“एक अर्से से ये ज़ेहन मेरा, वादी-ए-कश्मीर है बना बैठा”

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ज़ेहन की जिस वादी में तेरा ख़याल पनपता है
सुना है आजकल वहां रोज़ाना कर्फ्यू लगता है
 
महज कुछ पत्थरबाज सवालों ने ये बखेड़ा खड़ा किया हैं
वरना आम ख़याल तो अब भी तेरे तसव्वुर के तलबगार हैं
 
ऐसे माहौल में अक्सर दिल के अरमान कुचले जाते हैं
मोहब्बत वाले मुल्क़ के ख़िलाफ़ ख़ूब नारे लगाए जाते हैं
 
मगर महबूब मेरे, हमें मिलना हैं चिनार के उन बगीचों में
दिमाग़ी फौज से बचके, दीदार करना हैं चुपके से दरीचों से
 
हमें बैठना हैं दिल की डल झील में, सजे हुए उन शिकारों में
हमें जाना हैं दहशत से दूर, हाँ बर्फ़ से लदे हुए उन पहाड़ों पे
 
मन की सुनसान गलियों में, भले ही सख्त पहरा हो
संग चलना हैं हमें, चाहे हर तरफ धुंध और कोहरा हो
 
खेलना हैं हमें बर्फ़ से, गुलमर्ग की उस घाटी में
फेंकने हैं गोले बर्फ़ के, तसव्वुर की तंगहाली पे
 
इंतज़ार है मुझे ऐतबार भी, इस कर्फ्यू के हट जाने का
एक अर्से से ये ज़ेहन मेरा, वादी-ए-कश्मीर है बना बैठा।

“दिल की बात, हाँ सबके साथ”

 

है ये गए शनिवार की बात
जमके जिस रोज़ हुई बरसात
की नए दोस्तों से मुलाक़ात
कुछ हसीं बात हुई उस रात
ज़िन्दा हुए फिर से जज़्बात
हुई नए सफ़र की शुरुआत
"हस्ताक्षर" की ये है सौगात
दिल की बात, हाँ सबके साथ
दिल की बात, हाँ सबके साथ

क्या खूब रही वो हसीन शाम
था जिसका बड़ा ही प्यारा नाम
दिया सबने बस यही पैग़ाम
दिल जीतना अब अपना काम

Open Mind से Open Mic का 1st Chapter शुरू हुआ 
हर एक Performer ने जहां Audience के दिल को छुआ

किसी ने Music से Romantic माहौल बनाया
तो किसी ने Stand-up Comedy करके खूब हंसाया

किसी ने Flute और Guitar की जुगलबंदी की
तो किसी ने पंजाबी गानों की Parody बड़ी चंगी की

किसी ने हँसी-ठहाकों की फुलझड़ियां जलाई
तो किसी ने शायरी की रंगीन महफ़िल सजाई

किसी ने बड़े ही Feel के साथ प्यारवाली Poetry सुनाई
तो किसी ने अपनी Practical Life कविताओं में दिखाई

किसी ने सुर लगाके अपने हमसफ़र को आवाज़ लगाई
तो किसी ने अपने हमसफ़र के लिए गीतों की झड़ी लगाई

किसी ने वाह-वाह किया तो किसी ने ताली बजाई
आखिर में फिर मिलने के वादे पर हुई रस्म-ए-विदाई

है ये गए शनिवार की बात
जमके जिस रोज़ हुई बरसात
की नए दोस्तों से मुलाक़ात
कुछ हसीं बात हुई उस रात
ज़िन्दा हुए फिर से जज़्बात
हुई नए सफ़र की शुरुआत
"हस्ताक्षर" की ये है सौगात
दिल की बात, हाँ सबके साथ
दिल की बात, हाँ सबके साथ।

			

उसने पलटकर देखना भी मुनासिब ना समझा

उसने पलटकर देखना भी मुनासिब ना समझा
अपनी ज़िंदगी में हमें कभी शामिल ना समझा

कैसे चलते भला ज़िंदगी की अजनबी राहों पर
जब ज़िंदगी ने ही हमको मुसाफ़िर ना समझा

“मेरी कहानी को कहानी समझके भूल जाना”

मेरी कहानी को कहानी समझके भूल जाना
मज़ाक या फिर कोई नादानी समझके भूल जाना

नहीं चाहता कोई और मुझ जैसा बन जाएं यहां
मेरे अश्क़ों को तुम पानी समझके भूल जाना

पल में आती है, पल-पल भिगा जाती है
बारिश को तुम बेगानी समझके भूल जाना

साथ गुज़रे जो पल, वो पल बड़े हसीन थे
वक़्त की उन्हें मेहरबानी समझके भूल जाना

हो सकता है तुम्हें बुरा लगे, और गुस्सा भी आएं
बीते लम्हों को बेमानी समझके भूल जाना

आहें जितनी भी लिखी हैं, काग़ज़ के पन्नों पर
याद न रखना उन्हें कहानी समझके भूल जाना।

“बहुत दिनों के बाद बारिश हुई आज”

 

बहुत दिनों के बाद बारिश हुई आज
ज़मीन और ज़िंदगी दोनों तर हो गई

बिजली के तार पे बारिश की बूंदें जिस तरह से चलती हैं
कुछ उसी तरह ये ज़िंदगी, ज़िंदगीभर अठखेली करती है

काग़ज़ की कश्ती इन दिनों कोई नहीं बनाता
सब अपनी हस्ती बनाने में जो मसरूफ़ हैं

पानी के छपाके भी इन दिनों सहमे से रहते हैं
बुरा ना मान जाएं दीवारें, ये दीवारों से डरते हैं

कीचड़ की वज़ह से इसे मिलती है रुस्वाई
है अंदर इसके, नील समंदर सी गहराई

बादल से ज्यादा बारिश को कौन जानता है
दोनों की जुदाई में सारा आसमान रोता है

सिर्फ पानी ही नहीं, यादें भी बरसाते हैं बादल
एक अर्से तक इन आँखों को तरसाते हैं बादल

बहुत दिनों के बाद बारिश हुई आज
तिश्नगी और तन्हाई दोनों फुर्र हो गए।

आकाशवाणी (All India Radio)

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ये आकाशवाणी का खुद का अपना स्टेशन है
अब आप अमीन सयानी साहेब से इसकी कहानी सुनिए
 
नमस्ते बहनों और भाईयों, बड़े ही कम शब्दों में आपको बताना चाहता हूँ
के हर दौर का सबसे लोकप्रिय गीत है ये, जो मैं आपको सुनाना चाहता हूँ
 
जैसे किसी प्यासे के लिए बेहद ज़रूरी है पानी
वैसे ही मनोरंजन का मतलब है आकाशवाणी
 
श्रोताओं का शुद्ध देसी साथी है विविध भारती
बहुजन हिताय बहुजन सुखाय की भाषा इसे भाती
 
अंग्रेजों के जमाने से शुरू हुआ यह शानदार सफ़र
बंबई और कलकत्ता में लगाए गएं दो ट्रांसमीटर
 
1930 में आखिरकार हुआ जो इसका Nationalization
कहलाई ये सेवा फिर Indian Broadcasting Corporation
 
आज़ादी के दस साल बाद खूब मशहूर हुआ रेडियो
जब नाम मिला इसे आकाशवाणी All India Radio
 
1957 में जब विविध भारती का आग़ाज़ हुआ
फिल्मी गीतों के साथ विज्ञापनों का प्रसारण स्टार्ट हुआ
 
नाच मयूरा नाच, विविध भारती पर प्रसारित पहला गीत था ये
बोल थे पं. नरेंद्र शर्मा के, संगीत अनिल विश्वास का, गायक थे मन्ना डे
 
आवाज़ से दिलों पर राज करते हैं RJ
लबों से लफ़्ज़ों में एहसास भरते हैं RJ
 
अमीन सयानी साहेब की वो दिलकश आवाज़
श्रोताओं को अब तक याद है उनका जादुई अंदाज़
 
बिनाका गीतमाला के वो गीत, आज भी गुनगुनाये जाते हैं
उजालों उनकी यादों के सदैव संगीत सरिता बहाते हैं
 
