदा भुलाता रहा
परिवार की जरूरतो के लिये वोह
ग़म को चेहरे पर ना आने देता कभी
सीने में एहसास छुपाये रखता हैं वोह
पिता पुत्र का रिश्ता भी कितना अजीब हैं
ताउम्र इक दूजे को चाहते हैं बहुत
मगर दोनो कभी कह नही पाते हैं
वक्त के तपते अलाव में खुद को झोंककर
औलाद को हरदम पलकों पर बैंठाकर
सच करता हैं जो उनका हर सपना
ऐसी बेहतरीन सूरत पिता हैं
माँ की तारीफ में मेने कई नज़्मे लिखी
पिता को मगर दो लफ्ज़ भी ना कह पाया
जमाने ने हर तरफ अफवाह फैला रखी हैं
सख़्त मिजाज़ होते हैं अक्सर पिता यहाँ
जज्बातों से उनका रिश्ता नही हैं गहरा
मगर जब मैं कुछ दिन उनके पास रहा 
तब जाकर यह बात समझ में आई हैं
गर माँ के कदमो तले ज़न्नत हैं तो
पिता ज़न्नत का दरवाजा हैं
गर माँ की दुआ में रहमत हैं तो
पिता रहमत का ज़रिया हैं
गर माँ की गोद में सूकून हैं तो
पिता सूकून का दरिया हैं
गर माँ ने मुझे जन्म दिया हैं तो
पिता मेरे होने का एहसास हैं
जिन्दगी के सफ़र में दर्द को भुलाकर
परिवार के लिए उम्मीदें सजाकर
महफूज़ रखे जो हर दिन उन्हे
ऐसी बुलन्द इमारत पिता हैं

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