“निगाहों के हसीं कारवां”

Image

निगाहों के हसीं कारवां, हर तरफ बिखरे हुए
मुहब्बत कि तहरीर में, ख्वाब बस ठहरे हुए 

ज़रा आहिस्ता से उठाना, सुरमई आँखे तुम 
मख़मली ख्य़ाल कुछ, पलकों पर सहमे हुए

राहत मुझे मिलती, गहरी नीली ख़ामोशी में
मन कि बंद गिरहों में, शब्द सब लिपटे हुए 

दीदार कि तलब में, मन सदा तड़पता रहा 
एहसास के चंद पन्ने, नज़्म में सिमटे हुए

ग़ज़ल कि इनायत, मुझ पर इस तरह हुई 
लफ्ज़ो के समंदर में, कश्ती बन तैरते गए 

निगाहों के हसीं कारवां, हर तरफ बिखरे हुए
मुहब्बत कि तहरीर में, ख्वाब बस ठहरे हुए 

 

“तलाश”

nature-6-wwwultrahdwallpapersnet

तलाश में किसकी यहाँ, दर बदर भटकता रहा
सहरा में आवारा बादल सा, यूँही घुमड़ता रहा 

ठोकरे मिली जो राह में, मंज़िल दूर होती गई 
ग़ज़ल कि सोहबत में, दर्द अपने भुलाता रहा 

ख्वाहिशें सब सहमी हुई, हसरतें भी है अधूरी 
ज़िन्दगी कि धूप में, नम एहसास सुखाता रहा

रहबर नहीं कोई यहाँ, ना मिला कोई हमसफ़र
वक़्त के सफ़र में, मुसाफिर सा मैं चलता रहा

राहें है अजनबी सी, नहीं मालूम पहचान मुझे 
इक अकस कि तलाश में, खुदसे दूर होता रहा 

तहरीर ‘मिर्ज़ा’ लिख रहा, अनछुवे किरदार कि 
अल्फाज़ो में फिर नुमायाँ, वुज़ूद मेरा होता रहा 

तलाश में किसकी यहाँ, दर बदर भटकता रहा
सहरा में आवारा बादल सा, यूँही घुमड़ता रहा 

 

“अनसुनी सदाये”

Image

गूंजती है ज़ेहन में, अनसुनी सी कई सदाये 
ख़ामोशी में जिन्हे, अक्सर महसूस करता हूँ

पलकों पर ठहरी है, अधूरी वो मेरी गुज़ारिश 
अल्फाज़ो में जिसे, अक्सर तलाश करता हूँ 

एक धुंधला साया, यूँ अपने पास बुलाता है 
हक़ीक़त में जिसे, अक्सर परछाई कहता हूँ

नये नये कई रंग, अलग अलग से सब ढंग
क़ैफ़ियत में जिसे, अक्सर हैरानी कहता हूँ 

लफ्फाज़ी धागो से, शामियाना बुना रूह का 
लिखावट में जिसे, अक्सर बयान करता हूँ 

फितरत ऐसी है, सुकून कभी मिलता नही 
इबादत में जिसे, अक्सर माँगा करता हूँ 

ख़ुशी कि तलब में, बेवजह यूँ तड़पता रहा 
अब जाकर जिसे, खुद में पाया करता हूँ 

गुजरे लम्हो ने, सताया है इक शख्स को 
आज जाना जिसे, अक्सर ‘मिर्ज़ा’ कहता हूँ 

गूंजती है ज़ेहन में, अनसुनी सी कई सदाये 
ख़ामोशी में जिन्हे, अक्सर महसूस करता हूँ

“या अली मौला”