फौजी भाईयों के लिए जयमाला एक सौगात है
सरहद पे तैनात सिपाही के जुड़े इससे जज़्बात हैं
 
हवामहल प्रोग्राम के जरिए, नाटक व झलकियां पेश की जाती हैं
महिलाओं के लिए महिलाओं द्वारा सखी सहेली पेश की जाती है
 
कई काबिले तारीफ़ कार्यक्रमों का अद्भुत अजायबघर है पिटारा
यूथ एक्सप्रेस में बैठे,
हैलो फरमाईश करते,
सेल्युलाइड के सितारों का सफ़र है पिटारा
 
एआईआर से जुड़े हैं मन के तार
एंटरटेनमेंट का है ये एवरग्रीन स्टार
 
साल 2007 में इसकी गोल्डन जुबली मनाई गई
फिफ्टी पूरी होने पर ऑन एयर खुशी मनाई गई
 
Gold और Rainbow हैं इसके FM Station
Music से करते ये Mind का Meditation
 
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय है इसका कर्ता-धर्ता
सौ बार सुन लो फिर भी इससे मन नहीं भरता
 
KHz वाली ख़्वाहिशें, MHz वाला माहौल बनाती हैं
दिल की Waves पे ज़िंदगी, न्यूज नग़्मे सुनाती हैं
 
बदलते जमाने के साथ-साथ बदल रहा है रेडियो
Internet, Smartphone, के साथ ही अब DTH पर है रेडियो
 
Digital Quality के साथ अब Satellite का भी साथ है
मीडिया मुगल को चाहे जितने, प्रसार भारती की अलग ही बात है
 
रेडियो मात्र मनोरंजन का साधन नहीं, और भी बहुत कुछ है
सृजन के संगीत का मनमीत, ये कला का कवच है
 
आकाशवाणी का जयपुर केंद्र सबसे निराला है
MI Road पर स्थित ये उम्मीदों का उजाला है
 
चाहे मन की बात कहनी हो, या अपना मनपसंद गाना सुनना हो
All India Radio है न, फिर चाहे कोई भी पुराना गाना सुनना हो
 
Digital इस दौर में आकाशवाणी का कोई तोड़ नहीं
ये वो खिलाड़ी है, जिसकी किसी से कोई होड़ नहीं
 
तो दोस्तों ये थी आकाशवाणी की All Time Hit दास्तान
रेडियो पर गूंज रहा है वक़्त का BlockBuster बयान
 
जमाना भले ही बदल गया, पर नहीं बदला इसका अंदाज़
ज़िंदा है ज़िंदा रहेगा, आकाशवाणी का वो उम्दा एहसास।

वो हँसने के भी बहाने ढूंढते हैं

बंजर में बारिश के फ़साने ढूंढते हैं
वो हँसने के भी बहाने ढूंढते हैं

दुःखी होते हैं जब लोग अक्सर
नए जमाने में यार पुराने ढूंढते हैं

लापता हो जाता है पता जिनका
ज़िंदगीभर वो बीते जमाने ढूंढते हैं

ख़याल तो बंजारे हैं, बेबाक चले आते हैं
बंजारे भला कब यूं ठिकाने ढूंढते हैं

खो जाते हैं जो किसी दौर के दौरान
खुद को वो लिखने के बहाने ढूंढते हैं

गर इसे तरक्की कहते है तो नहीं चाहिए ऐसी तरक्की
नीची सोच वाले ऊंचे घराने ढूंढते हैं।

बोल तो सही, आखिर क्या चाहता है तू खुद से

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चीख-चीखकर मेरी ख़ामोशियां कह रही हैं मुझसे
बोल तो सही, आखिर क्या चाहता है तू खुद से

अंदर ही अंदर ये कैसा बवंडर उठ रहा है
भीतर-भीतर दिल दा समंदर जल रहा है

क्यों मिटा रहा है तू अपनी हस्ती को
क्यों जला रहा है तू अपनी बस्ती को

चीख-चीखकर सभी सरगोशियां कह रही हैं मुझसे
बता तो सही, आखिर क्या चाहता है तू खुद से

ना बताता है ना जताता है, बस खुद को खुद में छुपाता है
जितना हंसाता है उतना रुलाता है, खुद को क्यों सताता है

बस बहुत हुआ, खत्म कर अब इस सिलसिले को
बढ़ भी जा अब आगे तू, ना याद रख पिछले को

चीख-चीखकर मेरी ख़ामोशियां कह रही हैं मुझसे
बोल तो सही, आखिर क्या चाहता है तू खुद से।

“नाहरगढ़ किला जयपुर” (Nahargarh Fort Jaipur)

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जो भी जयपुर आता है, वो यहां ज़रूर जाता है
दोस्तों ये नायाब किला, नाहरगढ़ कहलाता है

यहां से मीठी यादें जुड़ी हैं, दिल की दिलकश बातें जुड़ी हैं
यहां आके हर ज़िन्दगी, आज़ाद खुले आसमान में उड़ी हैं

नाहरगढ़ जाने वाले सभी रास्तें एडवेंचर से भरे हैं
मोड़ पे मोड़ ऊपर से संकरी रोड़, ये डेंजर से भरे हैं

सवाई जयसिंह ने इसे सन् 1734 में था बनवाया
सुदर्शन मंदिर की वजह से ये सुदर्शनगढ़ कहलाया

कहते है कि बरसों पहले, यहां एक बाबा का वास था
पहुंची हुई हस्ती, नाहरसिंह भोमिया उनका नाम था

ज्योंही मजदूर दिन में थोड़ा किला बनाते
रात को बाबा आकर उसे ध्वस्त कर जाते

आखिरकार एक सिद्ध तांत्रिक ने उन्हें मना लिया
किसी दूसरी जगह पर स्थापित उन्हें करवा दिया

बस तब से ही ये किला नाहरगढ़ कहलाने लगा
सैलानियों का दिल, दिल खोलके बहलाने लगा

सवाई माधोसिंह ने यहां एक जैसे 9 महल बनवाएँ
अपनी 9 प्रेमिकाओं के नाम पे उनके नाम रखवाएँ

ये सारे महल आपस में एक ही सुरंग से जुड़े हुए हैं
मौसम के मुताबिक यहां, हवा-रौशनी बिखरे हुए हैं

सूरज, खुशहाल, जवाहर, ललित, ये हैं पहले 4 महल
आनंद, लक्ष्मी, चांद, बसंत, फूल, बाक़ी के 5 महल

सारे महलों का सरनेम प्रकाश हैं
नाहरगढ़ से नजदीक ही आकाश है

अय्याश महाराजा जगतसिंह की माशूका को यहीं क़ैद रखा गया था
आलीशान अतिथिगृह में कनीज़ रसकपूर को नज़रबंद किया गया था

पानी बचाने के लिए जो एक बावड़ी बनाई गई थी
छोरे-छोरियां सब आजकल वहीं पर लेते हैं सेल्फी

आमिर ख़ान की फिल्म रंग दे बसंती ने इसे वर्ल्ड फेमस कर दिया
बाद उसके तो हर प्राणी ने यहीं आके अपडेट अपना स्टेटस किया

इस बार दिवाली की रात, जनाब आप नाहरगढ़ ज़रूर जाएं
और अपने पिंकसिटी को, सितारों सा जगमगाता हुआ पाएं

जो भी जयपुर आता है, वो यहां ज़रूर जाता है
ऐत्थे जाते ही दोस्तों, साड्डा दिन बन जाता है।

कई दिनों तक एक ही राह पे चलते रहना रुकने जैसा लगता है

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कई दिनों तक एक ही राह पे चलते रहना रुकने जैसा लगता है
अपने दिल की ना सुनना, अपने ही आगे झुकने जैसा लगता है
 
अपनी बेहतरी केे लिए बेहतर को छोड़ देना इतना आसान नहीं
हर बार बार-बार हज़ार बार डर के आगे दम तोड़ देती है ज़िंदगी
 
एक दोस्त ने लिखा था कभी, के ना चलना तो मौत की निशानी है
मगर बेवज़ह मुसलसल चलते रहना भी तो वक़्त की मनमानी है
 
मन करता है मेरा भी कभी, किसी शज़र के साये में थोड़ा सुस्ता लूं
अपनी सारी बेचैनियों को पलकों के गीले पर्दों के पीछे कहीं छुपा दूं
 
