“Suno Ae Taj” (सुनो ऐ ताज)

देखिए एक शायर की ताजमहल से की गई अब तक की सबसे अनोखी और तल्ख़ गुफ़्तगू जिसने आखिर में खुद मुमताज की रूह को क़ब्र में छटपटाने और शायर में समाने पर मज़बूर कर दिया…

Emotional Love Poetry by RockShayar Irfan Ali Khan at Nojoto Open Mic Agra which was held on 30th September, 2018. Watch Heart Touching Hindi Poetry. 

पश्मीना वो यादें तेरी

दर्द के सर्द मौसम में जब ज़िंदगी बग़ावत करती है
पश्मीना वो यादें तेरी मेरी रूह की हिफ़ाज़त करती है।

तू तो न जाने वादी के किस हिस्से में रहती है
ये ज़िंदगी तो अब तेरी तलाश से मोहब्बत करती है।

मिलेगी जो किसी मोड़ पर तो पूछूंगा ऐ ज़िंदगी
तू क्यूँ हर बात पर इतनी शिकायत करती है।

बहुत पसंद था न तुझे मेरे मोहब्बत करने का अंदाज़ वो
और मुझे ये बात के तू उस अंदाज़ से मोहब्बत करती है।

इत्तेफ़ाक़न ही सही पर इक मुलाक़ात तो हो कभी
बस इसीलिए तो आँखें तेरे ख़्वाब की हसरत करती है।

मालूम नहीं था मुझे दस्तूर तेरे फ़िरदौस का
के हूर जहां केवल फ़रिश्तों से मोहब्बत करती है।।

लगता है शहर में चुनावी माहौल है

सफेदपोश उड़ा रहे इक दूजे का मखौल है
लगता है शहर में चुनावी माहौल है

सियासती इस दौर में बहुत कुछ बदलने वाला है
आज है जो गली का गुंडा कल वो वज़ीर बनने वाला है

पंचवर्षीय ये योजना फिर से दोहराई जाएगी
बेचारे कर्मचारियों की इलेक्शन ड्यूटी लगाई जाएगी

ऐसी ड्यूटी से तो हर कर्मचारी को मुक्ति चाहिए
और जनता को तो बस भ्रष्टाचारी से मुक्ति चाहिए

ऐसे में मतदान के रूप में उम्मीद की नई किरण नज़र आती है
मगर नई सरकार बनते ही खुद अपने भरण-पोषण में जुट जाती है

हालांकि इलेक्शन कमीशन लगातार अपनी रेप्यूटेशन बनाए हुए है
मुद्दत से इस महान डेमोक्रेसी का डेकोरम मेंटेन किए हुए है

मगर अफसोस के पॉलिटिक्स को कुछ नेताओं ने गंदा किया
सत्ता को सट्टा समझकर उसे अपना पुश्तैनी धंधा बना लिया

पहले बैलट होता था अब ईवीएम का जमाना है
हर पार्टी का मूलमंत्र यही के बस पब्लिक को रिझाना है

अब देखना ये है कि जनता किसे चुनती है
शायद जो कमचोर है जनता उसे चुनती है

अपना अच्छा-बुरा जनता को खुद समझना चाहिए
इस बार तो ईवीम पर केवल नोटा ही दबना चाहिए

हो सकता है ये पंचवर्षीय फुटबॉल मैच यही खत्म हो जाएं
और शासन चलाने का कोई नया फॉर्मूला हाथ लग जाएं।

परिन्दा

कोई तो अंदर है जो बाहर आने को छटपटा रहा है
शायद कोई परिन्दा है जो उड़ने को फड़फड़ा रहा है

पर कट चुके हैं सभी, पर सोच के पर बाक़ी हैं अभी
सोचकर यही वो परिन्दा गिरकर भी मुस्कुरा रहा है

एक दिन तो छूना ही है उसे, ये सारा नीला आसमां
फिलहाल तो वो ज़मीं पे अपने क़दम आज़्मा रहा है

क़ैद किया था जिसने उसे, अँधेरे इक कमरे में कभी
सुना है इन दिनों खुद को वो उसी कमरे में पा रहा है

किसी हादसे ने नहीं, उसे उसके घर ने बेघर किया 
तभी वो परिन्दा साँझ ढले अब अपने घर नहीं जा रहा है…

#RockShayar

तेरे गुलाबी गालों सा लगता है मेरा शहर

Dedicate to Delicious Kashmiri Cuisine…

तेरे शहर की नून चाय सा दिखता है मेरा शहर
सुन तेरे गुलाबी गालों सा लगता है मेरा शहर

मिलने आओ न कभी तुम पहाड़ों से मैदान में
वादियों के जहान से मेरे दिल के रेगिस्तान में

दिल ने बनाया जिसे मोहब्बत के उस मक़ान में
शिद्दत से सजाया जिसे उस दावत-ए-वाज़वान में

शुरूआत में तुमको लज़ीज़ तबाक माज परोसूंगा
साथ में जिसके बीते लम्हों की बाकरखानी होगी

और फिर मैं तुमको इश्क़ का वो क़हवा पेश करूंगा
तन्हाई में जिसे मैंने चाँद के नूर से तैयार किया था

हालांकि यादों का यख़नी पुलाव भी बनकर कब से तैयार है
मगर ग़मों की गुश्ताबा करी एक अर्से से ज़ेहन पर सवार है

यक़ीनन कुछ जज़्बात अब भी सहमे हुए और ख़ामोेश हैं
पर कोई बात नहीं अभी हमारे पास रूहानी रोग़न जोश है

तो बताओ फिर कब आ रही हो मेरे शहर
अब तो मेरी नून चाय भी खत्म हो गई है

अब तो इस इंतज़ार को और इंतज़ार न बनाओ
अब तो बस आ ही जाओ सुनो तुम आ ही जाओ

वरना मैं तो फिर आ ही रहा हूँ इस बार तेरे उन पहाड़ों पे यार
देख ही लूंगा इस बार आख़िर ऐसा क्या है उन पहाड़ों के पार।

नून चाय – कश्मीरी चाय जो गुलाबी रंग की होती है
वाज़वान – कश्मीरी व्यंजनों में एक बहु-पाठ्यक्रम भोजन है
लज़ीज़ – स्वादिष्ट
तबाक माज – तले हुए मटन चॉप्स
बाकरखानी – एक मोटी मसालेदार रोटी
क़हवा – कश्मीरी कॉफ़ी
यख़नी – कश्मीरी पुलाव का एक अन्य रूप
गुश्ताबा करी – पारंपरिक कश्मीरी करी
रोग़न जोश – कश्मीरी मटन डिश

