“ये दिल”

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      ……….ये दिल……….

फिर से करने लगा है दिल कुछ हसीं खताए
जिसे भुलाना चाहू अक्सर वो पल याद आये
इश्क पे जोर है किसका कोई ना बता सका
किसे याद रखे ये दिल और किसे भूल जाये

“सफ़र”

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…………सफ़र…………

अकेले हम चले थे इक मंजिल की ज़ानिब,
कारवां बढ़ता गया ना मिला कोई साक़िब,

सोचा उनसे शिकवा करेंगे इस सफ़र का,
मगर वो भी बह चला गैर हवा की मानिंद

“जीने की सज़ाये”

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    ……..जीने की सज़ाये………

सुन लेता कभी जिसके आने की सदाये
तक रही है राह उसकी अब तक निगाहें
बेपनाह चाही कभी जिस दर की पनाहे
खोकर उसे यूँ मिली अब जीने की सज़ाये

“वीरानियाँ”

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       ……..वीरानियाँ…….

चेहरे पर हजार खामोशियाँ है रुकी
अनकही हसरते पलकों सी यूँ झुकी
होंठ खामोश है कुछ नहीं अब बोलते   
ज़िन्दगी में अब ये वीरानियाँ है छुपी

“दिल-ए-नादाँ”

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   ………दिल-ए-नादाँ……..

लफ्ज़ो पर मेरे अब उन्हें यकीन आ गया
दर पर उनके वोह बेपनाह सुकून पा गया
तलाशते रहे जिसको हर शब ख्वाबो में हम
नज़रे मिली यूँ उनपे दिल-ए-नादाँ आ गया

“आज भी हैं”

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………आज भी हैं……..

फिज़ाओ में वोह रौनक आज भी है
हवाओ में सन्दली महक आज भी है
ख्वाबो में जुदा हुए तो क्या ग़म है
अक्स मुझमे उसके रवां आज भी हैं

“याद करने लगे है ‘

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   ……..याद करने लगे है…….

क्यूँ वो लम्हे अब दिलनशीं लगने लगे है
ख्वाब बेवजह कई मखमली बुनने लगे है
समझा नहीं इस नादाँ हकीक़त को मैं
वोह लफ्ज़ पढ़कर अब याद करने लगे है

“कितना मैं खोया”

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    ……..कितना मैं खोया……..

मत पूछ तेरे जाने के बाद कितना मैं रोया
ऐसा लगा जेसे मुझमें शख्स कोई है खोया
इंतज़ार में यह जिस्म अब तक है बेजान
जवाब पाने को खुद में हूँ कितना मैं खोया

“तेरे निशाँ नहीं मिलते”

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    ……तेरे निशाँ नहीं मिलते……..

तेरी तारीफ़ क्या करू अब अल्फाज़ नहीं मिलते
सोचा यूँही कभी जिसे वोह हमराज़ नहीं मिलते
इक झलक को भी तेरी ऑंखें तरस गई है मेरी
तलाशा हर जगह पर कहीं तेरे निशाँ नहीं मिलते

“बैचैन”

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      ……..बैचैन……..

तेरे जाने के बाद मैं कितना बैचैन था
तेरे आने की आस में बस जगा रहता
अश्क़ यूँ ख़त्म हुए जेसे सूखा दरिया
जुबां खामोश फिर भी हालत पर मेरी

“मुझे कहीं’

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……….मुझे कहीं………..

इक लम्हा मिला मुझे कहीं
सौ जिन्दगिया मेने जी ली
ख्वाब देखे कई खुशनुमा
हक़ीक़त का वो यकीं लिए

परवर दिगार की इनायत
मुझ पर रही सदा बेशुमार
रूह से अब मिला है सुकून
समाया था जो मुझमे यहीं

“कमी”

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………….कमी……………

आँखों में कुछ नमी सी दिख रही
बातों में जो इक कमी सी दिख रही
परछाई भी मेरी मुझसे दूर होने लगी
जेसे कोई दुआ यूँ आसमाँ में खो रही

“हर पल”

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    ………….हर पल……………

आँखों में इक चेहरा रहता है हर पल
यादों में वो सदा गूंजती है आजकल
कुछ बात जो होंठो तक आती नहीं
ख्याल में किसके गुम हुआ यूँ हर पल

“आरज़ू”