मगर फिर डर लगता है कि कहीं यह ठहराव मुझे चलना ना भुला दे
जमकर जगने से पहले कहीं यह छाव मुझे गहरी नींद में ना सुला दे
 
पहले भी अपने लिए कई जुनूनी फैसले ले चुका हूँ
उन्हीं फैसलों के दम पर आज बाहें फैलाएं खड़ा हूँ
 
अपनी ज्यादा गलतियां करने की आदत से परेशान नहीं हूँ
दिल खोलकर दिलवाली मनमर्ज़ियां करने से हैरान नहीं हूँ
 
देखते है इस बार किस अजनबी राह को हमराह बनाती है ज़िंदगी
देखते है इस बार किस तरह से क्या-क्या गुर सिखाती है ज़िंदगी
 
कई दिनों तक एक ही राह पे चलते रहना अच्छा नहीं
अपने दिल की ना सुनना, हाँ रत्ती भर भी सच्चा नहीं…

थोड़ा पाया है बहुत खोया है

थोड़ा पाया है बहुत खोया है
ये कैसा बीज ज़िंदगी ने बोया है

लबों तक आते-आते हर बार, दम तोड़ देते हैं जज़्बात
क्यूं वो अब तक नहीं रोया है

ना ख़्वाब आते हैं, ना सुकून मिलता हैं
जाने कैसी गहरी नींद में सोया है

सब्र भी अब तो जवाब देने लगा है
दिल ने इतना बोझ ढ़ोया है

मन का मोती खो चुका है कहीं
जाने किस धागे में पिरोया है

दिल ने क्या हसीं सितम किया है
थोड़ा हंसा है बहुत रोया है

कभी रौशन होके तो दिखा

इससे पहले कि ज़िंदगी का बल्ब फ्यूज हो जाएं
इससे पहले कि तू किसी दोराहे पे कंफ्यूज हो जाएं
 
एलईडी की तरह एक बार फुल टू जगमगाके तो दिखा
है तेरे भीतर कितनी ऊर्जा, कभी रौशन होके तो दिखा
 
इस तरह ज़ीरो वाट की रौशनी में जीने का क्या मतलब है
बिल की चिंता में तिल-तिल मरना बेवकूफी भरा करतब है
 
तेरे भीतर का वो रूहानी टंगस्टन तू कब जलाएगा
कब तू खुद जलके औरों को रौशन जहां दिखाएगा
 
बिजली की टेंशन है मगर ज़िंदगी की नहीं
बिल की टेंशन है मगर अपने दिल की नहीं
 
वहम तो विद्युत विभाग की तरह गलत रीडिंग ही देगा
मीटर सदैव चालू रखेगा ये बत्ती रोज़ाना गुल ही करेगा
 
इससे पहले कि ज़िंदगी की ट्यूबलाइट फ्यूज हो जाएं
इससे पहले कि तू किसी के हाथों मिसयूज हो जाएं
 
सूरज की तरह एक बार खुद को चमकाके तो दिखा
है तेरे भीतर अभी बहुत आग, जमके शोले तो बरसा
 
इस तरह ज़ीरो वाट वाली ज़िंदगी जीने का कोई मतलब नहीं
एसी की टेंशन में अपनी ऐसी तैसी कराने का कोई मतलब नहीं…

Aravali Range (अरावली पर्वतश्रृंखला)

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दुनिया की सबसे पुरानी वलित पर्वतमाला है अरावली
प्री क्रैम्बियन काल के पहाड़ों की महागाथा है अरावली

भूगोल के अनुसार यह प्राचीन गोंडवाना लैंड का हिस्सा है
राजपूताना से लेकर दिल्ली तक मशहूर इसका किस्सा है

थार के रेतीले टीलों को आगे बढ़ने से सिर्फ यही रोकती है
मगर मानसून के पैरेलल है, सो बादलों को नहीं रोकती है

राजस्थान के 17 जिलों में इसका व्यापक विस्तार है
कुदरत का करिश्मा यह सदियों पुराना कोहसार है

राजस्थानी भाषा में इसे आडावाळा डूंगर कहते हैं
इसकी सबसे ऊंची चोटी को गुरू शिखर कहते हैं

झीलों की नगरी से इसका गहरा लगाव है
अजमेर जिले में सबसे कम फैलाव है

समंदर के तल से औसत ऊंचाई है 930 मीटर
अरावली की कुल लंबाई है 692 किलोमीटर

उत्तर, मध्य और दक्षिण, बेसिकली तीन हिस्सों में बंटी हुई हैं
गुजरात के पालनपुर से लेकर राष्ट्रपति भवन तक फैली हुई है

पांच प्रमुख दर्रे इसके नाल कहलाते हैं
मेवाड़ के पठार ऊपरमाल कहलाते हैं

बाड़मेर में छप्पन की पहाड़ियां, तो अजमेर में मेरवाड़ा की पहाड़ियां
गर सीकर में है हर्ष पर्वत मालखेत, तो जालौर में सुंधा की पहाड़ियां

उदयपुर का उत्तर-पश्चिमी भाग मगरा कहलाता है
तश्तरीनुमा पहाड़ियों को जहां गिरवा कहा जाता हैं

लूनी और बनास नदी इसका विभाजन करती हैं
सिरोही की बेतरतीब पहाड़ियां भाकर कहलाती हैं

जोधपुर का मेहरानगढ़ हो या अजमेर का तारागढ़
अरावली के सीने पर सुशोभित हैं ऐसे अनेकों गढ़

भले ही मानसून को रोक पाने में असफल है अरावली
मगर थार को रोक पाने में यक़ीनन सफल है अरावली

बस इतनी सी इस महान पर्वतश्रृंखला की कहानी है
प्राचीन इतिहास की ये अद्भुत अद्वितीय निशानी है।

ज़िन्दगी का समोसा

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ज़िन्दगी का समोसा बड़ा ही करारा है
जल्दी से खालो इसे, ये मिलता नहीं दोबारा है
 
चाहत की चटनी नहीं है, तो क्या ग़म है
तन्हाई का तेल, तर रखता इसे हरदम है
 
सुबह-सुबह नाश्ते में अच्छा लगता है
ये अजनबी रास्ते में अच्छा लगता है
 
अहमियत न हो तो बहुत ही सस्ता है
कुरकुरापन लिए ये बहुत ही ख़स्ता है
 
दबे कुचले अरमानों के आलू इसमें दम भरते हैं
खुशबू और लज़्ज़त में कई गुना इज़ाफ़ा करते हैं
 
पेट भले ही भर जाएं, मगर दिल है कि भरता नहीं
पाकर इसे डाइटिंग करने को दिल कभी करता नहीं
 
बेशक इसे तैयार करने वाला, बड़ा ही बेनज़ीर कारीगर है
तारीफ उसकी मुमकिन नहीं, वो कायनात का क्रिएटर है
 
ज़िन्दगी का समोसा बड़ा ही चटपटा है
जी भरके खालो इसे, ये वन पीस ही मिलता है।

बोले तो आज अपुन का हैप्पी बर्थडे है

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बोले तो आज अपुन का हैप्पी बर्थडे है
कोई केक मुंह पे नी लगाएगा, शर्त यही है

पार्टी का टेंशन नहीं लेने का
सैटरडे सैटरडे करते रहने का

विदाउट एनी ब्लूटूथ, लाइफ के टफ़ एग्जाम में पासिंग मार्क्स आए हैं
मेहनत से बुरे वक़्त को मामू बनाकर, किस्मत के स्टार्स जगमगाए हैं

शिद्दत वाले सर्किट ने भी हर क़दम खूब साथ निभाया
टेंशन नहीं लेने का भाई कहके अपुन का हौसला बढ़ाया

ये केक काटने की फॉर्मेलिटी अपुन को नहीं जचती है
अपुन को तो अक्खी लाइफ ही अपना बर्थडे लगती है

साला ये अंग्रेज लोग भी पता नहीं क्या-क्या सिखा गए
आज ये दिन कल वो दिन, नित नए ठपले बतला गए

बोले तो हर दिन मस्त रहने का, खुलकर जीने का
शानदार शौक पालने का, मगर नशा नहीं करने का