मुझको आजकल कहीं भी सुकून नहीं मिलता

मुझको आजकल कहीं भी सुकून नहीं मिलता
लिखना तो चाहूँ लेकिन मज़्मून नहीं मिलता।

अभी कुछ और तड़पना होगा, कुछ और बरस
इतनी जल्दी तो किसी को जुनून नहीं मिलता।

गर जुड़ाव हो तो ज़मीन-ओ-आसमां के जैसा
दरमियाँ जिनके कहीं कोई सुतून नहीं मिलता।

आधी उम्र गुज़र गई, तब जाकर ये पता चला
के मेरे अपनों से मेरा ज़रा भी ख़ून नहीं मिलता।

तोड़ने पर मिले सज़ा, दिल जोड़ने पर मिले जज़ा
इस जहां में ऐसा तो कोई क़ानून नहीं मिलता।।

@RockShayar.com

मज़्मून – विषय, Subject
सुतून – खंभा, Pillar
जज़ा – अच्छे काम का बदला, Reward

“उसकी कहानी उसका हर इक अश्क़ कहता है”

कोई कमबख़्त कहता है कोई बदबख़्त कहता है
फ़क़त इक यार ही तो मुझ को दरख़्त कहता है।

उसने देखा है मुझ को शजर से पत्थर होते हुए
वो मेरे दर्द को छूकर उसे फिर नज़्म कहता है।

क़ैद हैं क़िस्से कई उसकी पथराई आँखों में
उसकी कहानी उसका हर इक अश्क़ कहता है।

छुपाएं थे मैंने कभी ज़ख़्म किसी जमाने में
ज़माना जिसे के गुज़रा हुआ वक़्त कहता है।

बिन बताएं वो बिन जताएं दर्द से राहत दिलाएं
इसीलिए तो हर शख़्स उसे हमदर्द कहता है।

फ़र्क़ नहीं पड़ता मुझे अब ज़माने के किसी ताने का
ज़माना तो हर ख़ुद्दार को ख़ुदग़र्ज़ कहता है।।

कमबख़्त/बदबख़्त – अभागा/Unfortunate

फ़क़त – केवल/Only

दरख़्त – पेड़/Tree

शजर – एक पेड़/ a tree

नज़्म – उर्दू में कविता का एक रूप/Poetry

अश्क़ – आँसू/Tears

ख़ुद्दार – स्वाभिमानी/self-respecting

ख़ुदग़र्ज़ – स्वार्थी/Selfish

“माशा अल्लाह ! आपने क्या ख़ूब इंसाफ़ किया”

बे-क़ुसूर को सज़ा सुनाई, गुनहगार को माफ़ किया
माशा अल्लाह ! आपने क्या ख़ूब इंसाफ़ किया।

मुंसिफ़ भी आपका, वकील भी आपका
हमने तो मानो अदालत आके ही गुनाह किया।

मिजाजपुर्सी को आने लगे हैं लोग आजकल
ग़मों ने हमको कुछ इस क़दर बीमार किया।

मुनाज़िर नहीं है वो, जो हर बात पर जीत जाएं
वो जीता इसलिए, क्योंकि उसने पीठ पर वार किया।

घबरा रहा है दिल ये, पिछले कुछ दिनों से बहुत
लगता है इसने फिर किसी पर ऐतबार किया।।

मुंसिफ़ – न्यायाधीश, Judge
मुनाज़िर – शास्त्रार्थ करने में दक्ष, तर्क-वितर्क में माहिर
मिजाजपुर्सी – बीमार का हालचाल पूछना
ऐतबार – भरोसा, विश्वास

“मोहब्बत करना किसी की मज़बूरी नहीं होती”

ये कैसी तलाश है जो कभी पूरी नहीं होती
हरचीज़ को पाने की ज़िद ज़रूरी नहीं होती

बहुत कुछ सिखा देती है ज़िन्दगी
मोहब्बत करना किसी की मज़बूरी नहीं होती

भले ही दूर आसमानों में रहता है वो
गर दिल से मांगों दुआएं कैसे पूरी नहीं होती

कुछ तो कमी रही होगी दर्द के एहसास में
वरना ये कहानी अब तक अधूरी नहीं होती

उसने मुड़के देखना भी ज़रूरी ना समझा
जो देख पाती तो दरमियां आज ये दूरी नहीं होती।

“क्योंकि उस मुलाक़ात के बाद तुम तुम ना रहोगी”

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मेरे अंदा़ज़ को अपना अंदाज़ बना लोगी
नज़रें मिलते ही अपना सब कुछ गंवा दोगी

एक ही मुलाक़ात काफ़ी है इस तज़ु्र्बे के लिए
क्योंकि उस मुलाक़ात के बाद तुम तुम ना रहोगी

“लंबे सफ़र में धीरे चलो वरना थक जाओगे”

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हमें पिघलाने की ज़िद में खुद जल जाओगे
जलके हमारी तरह तुम भी राख बन जाओगे

यही सवाल हरबार क़दमों को रोक देता है
बिना तैयारी के बताओ तुम कहां तक जाओगे

जिस रोज़ ज़िंदगी से समझौता किया तुमने
खुद को भुलाके शख़्स कोई और बन जाओगे

बचपन की उस कहानी ने यही सबक सिखाया
लंबे सफ़र में धीरे चलो वरना थक जाओगे

किस बात का गुरूर है, जब बात ही इतनी है
के इस मिट्टी से बने हो इसी में मिल जाओगे

सुनो ऐ नादान परिंदों, हर उड़ान की यही दास्तान
लौटकर तुम शाम को अपने ही घर जाओगे।

“मेरी मौत का पुख़्ता कोई सुबूत नहीं है”

क़िस्सा ये मेरा अभी मशहूर नहीं है
दिल ये पहले सा मज़बूर नहीं है
 
इतनी भी क्या जल्दी है क़ाज़ी साहब आपको
नशे में हूँ, निकाह अभी क़ुबूल नहीं है
 
जांच ज़ारी है, मगर क्या फायदा
मेरी मौत का पुख़्ता कोई सुबूत नहीं है
 
चेहरे पे इतने चेहरे लगाए और हटाए
के चेहरे पे अब वो पहले सा नूर नहीं है
 
हररोज़ मुझसे यही कहती हैं कोशिशें मेरी
के मंज़िल तेरी तुझसे अब दूर नहीं है
 
दिल के नाम पे दग़ा देना बहुत बुरी बात है
बस एक यही बात दिल को मंज़ूर नहीं है।

“Radio Jockey/आरजे/रेडियो जॉकी”

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चाँदनी रातों में अक्सर इक मख़मली आवाज़ गूँजती है
हाँ वही दिलकश आवाज़, जो सितारों तक जा पहुँचती है
 
