“पलकों की ज़ुबां”

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पलको के पर्दो से
झाँक रही दो आँखें
कुछ कहना चाहती
यूँ चुपके चुपके 
नैनो की ज़ुबां
अक्सर दिल ही समझता है
इशारो में अब जिनसे
गुफ्तगू करता रहता हूँ
मिली हो जब से तुम
लफ्ज़ो में ताजगी आ गई
तेरे होने का एहसास
इनको भी हो रहा शायद
मासूम अदाओ में
लिपटा हुआ सादापन
दीवाना करता है मुझे
लबो से झरते है मोती
जब पुकारती हो तुम
तलाश रहा हूँ तुम्हे
कहीं भी मिलती नही क्यूँ
और दिल कहता रहता है
तुम अब मुझमें कहीं हो……

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