अपने अंदर की आग को सुलगते गैस कटर में बदल दो यारों
फिर कोई सामाजिक डीन तु्म्हें आगे बढ़ने से नहीं रोक सकता

बोले तो आज अपुन का हैप्पी बर्थडे है
बिंदास जीने का झक्कास रहने का, यही अर्ज़ है

 

राह चलते अजनबियों की मदद कर देता हूँ

राह चलते अजनबियों की मदद कर देता हूँ
कुछ इस तरह अपने गुनाह कम कर देता हूँ
 
बहुत तलाशने के बाद भी, जब कोई ख़बर ना मिले
मैं उस सिलसिले को वहीं खत्म कर देता हूँ
 
इल्ज़ाम लगाने वाले, अपने गिरेबां में झांकते नहीं
दोगली दलीलें बिन सुने ही रद्द कर देता हूँ
 
उसकी याद तो अब भी आती है, बहुत आती है
नहीं आती तो वो, ऐसे में जीना कम कर देता हूँ
 
जब दिल का नाम लेकर कोई दिल तोड़ देता है
दिल के दरवाज़े सबके लिए बंद कर देता हूँ
 
खुद को पाने चला था, ख़ुद ही से हार गया
कभी-कभी तो ख़ुदगर्ज़ी की भी हद कर देता हूँ
 
ज़िंदगी की कश्ती, जब कभी डूबने लगती है
अश्क़ों का सैलाब बहाकर खुद उसे गर्क़ कर देता हूँ।

ईद मुबारक

ना वो इब्राहिम सा ईमान बचा है
ना वो आदम सा इंसान बचा है

फिर भी सब कह रहे हैं ईद मुबारक
अब तो बस दिल में यही गुमान बचा है

ये दिल है जनाब इस दिल का यही फ़साना है।

दिल के बारे में मैंने तो बस इतना ही जाना है
न जाना हो जिधर इसे तो बस उधर ही जाना है
 
कई साल हो चुके हैं, न बूढ़ा होता है न मरता है
ऐसा लगता है दिल तो फिल्मी कोई दीवाना है
 
एक बार जो इसे तोड़ दे, जुड़कर भी जुड़ता नहीं
ग़ैरों से नहीं दिल तो अपने आप से बेगाना है
 
चाहतों के पीछे-पीछे, ज़िंदगीभर भागता रहता है
किसी को बताता नहीं क्या इसको पाना है
 
हर बार नया लालच देकर फांस लेता है,
गुंडों का कबीला खुद को समाज कहता है
जमाना आज से नहीं इसका दुश्मन पुराना है
 
तन्हाई अक्सर डराती है इसे,
हज़ारों बार आज़्माती है इसे
जानता है इसे तो बस अपना साथ निभाना है
 
अंगारे बिछे हो जिधर, नंगे पाव उधर ही जाना है
ये दिल है जनाब इस दिल का यही फ़साना है।

नज़र नहीं आता अब वो इंसान मेरे अंदर

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नज़र नहीं आता अब वो इंसान मेरे अंदर
पर बाक़ी है उसके कुछ निशान मेरे अंदर
 
रफ़्ता रफ़्ता जो राहत मिली थी, ज्यादा देर न रुक पाई
आबाद हर गली है वो सुनसान मेरे अंदर
 
एक ज़लज़ले ने सब कुछ तबाह किया, फ़ना किया
नज़र आते हैं उजड़े वो मक़ान मेरे अंदर
 
बहुत कुछ कर सकता हूँ, बिना कुछ किए ही
बाक़ी है अब भी इतनी तो जान मेरे अंदर
 
पलकों के घर में, सपनों के टुकड़े चुभने लगेेे हैं
बिखर चुका है ख़्वाबों का जहान मेरे अंदर
 
परछाई बोलती है जिसकी, बिना अल्फ़ाज़ के आवाज़ के
रहता है कहीं साया एक बेज़ुबान मेरे अंदर
 
बहुत बुलाने पर थोड़ा आता है, शायद वो शख़्स शर्माता है
ऐसा लगता है जैसे है वो मेहमान मेरे अंदर
 
इक रोज़ घर में बहुत कुछ हुआ, हर तरफ बस धुआं ही धुआं
बाद उसके नहीं दिखा वो इरफ़ान मेरे अंदर।

महसूस करो नमी मेरी, अश्क़ हूँ मैं पलकों से बहता हूँ

तुम्हें शायद मालूम नहीं मैं तुम्हारी आँखों में रहता हूँ
महसूस करो नमी मेरी, अश्क़ हूँ मैं पलकों से बहता हूँ

कई रोज़ गुज़र जाते हैं, मगर गुज़रती नहीं वो इक रात
उस इक रात की हर बात अपने आँसुओं से लिखता हूँ

मुसाफ़िर कई मिलते हैं रोज़, मिलकर वो बिछुड़ते हैं रोज़
मील के पत्थर सा टकटकी बाँधें उन्हें बस देखता हूँ

उसने तो बड़ी आसानी से एक रोज़ अलविदा कह दिया
और मैं हूँ के अब तलक अलविदा कहने से डरता हूँ

जब इंतज़ार दम तोड़ देता है, और साया भी साथ छोड़ देता है
उस वक़्त एक बदलाव अपने अंदर महसूस करता हूँ

मज़ाक भी उड़ाया गया, और मज़ार भी बनाया गया
ज़िंदगी के ज़ुल्मो सितम बड़ी ही ख़ामोशी से सहता हूँ

भूले भटके से ही आना कभी, पता है मेरा अब भी वहीं
सच कहता हूँ दिल के बेघर घर में मैं अब भी रहता हूँ।

बड़ी ख़ामोशी से लब लफ़्ज़ तलाशते हैं

हर शख़्स में अपना अक्स तलाशते हैं
बड़ी ख़ामोशी से लब लफ़्ज़ तलाशते हैं

मिलके भी मिलता नहीं, शिकायत यही रहती है क्यों
ग़ैरों में हम अपने जैसा शख़्स तलाशते हैं

कुसूर सारा नज़रों का हैं, सब जानते हैं सब मानते हैं
फिर भी जाने क्यों वही नक़्श तलाशते हैं

सीने में शीशे सा दिल लेकर, ज़िंदगी भर
न टूटे कभी जो वो तिलिस्म तलाशते हैं

आखिर में कुछ बचता नहीं, कहीं कोई रस्ता नहीं
रूह को ठुकराकर बस जिस्म तलाशते हैं

इसे तन्हाई का तकाज़ा कहे, या शायर का वहम
ग़ज़ल में लोग आजकल नज़्म तलाशते हैं

ये दुनिया वाले हैं, इन्हें क्या फर्क़ पड़ता हैं
ये तो मौत में भी एक रस्म तलाशते हैं।

आज़ादी हो गई इतनी सस्ती

बूंदी का एक लड्डू और दिन भर की देशभक्ति
यक़ीन नहीं होता आज़ादी हो गई इतनी सस्ती

महज झंडा फहरा लेने से फर्ज़ अदा नहीं हो जाता
जोशीले गानों से मिट्टी का क़र्ज़ अदा नहीं हो जाता

सही मायने में इस आज़ादी का मतलब क्या है?
किसी को इससे कोई मतलब नहीं, यही समस्या है

मैं ये नहीं कहता कि जश्न मनाना गलत है
मगर इस आज़ादी की बहुत बड़ी कीमत है

जिसे चुकाने से पहले हर बंदा हज़ार बार सोचता है
सिर्फ मैं ही क्यों, बस यही ख़याल मुल्क़ को तोड़ता है

साल में एक दिन वतनपरस्ती दिखाने वालों, सुन लो ये
इस दिखावे के बजाए देश के लिए सच में कुछ करे दिल से

खूब खुशियां मनाएं, चाहे घी के दिये जलाएं
पर उन शहीदों की क़ुर्बानी, हम भूल ना जाएं

सिर्फ दो दिन नहीं, पूरे साल ये जश्न चलता रहे
दिन दूनी रात चौगुनी, तरक्की वतन करता रहे।

परियों की तरह रौशन है किरदार तु्म्हारा

परियों की तरह रौशन है किरदार तु्म्हारा
सदियों से न सोई आँखों में है इंतज़ार तुम्हारा