अपनी अलहदा आवाज़ के ज़रिए, वो जो अल्फ़ाज़ में एहसास भरते हैं
नज़र ना आने वाले ऐसे Hidden Heroes को ही हम आरजे कहते हैं
 
मुख़्तसर में अक्सर बहुत कुछ कह जाते हैं
ना होके भी ये सारा दिन हमारे साथ होते हैं
 
वैसे देखा जाएं तो रेडियो जॉकी पब्लिकली नज़र नहीं आते हैं
मगर फिर भी ये रोज़ाना हमारी ज़िंदगी में मिश्री घोल जाते हैं
 
इनके Good Morning Shows किसी का सारा दिन शानदार बना देते हैं
तो इनके Late Night Shows किसी का टूटा हुआ दिल दोबारा जोड़ देते हैं
खुद को अलग-अलग अंदाज़ में पेश करते हैं
ये ज़िंदगी को ज़ाफ़रानी आवाज़ में पेश करते हैं
 
सुनकर जिसे हम हम नहीं रहते हैं
साथ इनके इक नदी बनके बहते हैं
 
पर्दे के पीछे रहने वाले ऐसे नायाब फ़नकारों के लिए, Standing Ovation तो बनता हैं
बेशक दिल जीत लेने वाले ऐसे On AIR क़िरदारों के लिए, Appreciation तो बनता हैं
 
इन छुपे रुस्तमों को मेरा सलाम, इन छुपे रुस्तमों पर मेरा क़लाम
कभी न कभी तो होगा, इन छुपे रुस्तमों की दुनिया में अपना भी नाम।

#RockShayar

#RadioJockey #आरजे #रेडियोजॉकी

“ऐ दिल, तू क्यों इतना घबराता है”

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अपनी ही आहट पे चौंक जाता है
ऐ दिल, तू क्यों इतना घबराता है?
 
जो होना है वो तो होकर रहेगा
तू क्यों बार-बार खुद को आज़्माता है?
 
ऐसी भी क्या ज़िद है तेरी, क्या नादानी?
जो शीशे का सर लिए तू पत्थर से टकराता है
 
चंद जज़्बातों की खातिर शहीद हो जाता है
किसी से दूर तो किसी के क़रीब हो जाता है
 
पलभर में चाहे जिसे अपना बना लेता है
बाद में मगर सदियों तक भुला नहीं पाता है
 
धड़कन के ज़रिए तू सबको अपने दिल की बात सुनाता है
दिल जो ठहरा आखिर, मोहब्बत में अपना आप गंवाता है
 
कुछ लोग तुझ पर संगदिल होने का इल्ज़ाम लगाते हैं
तो कुछ लोग तेरे रहमदिल होने का एहसास कराते हैं
 
जुड़ने से पहले ही टूटने के डर से घबराता है
ऐ दिल, तू क्यों हरबार खुद से ही हार जाता है?

“थोड़ा पाने के लिए बहुत तड़पना ज़रूरी है”

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जाने से पहले आखिरी बार मिलना ज़रूरी है
जाते-जाते उसका पलटकर देखना ज़रूरी है

वादा करने वाले, एक वादा तू खुद से ये कर
वादा करने से ज्यादा वादा निभाना ज़रूरी है

जब सारे आंसू खत्म हो गए तो पता ये चला
के थोड़ा पाने के लिए बहुत तड़पना ज़रूरी है

कीमत चुकानी पड़ती है हरएक चीज़ की यहां
मरहूम होने के लिए आपका मरना ज़रूरी है

ये दिल जब टूटा तब बस यही सदा सुनाई दी
के ग़ैरों के बजाय इस दिल पे यक़ीं करना ज़रूरी है

गर्दिश में हो गर सितारे, बस इतना याद रख प्यारे
सुबह की खातिर सूरज का ढलना ज़रूरी है।

“Elasticity/लोच/प्रत्यास्थता”

#ObjectOrientedPoems(OOPs)

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इस दुनिया में हर चीज़ बलपूर्वक बदलाव का विरोध करती हैं
लेकिन बहुत कम चीज़ें ऐसी होती हैं, जो बल हटते ही पहले जैसी होती हैं

पदार्थ का यही गुण तो Elasticity है
रबर को देखकर हमें कला ये सीखनी है

मगर Elasticity की भी अपनी एक Limit होती है
क्योंकि हर किसी में इतनी सहनशक्ति नहीं होती है

एक यंगमैन ने सबसे पहले इस बात का पता लगाया
Stress और Strain का Ratio Young Modulus कहलाया

Unit Area पर लगाएं गए Force को ही Stress कहते है
जो कि आजकल हम लोग बहुत ज्यादा ही लेते हैं

वही लंबाई में बदलाव को Strain कहते है
और हिंदी में बोले तो इसे विकृति कहते है

जो कि आजकल हम इंसानों की सोच में आई हुई हैं
देखकर जिसे खुद हैवानियत भी घबराई हुई है

हुक बाबू की माने तो Stress व Strain एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं
Elasticity Constant है अनुपात तथा मात्रक को पास्कल कहते है

हालात कैसे भी हो, अगर हम Elastic बन जाएं
तो बबुआ साड्डी लाइफ भी Very Very Fantastic हो जाएं

वादा है जी, अगला Topic More Than लाजवाब होगा
मलाई की तरह लगेगी पढ़ाई, और मज़ा भी बेहिसाब होगा।

“चमकीले दिन बड़ी जल्दी बीत जाते हैं”

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Woman writing in her diary at sunset

चमकीले दिन बड़ी जल्दी बीत जाते हैं
रह रहकर बाद में बहुत याद आते हैं

साथ चलती है सदा परछाई वक़्त की
बीच-बीच में धूप के साये मुस्कुराते हैं

बिना जिनके हर खुशी अधूरी हैं, साथ जिनका कि बेहद ज़रूरी हैं
अँधेरे में यार सितारों से जगमगाते हैं

ना कोई फ़िकर रहती है, ना कोई परेशानी वहां
ज़ुनून के पौधे जिस जगह लहलहाते हैं

खुशबू आती हैं, हरवक़्त अपने अंदर से 
रूहानियत के फूल सारा आलम महकाते हैं

चाहे जितनी हवा भरो, चाहे जितनी दवा करो
मन के ये गुब्बारे फटाक से फूट जाते हैं

मज़बूरी में साथ निभाते हैं, मज़दूरी में कुछ नहीं पाते हैं
दूर जाने के बाद दोस्त बहुत याद आते हैं।

“आँखों से अश्क़ अब आज़ाद होना चाहते हैं”