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   ………….आरज़ू……………

दिल को मेरे आरज़ू है उसकी
गुजरते वक़्त पे मगर बस नहीं
हसरतो को अब जुस्तजूं है उसकी
बिखरे ख्वाबो पे मगर यक़ीं नहीं
गुज़ारिश मेरी इतनी सी है या रब
कुछ ज्यादा नहीं हूँ माँग रहा
हयात में बस साथ उसका तू लिख दे

“गुजरा कल”

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………….गुजरा कल……………

गुजरे हुए कल को भुलाना यूँ आसान नहीं
बेदर्द यादो को मिटाना भी मुमकिन कहा
ख्वाबो के निशाँ हर रात मुझको यूँ पुकारते
मगर जागने की यहाँ अब कोई वजह नहीं है

“इक बार बोल दिया होता”

……………

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………………इक बार बोल दिया होता………..

ज़ुदा होना था गर यूँ तो इक बार बोल दिया होता
इरादों में ना सही ख्वाबो में क़ैद कर लिया होता
वक़्त की क़ैफियत को जो मैं समझ गया होता
दर्द के इस मुक़ाम में ना मुब्तिला हो रहा होता

“दर्द”

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   …………दर्द…………..

कहती है मेरी परछाई मुझसे
क्यूँ है बैचैन शाम-ओ-सहर
मिटती नहीं यूँ उसकी कमी
खो गया जेसे कल्ब-ओ-सबर
ऐसा तो नहीं माँगा था खुदाया
शब-ए-इबादत में डूबकर हमने
फासलों में दर्द बढ़ता ही गया
चाहतो के इस जहाँ में आकर

“या मौला”

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    ………….या मौला………..

मेरे गुनाह तलबगार है, तेरी रहमतो से
करीम तू ही बख्श दे, करम करके मुझपे
मेरे आमाल महरूम है, तेरी इनायतों से
रहीम तू ही नवाज़ दे, रहम करके मुझपे

“आवारगी “

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             ……..आवारगी……..

लफ्ज़ भी खफा है मुझसे, ये केसी बेरुखी सी है
सोचू जब इस बारे में, ज़ेहन में ख़ामोशी सी है
लाख कोशिशो की है, पर ना मिल पाया सुकून
ज़िन्दगी में अब मेरी, ये केसी आवारगी सी है

“कोई नहीं आता है”

 

 

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……….कोई नहीं आता है………….

बेरुखी इस रूह को परवाना बना देती है
कोई नहीं आता है, जलती हुई आग के पास
मुफ़लिसी अपनों को बेगाना बना देती है
कोई नहीं आता है, गिरती हुई दीवार के पास

“एहसास”

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……………एहसास………….

हर लम्हा मेने जिया इस ज़िन्दगी को
महसूस भी किया हर उस ज़ज्बात को
चाहा की हर लम्हा यहाँ खुश रह सकू
गैरो की हंसी में भूला यूँ अपने ही एहसास को

“यादें”

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………यादें……..

आज फिर पुरानी यादें सामने आई है
दिल कह रहा यूँही बस इक तन्हाई है

लम्हा है कोई जिसे तू भूल आया था
बरसो पहले कही यूँही छोड़ आया था

यादें लहरों की तरह होती है
कब तक इनसे दूर भागेगा
इक दिन तो वो भी आयेगा
खुद से जब रूबरू हो जायेगा

दिल कहता है काश वो दिन वापस आ जाये
मगर यादे समंदर किनारे रेत की मानिंद है
जो वक़्त के दरिया में बस घुलती जा रही है……इरफ़ान

“सर्द सुबह की कहानी”

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…….सर्द सुबह की कहानी……..

 

सर्द सुबह की बस यही है कहानी
कहीं धुंध तो कहीं एहसास बर्फानी

सर्दियों में देर तक यूँ सोते रहना
हटाकर रजाई फिर से ओढ़ लेना

उठकर पीते है इक चाय कि प्याली
साथ में होती गर्म परांठो कि थाली

माँ के हाथो में तो जादू ही रहता
खाते रहते सब ना कोई ना कहता

नहाने से सबका दिल जो घबराता
मुंह धोके ही काश काम चल जाता

कुछ भी कहो पर फ़िज़ा है रूमानी
छत पे धूप अब लगती है सुहानी

सर्द सुबह की बस यही है कहानी
कहीं धुंध तो कहीं एहसास बर्फानी………इरफ़ान

“तालाब”

 

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       …………..”तालाब”………….