बंजर में गुलशन लगती हो, बहार सी मल्हार सी
बारिश की बूँदें छूकर होता है एहसास तु्म्हारा

तुम्हारी ज़ुल्फ़ों में ख़ूब जचता है, चमेली का वो फूल
फूलों की तरह महकता है हर अंदाज़ तुम्हारा

वैसे तो ख़्वाहिशों की कोई इंतहा नहीं, कोई दवा नहीं
फिर भी ज्यादा कुछ नहीं मांगू मैं साथ तु्म्हारा

तु्म्हारे कुर्ते पे जितने फूल बने हैं, उतने ही मैंने सपने बुने हैं
बेसबब हर शब अब देखता हूँ मैं ख़्वाब तु्म्हारा

गर कर सको तो करो यक़ीं, एक वादा करता हूँ अभी
न तोड़ा है न तोडूंगा जानाँ कभी ऐतबार तु्म्हारा

मेरी ग़ज़ल भी तुम हो, शायरी का दिल भी तुम हो

दोस्तों के दरमियां हिसाब नहीं होते हैं

कुछ सवालों के जवाब नहीं होते हैं
दिल के चेहरों पे नक़ाब नहीं होते हैं

बहुत कुछ बह जाता है, फिर भी बाक़ी रह जाता है
आँखों में हर वक़्त ख़्वाब नहीं होते हैं

बस एक रिश्ते ने ज़िंदगी का फ़लसफ़ा समझा दिया
दोस्तों के दरमियां हिसाब नहीं होते हैं

वक़्त की आंधी से भला, कौन बच पाया है यहां
बेवज़ह तो रिश्ते ख़राब नहीं होते हैं

भीतर से निखार देता है, बुरा वक़्त सुधार देता है
बिना काँटों के फूल गुलाब नहीं होते हैं

गर मोहब्बत गुनाह है, तो गुनाह ये क़ुबूल है
ऐसे गुनाहों के अज़ाब नहीं होते हैं

धोखा खाकर हमने तो यही सीखा है इरफ़ान
सब इंसान यहाँ खुली किताब नहीं होते हैं।

दफ्तर की वो लड़की याद है अब तक

दफ्तर की वो लड़की याद है अब तक
उसकी इक मुस्कान साथ है अब तक

उसने तो पलभर में दूूरियों का दामन थाम लिया
दूर होकर भी मेरे वो पास है अब तक

उसका चेहरा किसी की याद दिलाता है मुझे
वो चेहरा मेरे लिए ख़ास है अब तक

क़िस्मत ने मिलवाया, ज़रूरत उसे बनाया
उसका मिलना एक राज़ है अब तक

सागर भी सारा पी लिया, नदियां भी समेट ली
फिर भी लबों पे इक प्यास है अब तक

जिस रोज़ उसे देखा था, देखता ही रह गया
उसकी आँखों का नूर याद है अब तक

कई बरस हो गए हैं, मनाते हुए रोते हुए
न जाने क्यों ज़िंदगी नाराज़ है अब तक।

जो अलविदा कह दे कोई तो ज़िंदगी इंतज़ार हो जाती है

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आंसुओं को छुपाने की हर कोशिश बेकार हो जाती हैं
बेचैनियां जिस वक्त मेरे सिर पे सवार हो जाती हैं

लाख मनाओ इस दिल को, दिल है ये माने कहां
दिल को मनाने की ज़िद में ज़िंदगी मज़ार हो जाती है

बहुत वक़्त दिया मैंने, खुद को भी और उसको भी
फिर भी हर बार मेरी तन्हाई से तकरार हो जाती है

कोई क़लम से वार करता है, तो कोई सितम बेशुमार करता है
एक ख़बर में सिमटकर ये ज़िंदगी अख़बार हो जाती है

वैसे तो वैसा कोई मिला नहीं, जैसा मुझको मिला कभी
दिख जाए गर कोई वैसा तो ये आँखें बेक़रार हो जाती हैं

किसी से दिल मिलता नहीं, किसी से दिल भरता नहीं
पता नहीं क्यों मुझसे यही ख़़ता हर बार हो जाती है

एक अलविदा कहने में ये ज़ुबान बेज़ुबान हो जाती है
जो अलविदा कह दे कोई तो ज़िंदगी इंतज़ार हो जाती है।

दर्द महसूस भी होता है, दिल आज भी तड़पता है

दर्द महसूस भी होता है, दिल आज भी तड़पता है
तेरी एक झलक के लिए दिल आज भी तरसता है

बहुत ढ़ूंढा मैंने तुझको, ना मिली तू मुझको
तेरे इंतज़ार में बेक़रार दिल आज भी धड़कता है

कभी खुशबू तो कभी साये के पीछे भागता हूँ

बारिश में भीगकर भी मैं प्यासा रह जाता हूँ
कभी खुशबू तो कभी साये के पीछे भागता हूँ

मेरी नींद का फ़लसफ़ा बस इतना समझ लीजिए
पलकों के ऊपर सोता हूँ पलकों के नीचे जागता हूँ

तुम्हारी ख़ामोशी

तुम्हारी ख़ामोशी बहुत कुछ बोल देती है
बिना बोले ही यह लफ़्ज़ों के मोल देती है
अनकहे एहसास की गिरह खोल देती है
अंदरूनी आवाज़ की सतह टटोल देती है
तुम्हारी ख़ामोशी बहुत कुछ बोल देती है

इसी ख़ामोशी ने तो लबों को लरज़ना सिखाया है
इसी ख़ामोशी ने तो पलकों को झपकना सिखाया है
इसी ख़ामोशी ने तो दिल को धड़कना सिखाया है
इसी ख़ामोशी ने तो खुशबू को महकना सिखाया है

तुम्हारी ख़ामोशी बहुत कुछ बोल देती है
बिना बोले ही यह सांसें कुछ और देती है
सिले हुए लबों की हर गिरह खोल देती है
ठहरे हुए आंसुओं की नमी टटोल देती है
तुम्हारी ख़ामोशी बहुत कुछ बोल देती है

इसी ख़ामोशी के इंतज़ार में कुछ अल्फ़ाज़ अब तक अधूरे हैं
पूरा करने के लिए जिन्हें मुझे तु्म्हारे एहसास की ज़रूरत है
इस ख़ामोशी की चादर में, मुझको भी छुपा लो न जानाँ
बहुत दिन हो गए हैं शोर में पलते हुए, दिल ने ये माना

तुम्हारी ख़ामोशी बहुत कुछ बोल देती है
बिना बोले ही यह लफ़्ज़ों के मोल देती है
अनकहे एहसास की गिरह खोल देती है
अंदरूनी आवाज़ की सतह टटोल देती है
तुम्हारी ख़ामोशी बहुत कुछ बोल देती है

के दिल आ जाता है दिल के किस्सों पर

उसकी आँखों के पन्नों पर
मुझे ऐतबार है अपने लफ़्ज़ों पर
हर बार ये कुछ ऐसा लिख जाते हैं
के दिल आ जाता है दिल के किस्सों पर
ये दिल आ जाता है दिल के हिस्सों पर…

वो नज़दीकियों का मतलब दूरी समझ बैठी…

मोहब्बत को मेरी मज़बूरी समझ बैठी
होके वो दूर, दूरियों को ज़रूरी समझ बैठी

मैं करता रहा इंतज़ार, हर पल पल-पल उसका
वो नज़दीकियों का मतलब दूरी समझ बैठी…

अब पूछ ही लिया है तो सुन ये, बहुत प्यार करता हूँ तुमसे मैं

अब पूछ ही लिया है तो सुन ये
बहुत प्यार करता हूँ तुमसे मैं
इतना के बता भी नहीं सकता
जज़्बात ये जता भी नहीं सकता
गर महसूस कर पाओ तो करो इसे
बंद आँखों से जी भरके निहारो इसे
ये वो एहसास है जो साँसों में बसता है
ये वो अल्फ़ाज़ है जो आँखों में दिखता है
बस इसे पढ़ने का हुनर आना चाहिए
बाक़ी तो सब दिल के हवाले कर देना चाहिए