आँखों से अश्क़ अब आज़ाद होना चाहते हैं
शायद! वो और कहीं आबाद होना चाहते हैं।

हमें तो उनकी हरइक साँस, है अब तक याद
और वो है के बीती हुई बात होना चाहते हैं।

बहुत वक़्त गुज़रा, फिर भी ज़ख्म नहीं भरे
लगता है अधूरा इक एहसास होना चाहते हैं।

तरबतर कर दे जो, रूह और रूहदार दोनों को
बंजर के लिए हम वो बरसात होना चाहते हैं।

रोते हुए इस बार भी, आंसू नहीं छलके उसके
किसी और की अब वो फ़र्याद होना चाहते हैं।

वो गलती से भी हमें, याद नहीं करते कभी
हम है के उनके लिए बर्बाद होना चाहते हैं।।

“इंतज़ार में आपके मज़ार हुए बैठे है”

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होश गंवाने को तैयार हुए बैठे है
खानाबदोश मन का शिकार हुए बैठे है

चादर चढ़ाने ही सही, पर आओ कभी
इंतज़ार में आपके मज़ार हुए बैठे है

ये हुनर सीखना इतना आसां नहीं हुज़ूर
बिन बादल देखो मल्हार हुए बैठे है

एक आप ही हो, जो क़रार के तलबगार हो
वरना हम तो कब से यूं बेक़रार हुए बैठे है

वज़ह थी इसकी भी, वज़ह बहुत बड़ी
बेवज़ह तो नहीं हम ख़ुद्दार हुए बैठे है

तुमने शायद ग़ौर नहीं किया इस बारे में कभी
मुद्दत से मेरे यार इंतज़ार हुए बैठे है।

हमने अपनी आँखों में इक आफ़ताब छुपा रक्खा है

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हमने अपने वज़ूद को कुछ यूं बचा रक्खा है
जैसे बरसती हुई बारिश में चराग़ जला रक्खा है

गज़ब हो जाएगा, जिस दिन अश्क़ों का सागर सूख जाएगा
बस इसीलिए तो सीने में एक दरिया दबा रक्खा है

पथराई आँखों को पढ़ने की गुस्ताख़ी ना कर बैठना
हमने अपनी आँखों में इक आफ़ताब छुपा रक्खा है

कई सिलसिले बाक़ी हैं, अभी कई जलजले बाक़ी हैं
तभी तो हज़ार रातोंं से हमने नींद को जगा रक्खा है

तुमने अभी हमारी मेहमाननवाज़ी देखी ही कहां है?
आओ कभी हवेली पे हमने मौत को दावत पे बुला रक्खा है।

मैं उनका दिल बहलाता हूं, वो मेरे ज़ख़्म सहलाते हैं

मेरा लहजा समझने वाले खुद को भूल जाते हैं
कई दिनों तक खुद में वो मुझको ही पाते हैं

हालांकि मैं ये सब जानबूझकर नहीं करता हूं
मैं उनका दिल बहलाता हूं, वो मेरे ज़ख़्म सहलाते हैं

“Brain/दिमाग़/मस्तिष्क/भेजा”

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इंसानी खोपड़ी भी क्या कमाल की चीज है
दिमाग को सुरक्षित रखती, ये वो चीज है

मात्र 29 हड्डियों से अपुन की खुपड़ियां बनी हैं
8 कपाल से, 14 चेहरे से, 6 कान से जुड़ी हैं

कपाल में ही तो छुपा असली माल है
साला 1400 ग्राम का दिमाग़, मचाता कितना बवाल है

खरबों न्यूरॉन्स थॉट वाली बोट चलाते हैं
बैकबॉन के ज़रिए ब्रेन को बाहुबली बनाते हैं

तीन मुख्य हिस्सों में बंटा हुआ है अपना भेजा
अगला, पिछला, मंझला, कुछ ऐसा है अपना भेजा

नर्वस सिस्टम है इसका कर्ता-धर्ता
दिमाग़ तो है बस भावनाओं का भर्ता

अगला भेजा अगेन तीन तिगाड़े में बंट जाता हैं
सेरीब्रम, थैलेमस, हाइपोथैलेमस कहलाता हैं

सोच का सागर सेरीब्रम से ही तो बहता है
थैलेमस तो बस ज़िंदगीभर दर्द ही सहता है

हाइपोथैलेमस में ही तो सब जज़्बात जवां होते हैं
गुस्सा, नफ़रत, इश्क़, मोहब्बत इसी में पनपते हैं

दिल तो बेचारा बरसों से, फोकट में ही बदनाम है
मज़नू, शायर, पागल, दीवाना, यहीं से पहचान हैं

मंझला हिस्सा हमें देखने-सुनने की शक्ति देता है
सेरीब्रल पेंडिकल दिमाग़ी तार स्पाइनल कॉर्ड से जोड़ता है

पिछले वाले हिस्से के, हैं जो दो अनमोल रतन
सेरीबेलम व मेड्यूला ऑब्लांगेटा, कहते जिन्हें सब जन

सेरीबेलम है वो खिलाड़ी, जो बॉडी का बैलेंस बनाता है
और मेड्यूला अपने इशारों पर दिल को धड़काता है

दारू पीने पर साड्डा सेरीबेलम बहक जाता है
इसी वज़ह से तो शराबी लड़खड़ाकर चलता है

सोडियम, पौटेशियम, और कैल्शियम की मदद से
इमोशन सब मोशन करते हैं इन तीनों की वज़ह से

ईईजी की मदद से दिमाग़ के तेवर पढ़े जाते हैं
ख़यालों में अक्सर ज़ेहन के ज़ेवर गढ़े जाते हैं

लाइफ का अक्खा लोचा चंद हॉर्मोंस की वज़ह से हैं
ऑक्सीटॉसिन ही तो रोमांस की रियल वज़ह है

ज़िंदगी में ज़ुनून का होना बहुत ही ज़रूरी है
साथ हो गर डोपामाइन का तो लक्ष्य से ना कोई दूरी है

कई सदमे सहता हैं, क्रेडिट जिनका के दिल लेता हैं
सदियों से बदनाम है दिमाग़, फिर भी खुश रहता है

तो बीड़ू कैसा लगा अपुन का माइंड ब्लोइंग माइंड
माइंड मत करना, क्योंकि ये है शायरी विद साइंस।

#ObjectOrientedPoems(OOPs)
#RockShayar

 

मैं लिखते वक़्त तड़पा था, तुम पढ़ते वक़्त तड़पना

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मेरी शायरी को समझने की कोशिश ना करना
ये एक समंदर है, इसमें अंदर तक उतरना

और ज्यादा कुछ नहीं बस इतना याद रखना
मैं लिखते वक़्त तड़पा था, तुम पढ़ते वक़्त तड़पना

