“वो कहलाती औरत”

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ख़ुदा ने बनाया है उसे, मुजस्समा मुहब्बत का
मर्द को जो मुकम्मल बनाती, वो कहलाती औरत

सबसे अफ़जल दर्ज़ा है, माँ के किरदार का
कदमो में जिसके जन्नत रहती, वो कहलाती औरत

पाकीज़ा इक मिठास रहती, बहन के स्नेह में
बचपन से जो ख्याल रखती, वो कहलाती औरत

अधूरा लगता है उसके बिना, हयात का सफर
हर मुश्किल में साथ निभाती, वो कहलाती औरत

मौला की रहमत जहाँ, बेटी बनकर घर आये
हमेशा सबको जो खुश रखती, वो कहलाती औरत

अलग-अलग सब रूप, फिर भी एक समानता
कदम कदम जो त्याग करती, वो कहलाती औरत

भौतिकवादी इस दौर में, अस्मत अपनी बचाती
हक़ के लिये जो संघर्ष करती, वो कहलाती औरत

अपनी ज़िन्दगी सदा यहाँ, दूसरो पर कुर्बान करती
इन्सान को जो इन्सान बनाती, वो कहलाती औरत

** इरफ़ान “मिर्ज़ा” **

मुजस्समा = Statue
मुकम्मल = Complete
अफ़जल = Highest
पाकीज़ा = Holy
हयात = Zindagi

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