Image

हर तरफ यहाँ पर, बिखरी हुई है साज़िशे 
मुझको अली मौला, बस तेरा ही सहारा है

बहुत भटका हूँ, पर ना मिला पाया सुकून
रहम कर खुदाया, इक तेरा ही किनारा है

गुनाहो कि कालिख, दिल पर यूँ जम गई 
तौबा क़ुबूल कर ले, रहीम तू सबसे बड़ा है

बुरा मैं बनता रहा, इबादत से हो गया दूर 
तौफ़ीक़ दे मुझे, अल्लाह तेरा ही सहारा है

बंदिशों में कैद रहा हूँ, ज़ंजीरे खुलती नहीं
मौला रिहा कर दे, करीम तू दो जहाँ का है

दर पर तेरे यूँ खड़ा हूँ, बख्श दे गुनाह मेरे 
या अली मौला, मुश्किल कुशा, शेरे ख़ुदा है

रूह मेरी तड़प रही है, अर्श-ए-नूर के लिए
नवाज़ दे खुदाया, दर्दमंदो का तू सहारा है

तक़दीर के बेदर्द सितम, सहे है मेने बहुत 
इनायत अब कर दो, टूटा मेरा किनारा है

हर तरफ यहाँ पर, बिखरी हुई है साज़िशे 
मुझको अली मौला, अब तेरा ही सहारा है

 

 

“शैतान”

Image

हालात अक्सर बनाते है, इंसान को हैवान
यूँही नहीं बन जाता, पल भर में वो शैतान

बेबसी का शिकार, कई दफा कुचला गया 
आखिर में हारकर, उठा लेता है हथियार

आखों में बसाये थे, उसने भी सपने हजार 
जालिम दुनिया ने, तोड़ दिए पलभर में सब 

परेशां होकर जुल्म से, खायी अब ये कसम 
मिटा देगा उसको, छिना जिसने ये बचपन 

हालात अक्सर बनाते है, इंसान को हैवान
यूँही नहीं बन जाता, पल भर में वो शैतान

“प्रेम धुन”

Image

उन्मुक्त पंछी सा, नीले गगन में उड़ता गया 
मन तो है बावरा, प्रेम धुन से यूँ जुड़ता गया

तोड़ देता सब सरहदे, नहीं रहती कोई दीवार 
कहते है उसे मुहब्बत, जिसमे मैं डूबता गया 

उर्दू में बयां करू तो, ये है सूफियाना जूनून 
क़ैफियत में जिसकी, बसता बेइंतेहा सुकून 

प्यार इश्क़ या मुहब्बत, जो भी दो इसे नाम
सबसे ऊँचा दर्ज़ा, ख़ुदा का है ये मधुर पैगाम

मिलन और जुदाई, दोनों से मिलकर बनता
गर एक भी ना हो, दूसरा फिर अधूरा रहता

संवेदनाओ के ज्वर में, उतार चढ़ाव बहुत है 
प्रेम कि कश्ती को, चंचल ह्रदय का सहारा है 

तूफ़ान आये या उफनने लगे दुःख का सागर 
प्यार कि लहर से, हर मुश्किल आसां लगती 

मखमली एहसास को, शब्दो में पिरोता गया 
मैं शायर गुमनाम, ढाई आखर लिखता गया 

उन्मुक्त पंछी सा, नीले गगन में उड़ता गया 
मन तो है बावरा, प्रेम धुन से यूँ जुड़ता गया

“मेरी दुआ “

Image

नाराज है सब अल्फ़ाज मुझसे
रूठे हैं एहसास भी अब खुदसे
काग़ज पर उतरने से डरने लगे
खौफ़ कि स्याही जम सी गई
कल्ब की सुर्ख़ दिवारो पर
खुरचने से दर्द उभर आता
किससे कहूं ना कह पाया जो
गर ना कहूं तो फिर केसे रहू
परेशान है बहुत रुह मेरी
बस आजादी कि तलबगार
मौला मिला दे उस शख्स से
ज़रिया हो जो तेरी रहमत का
नवाज़ दे अर्श-ए-नूर से
कूबूल कर अब ये दुआ मेरी.