सीने पे जमाये रखता था, कभी जो साहिल को
वोह तालाब इक बूंद के लिए आज तरस रहा है
सूखा सा बेज़ान पड़ा रहता है, अब यूँ अकेले में
जेसे कोई बूढा आदमी, घर के कोने में लेटा है
बारिश तो ऐसी रूठी, जेसे हो वो ख़फ़ा महबूबा
जुदाई में अश्क़ बहाता, ज़मी उन्हें सोख लेती
तपिश से उनकी फिर, धीरे धीरे उधड़ती जाती

इक दौर वो भी था, जब तालाब पूरा भर जाता
पानी की लहरे, हिचकोलों से किनारे धो जाती
किनारे भी जो बाहें खोले, छपाकों से यूँ मिलते
जेसे खेल रहा वहा कोई, मासूम शरारती बच्चा
रंग बिरंगी मछलिया, गोद में उछलती कूदती
पीपल का पेड़ किनारे पर, लहरो को निहारता
शाखो से जिसकी, बच्चे पानी में छलांग लगाते
तैरती हुई मछलिया, मगर उनसे डरती नहीं है
उन्हें बस यक़ीं है, इनका दिल पानी सा साफ़ है

तालाब यह सब देख कर, बड़ा खुश होता रहता
मगर उसे क्या मालूम, इंसान खुदगर्ज़ है बड़ा
तरक्की की चाहत में, क़ुदरत को भूल रहा है
पेड़ो के झुरमुट हटाकर, ऊँची इमारते बना रहा
क़ुदरत ने रहमत के दरवाजे, अब बंद कर दिये
बारिश हुई बादलो में क़ैद, कभी जो बरसती थी
ज़मीं पर बहकर वो, तालाब को ज़िंदा करती थी
बाँहों में थामे रखता था, कभी जो पूरे सैलाब को
वोह तालाब इक बूंद के लिए आज तरस रहा है …….इरफ़ान

“लम्हा”

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…………लम्हा………….

तेरे चेहरा मेरी आँखों में बसा रहने दे
खुद को मुझमें यूँ धीमे धीमे बहने दे
खामोश रात में ख्वाब इक बनता जा
कल क्या हो ये अब लम्हा जी लेने दे

“मौत”

 

 

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  ………….मौत…………

हर वक़्त हम खुद से ज़द्दोजहद करते है
हर घडी बस वोह हमें यही सिखलाती है
मैं तो आई हूँ नया रूप देने यूँ तुझको
ज़िन्दगी तू मुझसे इतना क्यूँ घबराती है

“माँ”

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          ………..माँ…………

ना दौलत से मिली है ना शोहरत में खिली है
रहमत है कही तो बस माँ कि दुआ में मिली है

बुलंद मर्तबा है इतना के आसमां भी झुक जाये
कदमो तले रहती है उसके जन्नत कि फ़िज़ाए

माँ कि गोद सा ठिकाना इस जहाँ में और कहा
पाता है खुदको महफूज़ ऐसा आशियाँ और कहा

जाता है घर से दूर तो फ़िक्र उसे हर पल सताए
वापस आने तक तेरे मांगे सलामती कि दुआए

मुश्किल में जब होता है तो होंसला वो ही दिलाती
हर परेशानी खुद झेलकर चेहरे पर हंसी ले आती

पापा को जब गुस्सा आये माँ ही तो तुझे बचाये
प्यारी बातो से ध्यान उनका कही और बंटाये

लिखने बेठा तारीफ तो लफ्ज़ ही ना मिल पाये
लिख सकू क़तरा भी खुद पर मुझे नाज़ हो जाये

ना इबादत से मिली है ना हसरत में खिली है
जन्नत है कही तो बस माँ के कदमो में मिली है

ना दौलत से मिली है ना शोहरत में खिली है
रहमत है कही तो बस माँ कि दुआ में मिली है ……इरफ़ान

“ख़लिश”

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गुज़ारिश कर रहा तुझ से इक लम्हे की
नवाज़िश कर दे तू मुझ पर वोह सादगी,
कशिश मुझे तुम्हारी बेपनाह यूँ पसंद है
बेवज़ह इक ख़लिश फिर क्यूँ मेरे संग है

“आजकल”

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तेरी यादों से होता हूँ बावस्ता हर घडी मैं आजकल
गुजरे उन लम्हों में बस खोया रहता हूँ मैं आजकल
तमाम कोशिशो के बावजूद नहीं मिल पा रहा सुकून
तेरा साया हो गया है गुम इन ज़ज्बातों में आजकल

“खुशबू”

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………….खुशबू………..