अब पूछ ही लिया है तो सुने ये
तुमसे ज्यादा तु्म्हें चाहता हूँ मैं
इतना के सोच भी नहीं सकती तुम
सोचना ये छोड़ भी नहीं सकती तुम
गर मुझ पे यक़ीन है तो यक़ीन करो
आसमान हूँ मैं तुम मेरी ज़मीन बनो
अगली बार मत पूछना के क्यों चाहता हूँ तुम्हें मैं
इस सवाल का जवाब तो खुद पता नहीं है मुझको…

कैसी दिखती हो तुम? देखो कभी मेरी नज़र से

कैसी दिखती हो तुम? देखो कभी मेरी नज़र से
जो देखोगी, तो प्यार हो जाएगा पहली नज़र में

बारिश की बूँदें बताएंगी तुम्हें, क्या है अक्स तुम्हारा
आँखें ये मूंदे दिखाएंगी तुम्हें, बेहद दिलकश नज़ारा
इन आँखों को किसी चश्मे की ज़रूरत नहीं
बिन देखे ही अक्सर ये बहुत कुछ देख लेती हैं

अकेली राहों का पता, पूछो कभी तन्हा सफ़र से
बीते लम्हों का पता, ढूंढो कभी यादों के शहर में
कैसी दिखती हो तुम? देखो कभी मेरी नज़र से
जो देखोगी, तो प्यार हो जाएगा पहली नज़र में

एक शख़्स है जो तुमसे बेपनाह मोहब्बत करता है
बिना निगाहों के भी तुम को अपने अंदर देखता है
इज़हार करने के लिए सही मौका तलाश रहा है
वो जो एक अरसे तक ज़िन्दा एक लाश रहा है

नूरानी रातों का पता, पूछो कभी संदली सहर से
बीती बातों की अदा, ढूंढो कभी साँसों की लहर में
कैसी दिखती हो तुम? देखो कभी मेरी नज़र से
जो देखोगी, तो प्यार हो जाएगा पहली नज़र में…

बारिश में अक्सर तुम याद आती हो

बारिश में अक्सर तुम याद आती हो
बूँदों के संग-संग मिलने चली आती हो
हवाओं से पुरानी यारी है मेरी
समझती है सारी बेक़रारी ये मेरी
तभी तो घने बादलों को नचाती है वो
बारिश में अक्सर तुम याद आती हो

अंदर के समंदर की बेचैनी जब भाप बनकर उठती है
घनघोर घटाओं का ताना-बाना ये फौरन बुन लेती है
पहाड़ों की दीवार से जब टकराती है वो
ठंडक मिले जहाँ वहीं बरस जाती है वो
बंजर को गुलशन हरदम बनाती है वो
बारिश में अक्सर तुम याद आती हो

मगर इन दिनों ना घटा है, ना हवा है, ना दुआ है
तभी तो ना बारिश होती है, ना ही तुम नज़र आती हो
और ना ही मुझको वो सुर, राग मल्हार आता है
गाकर जिसे मैं जब चाहूँ बुला लूं तुझे पास अपने
हाँ आता है तो बस बरसती हुई बारिश में भीग जाना
नज़र आता है तो बस बारिश में भीगा हुआ तेरा चेहरा
बारिश में अक्सर तुम याद आती हो
बूँदों के संग संग मिलने चली आती हो

क्यों चाहता हूं तुम्हें मैं ?

खुद मुझको भी नहीं पता, क्यों चाहता हूं तुम्हें मैं
हां जानना भी नहीं चाहता, क्यों सोचता हूं तुम्हें मैं

तुमको सोचने से ज़ेहन को ताज़गी मिलती है
तुम्हारी सादगी देखकर मेरी ज़िंदगी खिलती है

तुमने अपनी हंसी में कई अनमोल मोती छुपा रखे हैं
जब भी हंसती हो, ये दिल की ज़मी पे गिरने लगते हैं

उठाने को जब झुकता हूं, तुम्हारी झुकी हुई नज़रें नज़र आती हैं
हर बार ये सुरमई निगाहें तेरी, पहले से ज्यादा अपना बनाती हैं

कई बार तेरे नाम को अपनी हथेली पे लिखकर मिटा चुका हूं
कई बार तेरे चेहरे को अपनी पलकों पे रखकर सहला चुका हूं

कई बार सपने और दिल टूट चुके हैं, सो आदत हो चली है
घाव वो सारेे भर चुके हैं, दर्द से दिल को राहत हो चली है

ये मोहब्बत नहीं तो और क्या है? क्या है आखिर?
पता चले तो बताने ही सही, पर चली आना कभी

खुद मुझको भी नहीं पता, क्यों चाहता हूं तुम्हें मैं
हां जानना भी नहीं चाहता, बस चाहता हूं तुम्हें मैं

वो पूछती है, मेरे लिए क्यों लिखते हो तुम?

वो पूछती है, मेरे लिए क्यों लिखते हो तुम?
हर जगह आजकल इतने क्यों दिखते हो तुम

उसे क्या बताऊं, ये मन मेरा उसके मन से जुड़ गया
बैठा था कई दिनों से डाली पे जो, वो परिंदा उड़ गया

गर अब भी ना समझ पाए वो, तो अब और मैं क्या करूं
अब तक किया है जितना, प्यार उससे कहीं ज्यादा करूं

मुझको लगता है शायद, ख़बर है उसे भी मेरे दिल की
वरना यूं कोई क्यों पूछता हैं, राहों से डगर मंज़िल की

वो पूछती है मुझे इतना क्यों सोचते हो तुम
हर पल आजकल साथ मेरे क्यों होते हो तुम

उसे क्या बताऊं, ये दिल मेरा उसकी आस में बेचैन है
ना दिन का पता है इसे, ना होती इन दिनों कोई रैन है

गर अब भी ना समझ पाए वो, तो अब और मैं क्या करूं
अब तक किया है जितना, इश्क़ उससे कहीं ज्यादा करूं

मुझको लगता है शायद, ख़बर है उसे भी मेरे दिल की
वरना यूं कोई क्यों पूछता हैं, तूफ़ा से ख़बर साहिल की

बहुत मन था मेरा तुझसे मिलने का

बहुत मन था मेरा तुझसे मिलने का
जिस रोज़ तूने मिलने से मना कर दिया
मैं तो फिर कहीं नहीं गया उस रोज़ 
मगर ये बावरा मन मेरा मिलने तेरे घर गया

हवाओं के संग-संग आया था, सो पता कैसे चलता
पता पूछते पूछते आखिर इसका भी दिल भर आया
लौट आया फौरन, ना रुक पाया ज़रा भी देर वहां
इसे मालूम था, बेचैनी मेरी सता रही होगी मुझेे
आखिर अकेला छोड़कर मुझे, ये कहां रह पाता है
जहां भी जाता है, थोड़ी देर में लौट आता है

आकर जो इसने तुम्हारा हाल सुनाया
है वो अब तक मेरी सांसों में समाया

सुबह से उस रोज़, की थी तुमसे मिलने की तैयारी
इन आँखों में बस चुकी थी, तुम्हें देखने की बेक़रारी

और तुम हो, कि अपने आशिक को यूं तड़पा रही हो
हर रोज़ बेवज़ह बस इंतज़ार के तोहफ़े दिए जा रही हो

ख़ैर कोई बात नहीं, किसी दिन तो तुम्हें एहसास हो ही जाएगा
के जितनी शिद्दत से मैंने चाहा है तुम्हें, ना कोई और चाहेगा

बस इतना याद रखना, मेहरबानी नहीं मोहब्बत का मुंतज़िर हूं
जो ग़ौर करोगे कभी तो पता चलेगा, मैं भटकता हुआ एक दिल हूं…

 


			

वही पूछ बैठी मुझसे यूं देते हो किसे तुम सदाएं

मैं लिखता रहा जिसके लिए शामों सहर वफ़ाएं
वही पूछ बैठी मुझसे यूं देते हो किसे तुम सदाएं

अब मैं उसे समझाऊं, या अपने नादान दिल को
के तुम दोनों ने ही तो दी है मुझे जीने की अताएं..