“जाने क्या हुआ मन को”

 Image

जाने क्या हुआ है इस मन को
यूं बुझा सा रहता आजकल
कोई ख्वाहिश नही बची इसमे
कोई उमंग भी अब उठती नही 
गुमसुम सा तन्हाई मे लिपटा हुआ
जेसे किसी पेड से चिपटी बेल हो
घर पर सबके बीच रहकर भी
खुदको मै अकेला पाता हूं
दर्द का एहसास भी अब होता नही
शायद इन्तिहा है ये बेबसी की
बुला ले खुदाया अपने जहां में
नही है अब जीने की हसरत
आजाद कर दे मुझे खुद से.

“माँ तेरी याद बहुत आती है”

Image

ज़िन्दगी कि उलझनो से 
मैं जब भी निराश हो जाता हूँ
टूटकर कहीं बेठ जाता हूँ
दिल यूँ भर आता है
पलकों से बहने लगे समंदर
जब सारी कोशिशे नाकाम हो 
उम्मीद दम तोड़ देती है
तन्हाई के उस मंज़र में
माँ तेरी याद बहुत आती है….. 

मगर तू कितनी दूर हैं 
ये सोचकर आँखे छलकती है 
काश मैं तेरे पास होता
झट से गले लगा लेती
मेरी सब उलझनो को 
अपने आँचल से पोंछ देती
गोद में सर रखकर 
बेफिक्र होकर सो जाता 
तू प्यार से मेरे सर पर
हाथ फेरती जाती
ज़िन्दगी यूँ मुन्तज़िर है 
माँ तेरी दुआओ कि
आज भी जब किसी मुश्किल में होता हूँ 
माँ तेरी याद बहुत आती है…..

इतना दूर क्यूँ मुझे भेजा 
मैं सदा तेरे पास रहना चाहता था
पढ़ा लिखा कर क़ाबिल बनाया 
क्यूँ मगर फासले आ गए है दरमियाँ 
यहाँ मेरा मन भी नहीं लगता है
भीड़ में रह कर भी
खुद को अकेला ही पाता हूँ
जब भी कोई कांटा चुभता है यहाँ 
मैं खड़ा बस तेरी राह देखू
कब तू आकर दिलासा देगी मुझे 
जेसे बचपन में दिया करती थी 
गिरते सम्भलते आखिरकार 
चलना तो सीख गया हूँ
खुद को सख्त भी बना लिया मेने 
मगर आज भी, जब मायूस हो जाता हूँ
माँ तेरी याद बहुत आती है…….. 

कई दिनों तक रोता रहा था मैं 
जब पहली दफा तुमने
घर से दूर मुझे पढ़ने भेजा
फिर धीरे धीरे एहसास हुआ
कि ये जरुरी भी है 
आगे बढ़ने के लिए 
लेकिन वो सिलसिला तो यूँ बढ़ा 
घर से दूरी फिर बढ़ती ही गई 
जाने केसी तक़दीर है ये मेरी 
इक हादसे ने दिल को 
पत्थर सा बना दिया 
सुनसान मोड़ पर लाकर
यूँही तड़पता छोड़ दिया 
अब चाहकर भी नहीं जा पाता हूँ 
बचपन के उस आँगन में
मगर आज भी, जब रात में 
बुरे ख्वाब से डरकर घबराता हूँ 
माँ तेरी याद बहुत आती है 
माँ तेरी याद बहुत आती है………

“इक शख्स छुपा मुझमें”

Image

बेड़ियो में जकड़ा हुआ
किस्मत से थका हुआ
इक शख्स छुपा मुझमें
जाने क्यूँ सहमा सा है
किसी कोने में यूँ बेठा
बाहर आने से घबराता है
दुनिया के दिखावें से मीलो दूर
अपनी दुनिया में रहता है
ना ये ज्यादा बात करता
ना अब कोई दोस्त बनाता
हर वक़्त खुद में बस उलझा रहता
लम्हो कि गिरह खोलता समेटता
आखिर में तोड़कर उन्हें
आज़ाद होने कि कोशिश करता
झुंझलाता झल्लाता हुआ
नाराजगी के साये में
तड़पती उस रूह को
कई तकलीफे यूँ देता रहता
मगर वो है कि
उफ़ तक ना करती
चुपचाप सब सहती
इक उम्मीद के इंतज़ार में
बस यूँही जल रही है
बेड़ियो में जकड़ा हुआ
किस्मत से थका हुआ
इक शख्स छुपा मुझमें…

