“माँ”

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घने अंधेरो से, अब मैं डरता नही 
माँ की दुआए, मेरे साथ चलती है 
दुनिया के किसी कोने में, चाहे रहूँ 
बुरी नज़र से मुझे, महफूज़ रखती है 
तकलीफे मेरी, बिन कहे समझ लेती
इक माँ ही है, जो मुझे हौंसला देती है
इक माँ…….जो मुझे टूटने ना देती है
जब भी चूमता हूँ, माँ के कदमो को
जन्नत की घटाए, बरसने लगती है
अपने बच्चो को, बेपनाह चाहती है माँ
खुद भूखी रहकर, पहले उन्हें खिलाती है माँ
जब भी परेशान होता हूँ, बहुत याद आती है
दूर होकर भी सदा, वो मेरे पास रहती है
सिर पर हाथ फेरकर, यूँ माथे को चूमती है
जीता रहे तू, माँ मुझसे ये अक्सर कहती है
काले सायो से, अब मैं घबराता नहीं
माँ की दुआए, मेरे साथ चलती है ……
 

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