तुमसे बात करके दिल को सुकून मिलता है

तुमसे बात करके दिल को सुकून मिलता है
तुम्हें याद करके चेहरा मेरा ख़ूब खिलता है

चोट तुमको लगती है और दर्द मुझको होता है
तेरी आँखें याद करके दिल सपने नए संजोता हैं

मिलने को बेताब हूं, बेचैन बेहिसाब हूं
आहिस्ता पढ़ना मुझेे, मैं एक बंद किताब हूं

पल दो पल की मुलाक़ात भी प्यारी लगती है
तुम्हारे बिन साँसें अब बोझिल सारी लगती हैं

तुमने तो बड़ी आसानी से एक रोज़ अलविदा कह दिया
पर तु्मको क्या ख़बर हमने दिल अपना वहीं रख दिया

वादा है मेरा, तुम्हारे हर दर्द को अपना बना लूंगा
लफ़्ज़ों की ही तरह दिल की बातें तुमको बता दूंगा

अब और दूर रहके, इस तरह तो ना सताओ जानाँ
ख़ातिरदारी करेंगे खूब, दिल के दर पे आओ जानाँ

तो फिर कब मिल रही हो जानाँ, ठीक उसी जगह पे आना
जहां छोड़के गया था मैं वो दिल अपना, हां वो दिल अपना

तेरे तो नाम में ही सुर है…

तेरे तो नाम में ही सुर है
जब भी लेता हूँ, आस-पास कई साज बजने लगते हैं
बेहद दिलकश है तेरी आवाज़, अंदाज़, और एहसास
तेरे बारे में जब लिखता हूँ, शहद से मीठे लगते हैं अल्फ़ाज़
इस बात का ख़ास ख्याल रखता हूँ
के ज़िक्र तेरा तन्हाई में करता हूँ
ताकि पहचान तुम्हारी और एहसास मेरे महफ़ूज़ रह पाएं
तुमने कहा था इक रोज़ मुझसे, के पता ना चले किसी को
बस इसी वादे के चलते मुझे भी अब जाकर ये मालूम हुआ
के कुछ तो है तेरे मेरे दरमियां, एक रूहानी सा राब्ता
जो सुकून देता है मुझे, हर पल हर घड़ी यूं गहरा।

तेरी तो बातों में ही धुन है
जब भी सुनता हूँ, पांव मेरे खुद बखुद थिरकने लगते हैं
तेरी शहनाई पर एहसास मेरे, बाहें खोले यूं नचने लगते हैं
बहुत ख़ास है, ये प्यास, सांस, और एहसास
तेरे बारे में जब सोचता हूँ, हक़ीक़त से ज्यादा अच्छे लगते हैं ख़याल
इस बात का ख़ास ख्याल रखता हूँ
के मोहब्बत तुमसे छुप छुपके करता हूँ
ताकि पहचान तुम्हारी और जज़्बात मेरे महफ़ूज़ रह पाएं
मगर अब और ज्यादा दिनों तक मैं छुपा नहीं पाऊंगा
इतना प्यार करता हूँ तुमसे, के कभी बता नहीं पाऊंगा
अब तो समझ जाओ, पास मेरे आ जाओ
लफ़्ज़ों को पढ़के मेरे, संग मेरे मुस्कुराओ…

Happy birthday Aamir bhai..(Rj Aamir)

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है मखमली आवाज़ का जादूगर वो
या कहूं के अंदाज़े बयां का कारीगर वो

गुलों की तरह महकता है, वो सावन की तरह बरसता है
या कहूं के दिलों को जीतने वाला बाज़ीगर वो

रातों को ज़िंदा करता है एहसास के पुर्ज़े वो
आंखों से बयां करता है अल्फ़ाज़ के क़तरे वो

ज़ुबां तो जैसे शहद से लिपटा हुआ एक लिबास है
वो एक शख़्स नहीं यकीनन मुकम्मल एहसास है

है मखमली आवाज़ का जादूगर वो
या कहूं के अंदाज़े बयां का कारीगर वो

है आमिर वो, दिलकश आवाज़ का साहिर वो
नूरानी क़ैफ़ियत से करता सबको मुतासिर वो…

 


			

मुझे तुमसे मोहब्बत हो गई

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एक बात कहूँ
मुझे तुमसे मोहब्बत हो गई
दिल को दिल की आदत हो गई
ज़िंदगी जीने की इज़ाज़त हो गई
तन से मन की बग़ावत हो गई
ख़्वाबों में ही सही, ज़ियारत हो गई
एक बात कहूँ
मुझे तुमसे मोहब्बत हो गई
दिल को दिल की आदत हो गई

लबों पे आके लफ़्ज़ ठहर जाते हैं
आँखों में अधूरे अक्स नज़र आते हैं
काग़ज़ पे इश्क़ के फ़साने उतर आते हैं
पलकों के पुराने आशियाने महक जाते हैं
यूँही तो नहीं, हम दीवाने कहलाते हैं
एक बात कहूँ
मुझे तुमसे मोहब्बत हो गई
दिल को दिल की आदत हो गई

दर्द से रूह को राहत हो गई
चाहा था जिसे वही चाहत हो गई
ना छूटे कभी जो वो आदत हो गई
ना टूटे कभी जो वो इमारत हो गई
ज़िंदगी आजकल इबादत हो गई
एक बात कहूँ
मुझे तुमसे मोहब्बत हो गई
दिल को दिल की आदत हो गई…


			

फिर कहने को भले ही वो मुझसे दूर है…

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कोई बात तो उसके किरदार में ज़रूर है
लबों पे दुआ, चेहरे पे हया का नूर है

मुझसे ज्यादा मेरे दिल के क़रीब है, हबीब है, ज़ेहनसीब है
फिर कहने को भले ही वो मुझसे दूर है...

			

काँच के गिलास में मिलने वाली चाय हो तुम…

काँच के गिलास में मिलने वाली चाय हो तुम
पीकर जिसे बारिश में दिल ये खुश हो जाता है
या फिर कहूँ के बंजारे के लिेए वो सराय हो तुम
ठहरकर जिसमें बंजारे को घर का एहसास होता है
कभी कभी तो यूँ लगता है बारिश की वो बौछार हो तुम
भीगकर जिसमें बेसबर इस रूह को राहत मिल जाती है
हाँ अगर कहूँ के धूप में साया देता शजर हो तुम
पाकर जिसकी छाव सुकून वाला सुकून मिलता है

बेरोज़गार दिल को बाद महीने के मिली सैलेरी हो तुम
पाकर जिसे ख़यालों का खाता खुशियां क्रेडिट करता है
या फिर कहूँ के गर्मी की वो छुट्टियां हो तुम
मनाकर जिन्हें स्टूडेंट यह मन फिर से खिल उठता है
कभी कभी तो यूँ लगता है शायर की वो क़लम हो तुम
डूबकर जो हर दिन कुछ नया अनकहा लिख जाती है
हाँ अगर कहूँ के मीर की वो ग़ज़ल हो तुम
पढ़कर जिसे दिल में दबे अरमां जगने लगते हैं

हफ़्ते भर की थकन उतारने वाला वो इतवार हो तुम
पाकर जिसे पूरे वीक की वीकनैस छूमंतर हो जाती है
या फिर कहूँ के सफ़र-ए-हयात में वो विंडो सीट हो तुम
बैठकर जहां पे हर मुश्किल सफ़र आसां लगने लगता है
कभी कभी तो यूँ लगता है राइटर का वो थॉट हो तुम
बोट पे जिसकी सवार होके हर रोज नया वो नोट लिख देता है
हाँ अगर कहूँ के मेरे ख़यालों की मलिका हो तुम
सोचकर तुम्हें हर बार प्यार से प्यार होने लगता है

अब तक तो तुम यह बात बहुत अच्छी तरह समझ चुकी होंगी
के मेरे दिल के साथ साथ मेरे लफ़्जों पर भी हुकूमत चलती है तेरी
जो ना लिखूं तु्म्हारे बारे में ज़रा भी
तो ये सारे अल्फ़ाज़ बाग़ी होकर गीला कर देते हैं हर वो काग़ज़
जिस पर लिखने की खातिर अपने जज़्बात उड़ेला करता हूँ
और फिर इसी नमी के चलते गुम हो जाते हैं वो सारे अल्फ़ाज और एहसास
जिनमें छुपाकर रखता हूँ हर रोज़ मैं एक तस्वीर तुम्हारी