“मैं अपने दिल को खुला आसमान समझता हूँ”

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बेज़ुबान परिंदों की ज़ुबान समझता हूँ
मैं अपने दिल को खुला आसमान समझता हूँ

जिस राह पर चलने से कतराते हैं सब
मैं उस राह को अपने लिए आसान समझता हूँ

“इंतज़ार में आपके मज़ार हुए बैठे है”

होश गंवाने को यूं बेक़रार हुए बैठे हैं
खानाबदोश मन का शिकार हुए बैठे है

चादर चढ़ाने ही सही, पर आओ कभी
इंतज़ार में आपके मज़ार हुए बैठे है

ये हुनर सीखना इतना आसान नहीं
बिन बादल देखो मल्हार हुए बैठे है

एक आप ही हो, जो क़रार के तलबगार हो
हम तो कब से यूं बेक़रार हुए बैठे है

वज़ह रही थी, इसकी भी बहुत बड़ी वज़ह
बेवज़ह तो नहीं हम ख़ुद्दार हुए बैठे है

तुमने शायद ग़ौर नहीं किया इस बारे में कभी
मुद्दत से मेरे यार इंतज़ार हुए बैठे है

मोहब्बत जो भी की थी मैंने वो मेरा हुनर था

मोहब्बत जो भी की थी मैंने वो मेरा हुनर था
मुझमें था कई बरसों से ना कि तेरा असर था

बस यही समझने में सारी ज़िंदगी गुज़र गई
के हर इक सफ़र में मैं ही तो मेरा हमसफ़र था

महसूस होते-होते रह गया वो जज़्बात सयाना
महसूस भी कैसे होता वो दिल से बेघर था

उसका हर इक सपना शीशे सा टूटता गया
टूटना भी लाज़िम था उसे नींद का वहम था

तोहमत लगाने वाले भी सही थे, खिल्ली उड़ाने वाले भी सही थे
एक मैं ही था जो अपनी हस्ती से बेख़बर था

बहुत दिनों के बाद जब आई उसकी याद
तो पता ये चला के मैं चट्टान वो लहर था।

मोहब्बत हमने भी की थी किसी जमाने में

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मोहब्बत हमने भी की थी किसी जमाने में
थे आदमी काम के हम भी किसी जमाने में
 
मालूम नहीं इन दिनों जाने कहां रहती है वो
वो जो मेरे दिल में रहती थी किसी जमाने में
 
ऐसा नहीं है कि हमने कोशिश नहीं की, ख़्वाहिश नहीं की
दुआएँ हमने भी मांगी थी किसी जमाने में
 
हमें ज़िंदगी का पाठ पढ़ाने वाले, क्या तुझे पता नहीं
ज़िंदगी हमने भी जी थी किसी जमाने में
 
दिल को सीने में क़ैद रखना मुमकिन कहां
ख़ता ये हसीं हमसे भी हुई थी किसी जमाने में
 
अपनी मासूमियत पे इतना भी न इतराओ तुम
थे मासूम तुम से हम भी किसी जमाने में
 
जिस जगह का ज़िक्र, शायर सयाने ने किया था कभी
कश्ती हमारी भी डूबी वहीं किसी जमाने में।

“एक अर्से से ये ज़ेहन मेरा, वादी-ए-कश्मीर है बना बैठा”

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ज़ेहन की जिस वादी में तेरा ख़याल पनपता है
सुना है आजकल वहां रोज़ाना कर्फ्यू लगता है
 
महज कुछ पत्थरबाज सवालों ने ये बखेड़ा खड़ा किया हैं
वरना आम ख़याल तो अब भी तेरे तसव्वुर के तलबगार हैं
 
ऐसे माहौल में अक्सर दिल के अरमान कुचले जाते हैं
मोहब्बत वाले मुल्क़ के ख़िलाफ़ ख़ूब नारे लगाए जाते हैं
 
मगर महबूब मेरे, हमें मिलना हैं चिनार के उन बगीचों में
दिमाग़ी फौज से बचके, दीदार करना हैं चुपके से दरीचों से
 
हमें बैठना हैं दिल की डल झील में, सजे हुए उन शिकारों में
हमें जाना हैं दहशत से दूर, हाँ बर्फ़ से लदे हुए उन पहाड़ों पे
 
मन की सुनसान गलियों में, भले ही सख्त पहरा हो
संग चलना हैं हमें, चाहे हर तरफ धुंध और कोहरा हो
 
खेलना हैं हमें बर्फ़ से, गुलमर्ग की उस घाटी में
फेंकने हैं गोले बर्फ़ के, तसव्वुर की तंगहाली पे
 
इंतज़ार है मुझे ऐतबार भी, इस कर्फ्यू के हट जाने का
एक अर्से से ये ज़ेहन मेरा, वादी-ए-कश्मीर है बना बैठा।

“दिल की बात, हाँ सबके साथ”

 

है ये गए शनिवार की बात
जमके जिस रोज़ हुई बरसात
की नए दोस्तों से मुलाक़ात
कुछ हसीं बात हुई उस रात
ज़िन्दा हुए फिर से जज़्बात
हुई नए सफ़र की शुरुआत
"हस्ताक्षर" की ये है सौगात
दिल की बात, हाँ सबके साथ
दिल की बात, हाँ सबके साथ

क्या खूब रही वो हसीन शाम
था जिसका बड़ा ही प्यारा नाम
दिया सबने बस यही पैग़ाम
दिल जीतना अब अपना काम

Open Mind से Open Mic का 1st Chapter शुरू हुआ 
हर एक Performer ने जहां Audience के दिल को छुआ

किसी ने Music से Romantic माहौल बनाया
तो किसी ने Stand-up Comedy करके खूब हंसाया

किसी ने Flute और Guitar की जुगलबंदी की
तो किसी ने पंजाबी गानों की Parody बड़ी चंगी की

किसी ने हँसी-ठहाकों की फुलझड़ियां जलाई
तो किसी ने शायरी की रंगीन महफ़िल सजाई

किसी ने बड़े ही Feel के साथ प्यारवाली Poetry सुनाई
तो किसी ने अपनी Practical Life कविताओं में दिखाई

किसी ने सुर लगाके अपने हमसफ़र को आवाज़ लगाई
तो किसी ने अपने हमसफ़र के लिए गीतों की झड़ी लगाई

किसी ने वाह-वाह किया तो किसी ने ताली बजाई
आखिर में फिर मिलने के वादे पर हुई रस्म-ए-विदाई

है ये गए शनिवार की बात
जमके जिस रोज़ हुई बरसात
की नए दोस्तों से मुलाक़ात
कुछ हसीं बात हुई उस रात
ज़िन्दा हुए फिर से जज़्बात
हुई नए सफ़र की शुरुआत
"हस्ताक्षर" की ये है सौगात
दिल की बात, हाँ सबके साथ
दिल की बात, हाँ सबके साथ।

