नज़्म (Nazm)

चन्द अल्फाज़ मैंने कागज़ पर यूँही उड़ेले
आहिस्ता फिर नज़्म की शक्ल उभरती गई
मासूम बच्चे की तरह आँखे मूंदे हुए
मलमली सुबह आँचल में लपेटे हुए
लरजते हुए, काँपते हुए, शब में मचलते हुए
बेचैनी को महसूस कर रूह में बसती गई
नज़्म इक एहसास है बस, कागज़ पर उतरती गई…

पैदाइश होती हैं इसकी अनछुये ख़्याल से
दिल में उतरता हैं वो सुर्ख़ लहू की तरह
कैफ़ियत से लफ्ज़ को यूँ संवारता
बारिश में धुला हो जैसे पत्ता कोई
ख़्वाहिश से भरी हुई ख़्वाबों के जहां में
हसरतों से लबरेज़ दरिया सी बहती गई
नज़्म इक एहसास है बस, कागज़ पर उतरती गई…

होशवाले इसे हर्फ़ की नक्काशी कहते
उन्हें क्या खबर सरगोशी रहती इसमें
ज़हन से टपकते रहते गीले अल्फ़ाज़
स्याही के लिबास में ज़िन्दगी महकती
शरमाते हुए, घबराते हुए, इश्क़ में डूबते हुए
ज़ज्बात में भीगी अनकही बातें कहती गई
नज़्म इक एहसास है बस, कागज़ पर उतरती गई ।।

(c) RockShayar

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