 

 

Image

“लफ्ज़ो कि ज़ुबान”

MAST HAI=2

चंद टेढ़ी मेढ़ी लकीरो से
बनता है उसका वुज़ूद
कागज़ पर उतर कर
ज़िंदा करती गुजरा कल
कुछ भी ना बोले
पर सब कुछ कह देती है
वो है लफ्ज़ो कि ज़ुबान
जिसने छुआ इसे कभी
लज्ज़त में फिर डूबता गया
एहसास के गहरे समंदर में
तैरता रहता क़श्ती कि तरह
जो समझते है इस ज़ुबां को
उनके लिए ये इक जूनून
ज़ज्बातो को अपने फिर
पहनाते है अल्फ़ाज़ी लिबास
अलग अलग है रंग जिनके
ख़ुशबू भी है ज़ुदा ज़ुदा
कभी उदास, कभी बदहवास
जो रूठी तो दर्द बनी
लफ्ज़ो से रिसता हुआ
दर्द धीमे धीमे टपकता है
माशूक़ कि पलकों से जो लिपटी
हुस्न-ओ-नज़ाकत कि अदा कहलाई
कलम का उम्दा फ़न है ये
जिसे चाहे फ़राज़ दे
नूरानी क़ैफियत से नवाज़ दे
शब्दो के इस मेले में
बस ये कह रहा ‘इरफ़ान’
शायर के दिल से जो है जुड़ी
वो है लफ्ज़ो कि ज़ुबान …..

“मुहब्बत के वो ज़माने”

Image

मुहब्बत के वो ज़माने, फिर से याद आने लगे
ठहरे थे दिल में कही, ज़ेहन पर अब छाने लगे

नीले आसमां के तले, परिंदे से उड़ रहे है ख्वाब
झूमती हवाओ के संग, बादल बन बरसने लगे 

महकती हुई फ़िज़ा ने, खोला जो आँचल अपना 
नन्हे नन्हे अंकुर, दिल कि ज़मीं पर उगने लगे

मौसम का मिज़ाज़, रूमानी हर दिन होता नहीं
इश्क़ के चमन में यहाँ, फूल हजार खिलने लगे

गुजरते वक़्त कि नदी में, तैर रहे है कई लम्हे
यादों कि कश्तियों में, अब वो सवार होने लगे

उठती गिरती लहरे जहाँ, यूँ बाहें खोले मिलती
तसव्वुर के निशान भी, अब रूह पर छपने लगे

निगाहो के वो फ़साने, मुझे फिर आजमाने लगे 
पलकों से छलक कर, रूख पर अश्क़ बहने लगे 

मुहब्बत के वो ज़माने, फिर से याद आने लगे
ठहरे थे दिल में कही, ज़ेहन पर अब छाने लगे

“एक नादान परिंदा था वोह “

Pigeon

एक नादान परिंदा था वोह 
पतंग के माँझे से यूँ लटका हुआ 
मेने आज एक कबूतर देखा
कबका मर कर सूख चुका
माँझे से दोनों पंख कटे हुए 
बहुत फड़फड़ाया होगा शायद 
आज़ाद होने को
मगर ना मालूम था उसे
इस जाल के बारे में
इंसान के लिए जो महज खेल
मनोरंजन का साधन है 
परिंदे ने ना सोचा होगा कभी
ये पतंग यूँ मौत का खेल बन जायेगा
वो तो बस शाम को उड़कर
अपने घर लौट रहा था 
पतंगों कि उस बाजी में
जान कि बाजी हार गया
कुछ ना नज़र आया उसे 
बस माँझे में उलझता गया
आखिरी सांस तक फड़फड़ाता रहा 
फिर दम तोड़ दिया 
लटक गया माँझे से यूँ
जेसे हो कोई कटी पतंग 
छत कि मुंडेर से लटकी हुई 
दूर पेड़ो पर बेठे थे चील कौए
बदन को नौंच नौंच कर खा गए
जो बचा उसे धूप सुखा गयी
अब तो सिर्फ मांझा लटका है अकेला
किसी कबूतर के निशान नहीं इस पर 
शायद उसका गुनाह यही के
एक नादान परिंदा था वोह……… 