			

उसने पलटकर देखना भी मुनासिब ना समझा

उसने पलटकर देखना भी मुनासिब ना समझा
अपनी ज़िंदगी में हमें कभी शामिल ना समझा

कैसे चलते भला ज़िंदगी की अजनबी राहों पर
जब ज़िंदगी ने ही हमको मुसाफ़िर ना समझा

“मेरी कहानी को कहानी समझके भूल जाना”

मेरी कहानी को कहानी समझके भूल जाना
मज़ाक या फिर कोई नादानी समझके भूल जाना

नहीं चाहता कोई और मुझ जैसा बन जाएं यहां
मेरे अश्क़ों को तुम पानी समझके भूल जाना

पल में आती है, पल-पल भिगा जाती है
बारिश को तुम बेगानी समझके भूल जाना

साथ गुज़रे जो पल, वो पल बड़े हसीन थे
वक़्त की उन्हें मेहरबानी समझके भूल जाना

हो सकता है तुम्हें बुरा लगे, और गुस्सा भी आएं
बीते लम्हों को बेमानी समझके भूल जाना

आहें जितनी भी लिखी हैं, काग़ज़ के पन्नों पर
याद न रखना उन्हें कहानी समझके भूल जाना।

“बहुत दिनों के बाद बारिश हुई आज”

 

बहुत दिनों के बाद बारिश हुई आज
ज़मीन और ज़िंदगी दोनों तर हो गई

बिजली के तार पे बारिश की बूंदें जिस तरह से चलती हैं
कुछ उसी तरह ये ज़िंदगी, ज़िंदगीभर अठखेली करती है

काग़ज़ की कश्ती इन दिनों कोई नहीं बनाता
सब अपनी हस्ती बनाने में जो मसरूफ़ हैं

पानी के छपाके भी इन दिनों सहमे से रहते हैं
बुरा ना मान जाएं दीवारें, ये दीवारों से डरते हैं

कीचड़ की वज़ह से इसे मिलती है रुस्वाई
है अंदर इसके, नील समंदर सी गहराई

बादल से ज्यादा बारिश को कौन जानता है
दोनों की जुदाई में सारा आसमान रोता है

सिर्फ पानी ही नहीं, यादें भी बरसाते हैं बादल
एक अर्से तक इन आँखों को तरसाते हैं बादल

बहुत दिनों के बाद बारिश हुई आज
तिश्नगी और तन्हाई दोनों फुर्र हो गई।

आकाशवाणी (All India Radio)

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ये आकाशवाणी का खुद का अपना स्टेशन है
अब आप अमीन सयानी साहेब से इसकी कहानी सुनिए
 
नमस्ते बहनों और भाईयों, बड़े ही कम शब्दों में आपको बताना चाहता हूँ
के हर दौर का सबसे लोकप्रिय गीत है ये, जो मैं आपको सुनाना चाहता हूँ
 
जैसे किसी प्यासे के लिए बेहद ज़रूरी है पानी
वैसे ही मनोरंजन का मतलब है आकाशवाणी
 
श्रोताओं का शुद्ध देसी साथी है विविध भारती
बहुजन हिताय बहुजन सुखाय की भाषा इसे भाती
 
अंग्रेजों के जमाने से शुरू हुआ यह शानदार सफ़र
बंबई और कलकत्ता में लगाए गएं दो ट्रांसमीटर
 
1930 में आखिरकार हुआ जो इसका Nationalization
कहलाई ये सेवा फिर Indian Broadcasting Corporation
 
आज़ादी के दस साल बाद खूब मशहूर हुआ रेडियो
जब नाम मिला इसे आकाशवाणी All India Radio
 
1957 में जब विविध भारती का आग़ाज़ हुआ
फिल्मी गीतों के साथ विज्ञापनों का प्रसारण स्टार्ट हुआ
 
नाच मयूरा नाच, विविध भारती पर प्रसारित पहला गीत था ये
बोल थे पं. नरेंद्र शर्मा के, संगीत अनिल विश्वास का, गायक थे मन्ना डे
 
आवाज़ से दिलों पर राज करते हैं RJ
लबों से लफ़्ज़ों में एहसास भरते हैं RJ
 
अमीन सयानी साहेब की वो दिलकश आवाज़
श्रोताओं को अब तक याद है उनका जादुई अंदाज़
 
बिनाका गीतमाला के वो गीत, आज भी गुनगुनाये जाते हैं
उजालों उनकी यादों के सदैव संगीत सरिता बहाते हैं
 
फौजी भाईयों के लिए जयमाला एक सौगात है
सरहद पे तैनात सिपाही के जुड़े इससे जज़्बात हैं
 
हवामहल प्रोग्राम के जरिए, नाटक व झलकियां पेश की जाती हैं
महिलाओं के लिए महिलाओं द्वारा सखी सहेली पेश की जाती है
 
कई काबिले तारीफ़ कार्यक्रमों का अद्भुत अजायबघर है पिटारा
यूथ एक्सप्रेस में बैठे,
हैलो फरमाईश करते,
सेल्युलाइड के सितारों का सफ़र है पिटारा
 
एआईआर से जुड़े हैं मन के तार
एंटरटेनमेंट का है ये एवरग्रीन स्टार
 
साल 2007 में इसकी गोल्डन जुबली मनाई गई
फिफ्टी पूरी होने पर ऑन एयर खुशी मनाई गई
 
Gold और Rainbow हैं इसके FM Station
Music से करते ये Mind का Meditation
 
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय है इसका कर्ता-धर्ता
सौ बार सुन लो फिर भी इससे मन नहीं भरता
 
KHz वाली ख़्वाहिशें, MHz वाला माहौल बनाती हैं
दिल की Waves पे ज़िंदगी, न्यूज नग़्मे सुनाती हैं
 
बदलते जमाने के साथ-साथ बदल रहा है रेडियो
Internet, Smartphone, के साथ ही अब DTH पर है रेडियो
 
Digital Quality के साथ अब Satellite का भी साथ है
मीडिया मुगल को चाहे जितने, प्रसार भारती की अलग ही बात है
 
रेडियो मात्र मनोरंजन का साधन नहीं, और भी बहुत कुछ है
सृजन के संगीत का मनमीत, ये कला का कवच है
 
आकाशवाणी का जयपुर केंद्र सबसे निराला है
MI Road पर स्थित ये उम्मीदों का उजाला है
 
चाहे मन की बात कहनी हो, या अपना मनपसंद गाना सुनना हो
All India Radio है न, फिर चाहे कोई भी पुराना गाना सुनना हो
 