काँच के गिलास में मिलने वाली चाय हो तुम
पीकर जिसे बारिश में दिल ये खुश हो जाता है
या फिर कहूँ के बंजारे के लिेए वो सराय हो तुम
ठहरकर जिसमें बंजारे को घर का एहसास होता है….RockShayar

 


			

वो जो हो चुके हैं खुद अपने लिए भी पराये

नज़रों पे चाहतों का चश्मा चढ़ाएं
तक रहे हैं कब से आवारगी के हमसाये

खुदगर्ज़ी की तोहमत क्या लगाएं उन पे
वो जो हो चुके हैं खुद अपने लिए भी पराये

पूरा एक महीना हो गया है तुमको देखे हुए….Miss You…

पूरा एक महीना हो गया है तुमको देखे हुए
अब तो आँखों ने भी यादों से सांठगांठ कर ली हैं
तभी तो इन दिनों ज्यादातर बहती ही रहती हैं
आजकल तो इन्हें केवल ख़्वाबों पर ही यक़ीन रह गया हैं
हक़ीक़त वाला दीदार भी तो महज एक ख़्वाब ही हो चुका है
बस इसी डर से बंद रखता हूँ मैं अपनी आँखेंं
के कहीं चला ना जाए ख़्वाब तेरा बुरा मानके
गर खुली रहेंगी ये आँखें, तो धुंधली हो जाएगी वो फोटू
दिलो दिमाग पे जिसने मेरे, किया है ऐसा खूबसूरत जादू
के अब तो हर जगह तुम ही तुम नज़र आती हो
बंजर में भी बारिश वाला वो एहसास दे जाती हो
पाकर जिसे मैं फिर से वो वाला मैं हो जाता हूँ
जीना जिसे अच्छा लगता है, हाँ बहुत ही अच्छा लगता है
महीने भर से भी ज्यादा हो गया है तुमको देखे हुए
अब तो पलकों ने भी यादों से सांठगांठ कर ली हैं
तभी तो इन दिनों ज्यादातर गीली ही रहती हैं
क्या पता इन्हीं अश्क़ों के सदक़े में तू मिल जाएं कहीं
और मैं जीने लगूं फिर से 
सोहबत में तेरी
मोहब्बत में तेरी
चाहत तू मेरी
आदत तू मेरी...

तुम इन दिनों ईद का चांद हो गई हो

तुम भले ही इन दिनों ईद का चांद हो गई हो
पर मैंने तुम्हारे हिस्से की वो सेवइयां 
संभालकर रखी हैं अब तक
मिलो कभी, तो अपने हाथों से खिलाऊं तुम्हें
हाँ पास बैठो कभी, तो जी भरके हंसाऊं तुम्हें
क्योंकि तुम जब हंसती हो 
तो हवाओं में हर तरफ खुशी की एक लहर फैल जाती है
और तुम जब ख़ामोश होती हो 
तो कायनात का हर ज़र्रा तुम्हारी धड़कन बनके धड़कने लगता हैं
हाँ तुम जब धीरे से शरमाती हो
तो काले घने बादल उमड़ आते हैं
फिर जब यूं हौले से दिल चुराती हो 
तो वो बारिश के तोहफ़े मुझे हज़ार दे जाते हैं
इस बारिश में भीगने से ज़ुकाम नहीं होता है
इस बारिश में भीगनेे से तो आराम मिलता है
मिलो कभी इत्तेफ़ाकन ही ऐसी बारिश में, तो बताऊं तुम्हें 
अब तक जितना पाया है, हाँ उससे कहीं ज्यादा पाऊं तुम्हें
तुम भले ही इन दिनों ईद का चांद हो चुकी हो
पर मैंने तुम्हारे हिस्से की वो सेवइयां 
सहेजकर रखी हैं अब तक
मिलो कभी, तो अपने हाथों से खिलाऊं तुम्हें
हाँ पास बैठो कभी, तो जी भरके हंसाऊं तुम्हें
क्योंकि तुम जब हंसती हो तो फिर से ज़िंदा हो जाता हूँ मैं
यूं हर बार बार-बार फिर से जी उठना अच्छा लगता है मुझे
तन्हाई की बजाए तुम्हारे साथ जीना अच्छा लगता है मुझे...
 


			

सच में यार, बहुत प्यार करता हूँ तुम्हें

तुम्हारे माथे पे ज़ुल्फ़ की वो इक लट प्यारी लगती है मुझे
कई बार मैंने तुम्हें इस बारे में बताने का भी सोचा है
सच में यार, बहुत प्यार करता हूँ तुम्हें मैं
बस कहने को लफ़्ज़ ही नहीं मिल पाते कभी
हालांकि लोग कहते हैं, मैं एक शायर हूँ
लफ़्ज़ों से रिश्ता बहुत गहरा है मेरा
मगर जब भी दिल की बात कहने की बारी आती है
लफ़्ज़ों से रिश्ता मेरा एक अजनबी की तरह हो जाता है
कल तक जिस क़लम को हमदम कहा करता था
आज वही क़लम साथ देने से इंकार कर देती है
मुझे लगता है ये सब जज़्बातों का तिलिस्म हैं
बिना रूह के इस जहान में बेजान हर जिस्म हैं
तुम वही गुमशुदा रूह हो मेरी, जो बरसों पहले बिछुड़ गई थी
अब जाकर मिली हो, इस बार तो छोड़कर नहीं जाओगी ना…

दिल ने ये पैग़ाम लिखा है

मेरे दिल के हर हिस्से पे तेरा नाम लिखा है
जो पढ़ सको तो पढ़ लेना, दिल ने ये पैग़ाम लिखा है

बहुत हो गया, यूं चोरी छुपे देखना, जज़्बात पलकों पे सहेजना
इस बार तो दिल ने फ़रमान ये सरेआम लिखा है

दूरियां भले ही मुझे तुमसे, दूर कर दे पर ऐ सनम
ज़ेहन ने तसव्वुर पे तेरे बेशकीमती ईनाम रखा है

शायर हूँ तो ग़ज़ल में बात करता हूँ, ग़ज़ल में बात कहता हूँ
मोहब्बत का ये पहला ख़त मैंने तेरे नाम लिखा है

नज़रें मिली जिस रोज़ तुमसे, तेरा हो गया मैं तो ओ जानाँ 
कभी ग़ौर से पढ़ना ये ग़ज़ल, प्यार का पयाम लिखा है

बहुत ग़म सह चुके हैं, बहुत तन्हा रह चुके हैं
पढ़ो कभी निगाहें, निगाहों में किस्सा तमाम लिखा है

पहुंचा सकूं तुम तक, अपने दिल की हर इक सदा
बस इसीलिए तो जानाँ, मैंने यह क़लाम लिखा है…

 
 
 

तुम्हें तो पता भी नहीं, कितना चाहता हूँ तुम्हें

तुम्हें तो पता भी नहीं, कितना चाहता हूँ तुम्हें
पता चले भी तो कैसे, बेअल्फ़ाज़ ख़त लिखता हूँ तुम्हें

पहली बार जिस रोज़ तुमको देखा था, बस देखता ही रह गया
बाद उसके अब हर जगह बेवज़ह देखता हूँ तुम्हेंं

तुम्हारा चेहरा किसी की याद दिलाता है, पता नहीं किसकी
सोच भी खुद पड़ जाएं सोच में, इतना सोचता हूँ तुम्हें

तु्म्हारी हंसी का वो इक क़तरा, संभालकर रखा है दिल में
जब भी दिल करता है, बेतहाशा जीता हूँ तु्म्हें

आँखें तुम्हारी हैं ग़ज़ल, चेहरा जैसे कोई किताब
जी भरके देखता हूँ पहले, फिर धीरे-धीरे पढ़ता हूँ तुम्हें

पता नहीं तुम कौन हो, हाँ दिल-ए-नादान का चैन हो
दरगाह पे धागे बांधकर, मन्नतों में मांगता हूँ तुम्हें

मैं ज्यादा तो कुछ नहीं जानता, ये क्या हो रहा हैं, ये क्यों हो रहा हैं
बस अपनी हर इक साँस में महसूस करता हूँ तु्म्हें…