“अल्फाज़ो में नुमायाँ मेरा वुज़ूद”

Image

लड़खड़ाता हुआ, काँपता हुआ
धीमे धीमे मिट रहा है ये वुज़ूद
ना कोई रहबर है
ना कोई हमसफ़र
अनजान सी डगर पर 
मिलते है कई सितमगर
जेसे दरिया में उठते भंवर
कभी कभी तो वहाँ डूबने लगा
मगर इरादो कि पतवार ने
जोर लगाकर थाम लिया
समंदर तो आज भी तैयार है
यूँ मुझे निगलने को 
कुछ बेचैनिया मुंह चिढ़ाती हुई
हैरानियों से बतिया रही है
गहरे सन्नाटे जिनके दोस्त है
रात बसर जब होती है 
वो मुझे ख्वाबो में ले जाते है
होश खोने कि साज़िश में
उम्मीद का इक़ साया 
मुझे खोने नहीं देता वहाँ 
बस इतना कहता है 
हिम्मत ना हारना ऐ शख्स
मैं रहूँगा सदा तेरे साथ
हर कदम हर समय
बस तू खुद पे कर यक़ीं
फिर देख ये जहान तू 
अपने कदमो में पायेगा
कुछ यही दस्तूर है दुनिया का 
गर मैं हूँ तो मेरा वुज़ूद
जिस दिन मैं नहीं है 
फिर कहा साया मेरा 
अब तो बस अल्फाज़ो में नुमायाँ है मेरा वुज़ूद 

“बंदिश”

Image

बंदिशों में यूँ क़ैद होकर, ज़ुल्म सब सहता गया 
कुछ भी ना बाकि रहा, किरदार इक ढहता गया 

वक़्त भी गुजरता गया, खुद को मैं बदलता रहा 
साज़िशों से ज़र्द होकर, गुनाहो सा धुलता गया 

” बस तुमको ही पुकारा हैं “

Image

निगाहों ने हर लम्हा, इक चेहरे को तलाशा है
तन्हाई के आलम में, बस तुमको ही पुकारा हैं

गीली गीली सी खामोशियाँ, बहुत कुछ कह रही
ख्वाबो कि वादियों में, इक साथ तेरा गंवारा है

पल पल ये दिल-ए-नादाँ, बेकाबू सा होने लगा
मदहोशी के आगोश में, यूँ तुमको ही संवारा है

ज़ज्बात मेरे बिखरे से, टूटे हुए कांच कि तरह
समेट ले इन्हे दामन में, अब तेरा ही सहारा है

इश्क़ कि क़ैफियत, फ़िज़ा में नज़र आने लगी
तुम मानो या ना मानो, क़ायनात का इशारा है

ख़लाओं में, दुआओ में, सदाओ में, वफाओ में
हर मौसम में अब यहाँ, बस तेरा ही नज़ारा है

निगाहों ने आज यहाँ, तेरे चेहरे को तलाशा है
तन्हाई के आलम में, इक तुमको ही पुकारा हैं

“ये ज़िन्दगी”

Image

पढ़कर मेरे अल्फाज़, सब मिटा देती है वोह
सदां-ए-दिल को भी, अनसुनी करती है वोह

अब और कितने इम्तिहाँ, लेगी ये ज़िन्दगी
ठहर कर कुछ देर, फिर से चल देती है वोह