खुशबू यहाँ जो अब रहती है
जाने क्या वो मुझसे कहती है

कभी यहाँ कभी वहाँ बिखरी
आख़िर में खुद ही महकती है

बेआवाज़ इक हक़ीक़त है यह
हर मौसम में जो गुलज़ार रहती है

महसूस कर रहा हूँ जब से इसे
मुझे यूँ मुझमे ज़िंदा रखती है

लफ्ज़ो में बयाँ ना हो सकी कभी
सिर्फ एहसास है इक रूह में बसती है

खुशबू यहाँ जो अब रहती है
जाने क्या वो मुझसे कहती है……….इरफ़ान

“मेरा गांव”

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       ………..मेरा गांव………..
इस शहर में मेरे गांव सी बात कहा है
रौशनी है बहुत सितारो भरी रात कहा है
खेतो में हरियाली तितली वोह मतवाली
ओंस कि बूंदो में लिपटी सूरज कि लाली
पेड़ो पर बंधे झूले आये जब रिमझिम सावन
पहली बारिश में वहाँ खिल उठता है जीवन
चिड़ियों का चहकना और फूलो का महकना
मिटटी के आंगन में गिलहरियों का फुदकना
तालाब के किनारे इक पीपल है पुराना
देखकर उसे याद आये गुजरा ज़माना
वक़्त बदल रहा अब सोच भी है बदली
तरक्की कि चाह में सूनी हुई हर गली
ऊँची इमारतो में घर सी ताज़गी कहा है
सुख है बहुत सुकून भरी ज़िन्दगी कहा है
इस शहर में मेरे गांव सी बात कहा है
रौशनी है बहुत सितारो भरी रात कहा है …….इरफ़ान

“बारिश”

 

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………बारिश…….

आसमाँ के दरमियाँ ज़मीं की सिफारिश हो रही है
लगता है फिर से आज वोह पहली बारिश हो रही है

बूंदो में उसकी रवां होता है ज़िन्दगी का बसेरा
डूबकर जिसमे यूँ महक उठता है उजला सवेरा

काली घटाओ में क़ैद हुई फ़िज़ा की हसीं ख्वाहिश
टकराई वोह पहाड़ो से तो होने लगी फिर बारिश

भीगकर इसमें जो होने लगा है मदहोश बदन
रोम रोम खिल उठा जब चली वहाँ ठंडी पवन

ज़मीं पर हर तरफ बिझी है इक सब्ज़ चादर
आगोश में जिसके सिमट रहे शाम-ओ-सहर

सोहबत में इसकी खिलती है फूलों की क्यारी
पहली बारिश में जवां होती है इश्क़ की ख़ुमारी

बारगाह-ऐ-ख़ुदा में रहमत की गुज़ारिश हो रही है
तरबतर कर दे जो रूह को वो नवाज़िश हो रही है

आसमाँ के दरमियाँ ज़मीं की सिफारिश हो रही है
लगता है फिर से आज वोह पहली बारिश हो रही है ……..इरफ़ान

“ख़ामोशी”

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………… ख़ामोशी……………

हर पल तुम्हे यूँ देखना महज़ इत्तेफ़ाक़ ही था
मगर सुन ना सके तुम मेरी उस ख़ामोशी को

करता हूँ दीदार तेरा ख्वाबो में, तन्हा रातो में
मगर देख ना सके तुम मेरी क्यूँ सरग़ोशी को

अपने फ़ितूर को अब लफ्ज़ो में है ढाल दिया
मगर पढ़ ना सके तुम मेरी इक रुबाई को

सिर्फ मुहब्बत है तुमसे कोई मज़ाक ना था
मगर छू ना सके तुम मेरी उस मदहोशी को

हर पल तुम्हे जो चाहना महज़ इश्क़ ही था
मगर समझ ना सके तुम मेरी उस ख़ुमारी को

हर पल तुम्हे यूँ देखना महज़ इत्तेफ़ाक़ ही था
मगर सुन ना सके तुम मेरी उस ख़ामोशी को……….इरफ़ान

“ख़ुशी”

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…………ख़ुशी………..