Digital इस दौर में आकाशवाणी का कोई तोड़ नहीं
ये वो खिलाड़ी है, जिसकी किसी से कोई होड़ नहीं
 
तो दोस्तों ये थी आकाशवाणी की All Time Hit दास्तान
रेडियो पर गूंज रहा है वक़्त का BlockBuster बयान
 
जमाना भले ही बदल गया, पर नहीं बदला इसका अंदाज़
ज़िंदा है ज़िंदा रहेगा, आकाशवाणी का वो उम्दा एहसास।

वो हँसने के भी बहाने ढूंढते हैं

बंजर में बारिश के फ़साने ढूंढते हैं
वो हँसने के भी बहाने ढूंढते हैं

दुःखी होते हैं जब लोग अक्सर
नए जमाने में यार पुराने ढूंढते हैं

लापता हो जाता है पता जिनका
ज़िंदगीभर वो बीते जमाने ढूंढते हैं

ख़याल तो बंजारे हैं, बेबाक चले आते हैं
बंजारे भला कब यूं ठिकाने ढूंढते हैं

खो जाते हैं जो किसी दौर के दौरान
खुद को वो लिखने के बहाने ढूंढते हैं

गर इसे तरक्की कहते है तो नहीं चाहिए ऐसी तरक्की
नीची सोच वाले ऊंचे घराने ढूंढते हैं।

बोल तो सही, आखिर क्या चाहता है तू खुद से

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चीख-चीखकर मेरी ख़ामोशियां कह रही हैं मुझसे
बोल तो सही, आखिर क्या चाहता है तू खुद से

अंदर ही अंदर ये कैसा बवंडर उठ रहा है
भीतर-भीतर दिल दा समंदर जल रहा है

क्यों मिटा रहा है तू अपनी हस्ती को
क्यों जला रहा है तू अपनी बस्ती को

चीख-चीखकर सभी सरगोशियां कह रही हैं मुझसे
बता तो सही, आखिर क्या चाहता है तू खुद से

ना बताता है ना जताता है, बस खुद को खुद में छुपाता है
जितना हंसाता है उतना रुलाता है, खुद को क्यों सताता है

बस बहुत हुआ, खत्म कर अब इस सिलसिले को
बढ़ भी जा अब आगे तू, ना याद रख पिछले को

चीख-चीखकर मेरी ख़ामोशियां कह रही हैं मुझसे
बोल तो सही, आखिर क्या चाहता है तू खुद से।

“नाहरगढ़ किला जयपुर” (Nahargarh Fort Jaipur)

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जो भी जयपुर आता है, वो यहां ज़रूर जाता है
दोस्तों ये नायाब किला, नाहरगढ़ कहलाता है

यहां से मीठी यादें जुड़ी हैं, दिल की दिलकश बातें जुड़ी हैं
यहां आके हर ज़िन्दगी, आज़ाद खुले आसमान में उड़ी हैं

नाहरगढ़ जाने वाले सभी रास्तें एडवेंचर से भरे हैं
मोड़ पे मोड़ ऊपर से संकरी रोड़, ये डेंजर से भरे हैं

सवाई जयसिंह ने इसे सन् 1734 में था बनवाया
सुदर्शन मंदिर की वजह से ये सुदर्शनगढ़ कहलाया

कहते है कि बरसों पहले, यहां एक बाबा का वास था
पहुंची हुई हस्ती, नाहरसिंह भोमिया उनका नाम था

ज्योंही मजदूर दिन में थोड़ा किला बनाते
रात को बाबा आकर उसे ध्वस्त कर जाते

आखिरकार एक सिद्ध तांत्रिक ने उन्हें मना लिया
किसी दूसरी जगह पर स्थापित उन्हें करवा दिया

बस तब से ही ये किला नाहरगढ़ कहलाने लगा
सैलानियों का दिल, दिल खोलके बहलाने लगा

सवाई माधोसिंह ने यहां एक जैसे 9 महल बनवाएँ
अपनी 9 प्रेमिकाओं के नाम पे उनके नाम रखवाएँ

ये सारे महल आपस में एक ही सुरंग से जुड़े हुए हैं
मौसम के मुताबिक यहां, हवा-रौशनी बिखरे हुए हैं

सूरज, खुशहाल, जवाहर, ललित, ये हैं पहले 4 महल
आनंद, लक्ष्मी, चांद, बसंत, फूल, बाक़ी के 5 महल

सारे महलों का सरनेम प्रकाश हैं
नाहरगढ़ से नजदीक ही आकाश है

अय्याश महाराजा जगतसिंह की माशूका को यहीं क़ैद रखा गया था
आलीशान अतिथिगृह में कनीज़ रसकपूर को नज़रबंद किया गया था

पानी बचाने के लिए जो एक बावड़ी बनाई गई थी
छोरे-छोरियां सब आजकल वहीं पर लेते हैं सेल्फी

आमिर ख़ान की फिल्म रंग दे बसंती ने इसे वर्ल्ड फेमस कर दिया
बाद उसके तो हर प्राणी ने यहीं आके अपडेट अपना स्टेटस किया

इस बार दिवाली की रात, जनाब आप नाहरगढ़ ज़रूर जाएं
और अपने पिंकसिटी को, सितारों सा जगमगाता हुआ पाएं

जो भी जयपुर आता है, वो यहां ज़रूर जाता है
ऐत्थे जाते ही दोस्तों, साड्डा दिन बन जाता है।

कई दिनों तक एक ही राह पे चलते रहना रुकने जैसा लगता है

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कई दिनों तक एक ही राह पे चलते रहना रुकने जैसा लगता है
अपने दिल की ना सुनना, अपने ही आगे झुकने जैसा लगता है
 
अपनी बेहतरी केे लिए बेहतर को छोड़ देना इतना आसान नहीं
हर बार बार-बार हज़ार बार डर के आगे दम तोड़ देती है ज़िंदगी
 
एक दोस्त ने लिखा था कभी, के ना चलना तो मौत की निशानी है
मगर बेवज़ह मुसलसल चलते रहना भी तो वक़्त की मनमानी है
 
मन करता है मेरा भी कभी, किसी शज़र के साये में थोड़ा सुस्ता लूं
अपनी सारी बेचैनियों को पलकों के गीले पर्दों के पीछे कहीं छुपा दूं
 
मगर फिर डर लगता है कि कहीं यह ठहराव मुझे चलना ना भुला दे
जमकर जगने से पहले कहीं यह छाव मुझे गहरी नींद में ना सुला दे
 
पहले भी अपने लिए कई जुनूनी फैसले ले चुका हूँ
उन्हीं फैसलों के दम पर आज बाहें फैलाएं खड़ा हूँ
 
