“मैं परिन्दों कि तरह, आसमां में उङता रहूँ”

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मैं परिन्दों कि तरह, आसमां में उङता रहूँ
जिन्दगी के सफर में, गिरता सम्भलता रहूँ

हर मोङ पर यहाँ, हैरानीयाँ मिलती रहे
अजनबी राहों पर, बँजारे सा चलता रहूँ

वादियों कि तरह, खुशबूए महकती रहे
बर्फिले पहाङो पर, झरने सा बहता रहूँ

खुशीयों को पीकर, आरजूए चमकती रहे
सब्ज़ बहारो पर, कलियों सा खिलता रहूँ

हर लम्हा हर पल, ख्वाहिशें मचलती रहे
इश्क़ में तेरे डूबकर, पतंगे सा जलता रहूँ

दर्द सभी भुलाकर, खामोशी चहकती रहे
ज़िन्दा रहना हैं तुझे, खुद से ये कहता रहूँ

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