ख़ुशी कि तलाश में, जाने क्यूँ भटक रहा
कभी यहाँ कभी वहाँ, आँखे मूंदे चल रहा

दौड़ती हुई ज़िन्दगी में, कुछ देर तो ठहर
मिलेंगे जहा तुझे, बेवजह फिर कई सवाल

सवाल कुछ अजनबी से, करते है जो हैरान
खोल गिरह मन कि. ना हो अब तू परेशान

नज़र आता है यहाँ, उम्मीदो का इक सवेरा
दामन में रहता है जिसके, खुशियो का बसेरा

हर लम्हे में है ख़ुशी, फिर जरा तू गौर कर
खुद में बसी है ख़ुशी, बस जरा महसूस कर …….इरफ़ान

“रात”

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………रात……….

आहिस्ता यूँही दिन गुजर गया
फिर रात आई इठलाते बलखाते
सितारो से सजी चादर ओढ़कर
सर्द चांदनी में आँचल भिगोकर

दिन भर कि थकान मिटाती
गोद में अपनी लोरी सुनाती
आग़ोश में है बेइंतहा सुकून
वोह रात फिर भी सोती नहीं है

खामोश बेठी है दुल्हन कि तरह
बहुत कुछ है शायद कहना इसे
मगर किससे कहे सब सो गये
ख्वाबो के इक जहाँ में खो गये

सबने लिया ज़ायका नींद का
बेबसी रात कि मगर ना जानी
देती दर्द-ओ-ग़म से निज़ात
वोह रात फिर भी सोती नहीं है

चाँद तो है आशिक़ कि तरह
सारी रात एकटक निहारता
रात चाँदनी में फिर ऐसे घुली
यूँ ज़मीं से पहली बारिश मिली

बदनाम हुई ये सदा अँधेरे से
हैरान दुनिया कि तंगदिली से
देती है हर दफा सबको राहत
वोह रात फिर भी सोती नहीं है…….इरफ़ान

“ग़ुज़ारिश”

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………..ग़ुज़ारिश……….

तेरा ख्याल ही काफी है जीने के लिए
गर तुम मिल जाते तो क्या बात होती
वोह ग़ुज़ारिश मेरी अब तक है अधूरी
गर जवाब दे जाते तो क्या बात होती

तन्हा रातो में यहाँ हर लम्हा तुझे पुकारा
जो ख्वाबो में मिल जाते तो क्या बात होती
दिल को है यकीं सच्चा वोह इश्क़ मेरा
गर इकरार तुम कर जाते तो क्या बात होती

सुरमयी वो आँखें तेरी हर जगह मेने तलाशी
जो इत्तेफ़ाक़न ही दिख जाते तो क्या बात होती
हर कदम सहता रहा वक़्त के बेदर्द सितम
गर मरहम तुम बन जाते तो क्या बात होती

अल्फाज़ो में बयां कर रहा हूँ अपना फ़साना
जो शायरी तुम बन जाते तो क्या बात होती
शिकवा नहीं ये कोई सिर्फ है मेरी ग़ुज़ारिश
गर हमनवां तुम बन जाते तो क्या बात होती

तेरा ख्याल ही काफी है जीने के लिए
गर तुम मिल जाते तो क्या बात होती
वोह गुज़ारिश मेरी अब तक है अधूरी
गर जवाब दे जाते तो क्या बात होती ………इरफ़ान

“नज़्म”

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चन्द अल्फाज़ मैंने कागज़ पर यूँही उड़ेले
आहिस्ता फिर नज़्म की शक्ल उभरती गई
मासूम बच्चे की तरह आँखे मूंदे हुए
मलमली सुबह आँचल में लपेटे हुए
लरजते हुए, काँपते हुए, शब में मचलते हुए
बेचैनी को महसूस कर रूह में बसती गई
नज़्म इक एहसास है बस, कागज़ पर उतरती गई…

पैदाइश होती हैं इसकी अनछुये ख़्याल से
दिल में उतरता हैं वो सुर्ख़ लहू की तरह
कैफ़ियत से लफ्ज़ को यूँ संवारता
बारिश में धुला हो जैसे पत्ता कोई
ख़्वाहिश से भरी हुई ख़्वाबों के जहां में
हसरतों से लबरेज़ दरिया सी बहती गई
नज़्म इक एहसास है बस, कागज़ पर उतरती गई…

होशवाले इसे हर्फ़ की नक्काशी कहते
उन्हें क्या खबर सरगोशी रहती इसमें
ज़हन से टपकते रहते गीले अल्फ़ाज़
स्याही के लिबास में ज़िन्दगी महकती
शरमाते हुए, घबराते हुए, इश्क़ में डूबते हुए
ज़ज्बात में भीगी अनकही बातें कहती गई
नज़्म इक एहसास है बस, कागज़ पर उतरती गई…