अपनी ज्यादा गलतियां करने की आदत से परेशान नहीं हूँ
दिल खोलकर दिलवाली मनमर्ज़ियां करने से हैरान नहीं हूँ
 
देखते है इस बार किस अजनबी राह को हमराह बनाती है ज़िंदगी
देखते है इस बार किस तरह से क्या-क्या गुर सिखाती है ज़िंदगी
 
कई दिनों तक एक ही राह पे चलते रहना अच्छा नहीं
अपने दिल की ना सुनना, हाँ रत्ती भर भी सच्चा नहीं…

थोड़ा पाया है बहुत खोया है

थोड़ा पाया है बहुत खोया है
ये कैसा बीज ज़िंदगी ने बोया है

लबों तक आते-आते हर बार, दम तोड़ देते हैं जज़्बात
क्यूं वो अब तक नहीं रोया है

ना ख़्वाब आते हैं, ना सुकून मिलता हैं
जाने कैसी गहरी नींद में सोया है

सब्र भी अब तो जवाब देने लगा है
दिल ने इतना बोझ ढ़ोया है

मन का मोती खो चुका है कहीं
जाने किस धागे में पिरोया है

दिल ने क्या हसीं सितम किया है
थोड़ा हंसा है बहुत रोया है

कभी रौशन होके तो दिखा

इससे पहले कि ज़िंदगी का बल्ब फ्यूज हो जाएं
इससे पहले कि तू किसी दोराहे पे कंफ्यूज हो जाएं
 
एलईडी की तरह एक बार फुल टू जगमगाके तो दिखा
है तेरे भीतर कितनी ऊर्जा, कभी रौशन होके तो दिखा
 
इस तरह ज़ीरो वाट की रौशनी में जीने का क्या मतलब है
बिल की चिंता में तिल-तिल मरना बेवकूफी भरा करतब है
 
तेरे भीतर का वो रूहानी टंगस्टन तू कब जलाएगा
कब तू खुद जलके औरों को रौशन जहां दिखाएगा
 
बिजली की टेंशन है मगर ज़िंदगी की नहीं
बिल की टेंशन है मगर अपने दिल की नहीं
 
वहम तो विद्युत विभाग की तरह गलत रीडिंग ही देगा
मीटर सदैव चालू रखेगा ये बत्ती रोज़ाना गुल ही करेगा
 
इससे पहले कि ज़िंदगी की ट्यूबलाइट फ्यूज हो जाएं
इससे पहले कि तू किसी के हाथों मिसयूज हो जाएं
 
सूरज की तरह एक बार खुद को चमकाके तो दिखा
है तेरे भीतर अभी बहुत आग, जमके शोले तो बरसा
 
इस तरह ज़ीरो वाट वाली ज़िंदगी जीने का कोई मतलब नहीं
एसी की टेंशन में अपनी ऐसी तैसी कराने का कोई मतलब नहीं…

Aravali Range (अरावली पर्वतश्रृंखला)

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दुनिया की सबसे पुरानी वलित पर्वतमाला है अरावली
प्री क्रैम्बियन काल के पहाड़ों की महागाथा है अरावली

भूगोल के अनुसार यह प्राचीन गोंडवाना लैंड का हिस्सा है
राजपूताना से लेकर दिल्ली तक मशहूर इसका किस्सा है

थार के रेतीले टीलों को आगे बढ़ने से सिर्फ यही रोकती है
मगर मानसून के पैरेलल है, सो बादलों को नहीं रोकती है

राजस्थान के 17 जिलों में इसका व्यापक विस्तार है
कुदरत का करिश्मा यह सदियों पुराना कोहसार है

राजस्थानी भाषा में इसे आडावाळा डूंगर कहते हैं
इसकी सबसे ऊंची चोटी को गुरू शिखर कहते हैं

झीलों की नगरी से इसका गहरा लगाव है
अजमेर जिले में सबसे कम फैलाव है

समंदर के तल से औसत ऊंचाई है 930 मीटर
अरावली की कुल लंबाई है 692 किलोमीटर

उत्तर, मध्य और दक्षिण, बेसिकली तीन हिस्सों में बंटी हुई हैं
गुजरात के पालनपुर से लेकर राष्ट्रपति भवन तक फैली हुई है

पांच प्रमुख दर्रे इसके नाल कहलाते हैं
मेवाड़ के पठार ऊपरमाल कहलाते हैं

बाड़मेर में छप्पन की पहाड़ियां, तो अजमेर में मेरवाड़ा की पहाड़ियां
गर सीकर में है हर्ष पर्वत मालखेत, तो जालौर में सुंधा की पहाड़ियां

उदयपुर का उत्तर-पश्चिमी भाग मगरा कहलाता है
तश्तरीनुमा पहाड़ियों को जहां गिरवा कहा जाता हैं

लूनी और बनास नदी इसका विभाजन करती हैं
सिरोही की बेतरतीब पहाड़ियां भाकर कहलाती हैं

जोधपुर का मेहरानगढ़ हो या अजमेर का तारागढ़
अरावली के सीने पर सुशोभित हैं ऐसे अनेकों गढ़

भले ही मानसून को रोक पाने में असफल है अरावली
मगर थार को रोक पाने में यक़ीनन सफल है अरावली

बस इतनी सी इस महान पर्वतश्रृंखला की कहानी है
प्राचीन इतिहास की ये अद्भुत अद्वितीय निशानी है।

ज़िन्दगी का समोसा

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ज़िन्दगी का समोसा बड़ा ही करारा है
जल्दी से खालो इसे, ये मिलता नहीं दोबारा है
 
चाहत की चटनी नहीं है, तो क्या ग़म है
तन्हाई का तेल, तर रखता इसे हरदम है
 
सुबह-सुबह नाश्ते में अच्छा लगता है
ये अजनबी रास्ते में अच्छा लगता है
 
अहमियत न हो तो बहुत ही सस्ता है
कुरकुरापन लिए ये बहुत ही ख़स्ता है
 
दबे कुचले अरमानों के आलू इसमें दम भरते हैं
खुशबू और लज़्ज़त में कई गुना इज़ाफ़ा करते हैं
 
पेट भले ही भर जाएं, मगर दिल है कि भरता नहीं
पाकर इसे डाइटिंग करने को दिल कभी करता नहीं
 
बेशक इसे तैयार करने वाला, बड़ा ही बेनज़ीर कारीगर है
तारीफ उसकी मुमकिन नहीं, वो कायनात का क्रिएटर है
 
ज़िन्दगी का समोसा बड़ा ही चटपटा है
जी भरके खालो इसे, ये वन पीस ही मिलता है।